23 नवंबर 2018

स्वेदजा और रक्त्जा - कर्ण और अर्जुन के कई जन्मों की प्रतिस्पर्धा

पिछले लेख में हमने महारथी कर्ण के पिछले जन्म "दंबोधव" के बारे में पढ़ा। इससे हमें ये जानने को मिलता है कि इन दोनों के बीच की प्रतिस्पर्धा कितनी पुरानी है। जिन्हे दंबोधव के बारे में पता नहीं था उसके लिए ये कथा सुनना वास्तव में आश्चर्यजनक है। किन्तु उससे भी अधिक आश्चर्यजनक कथा हमें पद्मपुराण में मिलती है जिसमे इन दोनों की प्रतिदंद्विता का विवरण है जो सीधे त्रिदेवों से सम्बंधित है। कथा उस समय की है जब परमपिता ब्रह्मा पंचमुखी थे। उनके चार मुख चारों वेदों का पाठ करते थे किन्तु उर्ध्वमुखी पाँचवा मुख सदैव महादेव की निंदा करता था। इससे रुष्ट होकर महादेव ने ब्रह्मदेव से युद्ध किया और उनका वो पाँचवा मुख काट दिया। ब्रह्मदेव युद्ध से अत्यंत श्रमित थे और अपना पाँचवा मुख काटने पर अत्यंत क्रोधित भी। उसी क्रोध एवं श्रम के कारण उनके शरीर के पसीने से एक अत्यंत भयानक दैत्य ने जन्म लिया। ब्रह्मदेव से उत्पन्न होने के कारण उसका तेज और बल असाधारण था और साथ ही परमपिता के प्रताप से उसे जन्मजात १००० दिव्य कवच प्राप्त हुए। उसने ब्रह्मदेव को प्रणाम किया और उनसे पूछा कि वो कौन है और उसकी उत्पत्ति क्यों हुई है। तब ब्रह्मदेव ने अपने पसीने (स्वेद) से जन्मे उस असुर का नाम "स्वेदजा" रखा और महादेव से हुए अपमान के कारण उन्होंने उसे भगवान रूद्र से युद्ध करने के लिए कैलाश की ओर जाने की आज्ञा दी। अपने पिता की आज्ञा पाकर स्वेदजा भयानक अट्टहास करता हुआ कैलाश की ओर चला।

उधर कैलाश में भगवान शिव समाधि में जाने वाले थे कि उनके गणों ने उन्हें बताया कि स्वेदजा उनसे युद्ध करने को कैलाश आ रहा है। उन्होंने स्वेदजा के भयानक रूप और बल की भी चर्चा की और महारुद्र से प्रार्थना की कि वे उस महान असुर का वध करें। तब महादेव ने भगवान विष्णु से इसका उपाय खोजने को कहा और स्वयं समाधि में चले गए। जब श्रीहरि ने स्वेदजा का रौद्र रूप देखा हो उन्होंने अपन खून से एक अन्य असुर की उत्पत्ति की और उसका नाम "रक्त्जा" (रक्त से जन्मा) रखा। रक्त्जा नारायण की शक्ति से जन्मा था और युद्ध कौशल में उन्ही के समान था। नारायण के आशीर्वाद से उसके १००० हाथ थे और वो ५०० दिव्य धनुषों का स्वामी था। उसने नारायण से पूछा कि उसका जन्म क्यों हुआ है? तब नारायण ने उसे बताया कि क्रोधवश ब्रह्मदेव ने स्वेदजा नामक एक असुर की उत्पत्ति की है जो महादेव से युद्ध की मूर्खता करने जा रहा है। महाकाल को तो कोई क्षति नहीं होगी किन्तु इससे भगवान ब्रह्मा और महादेव में वैमनस्य बढ़ेगा, अतः वो जाये और स्वेदजा को रोके। नारायण की आज्ञा पाते ही रक्त्जा ने तत्काल कैलाश की ओर जाते हुए स्वेदजा को रोका और उसे युद्ध के लिए ललकारा। तब उन दोनों असुरों में भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों ब्रह्मदेव और विष्णुदेव के अंश से जन्मे थे और अतुल बलशाली थे। दोनों के बीच वो युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा। उस युद्ध में रक्त्जा ने स्वेदजा के ९९९ कवच तोड़ डाले, वहीँ स्वेदजा ने रक्त्जा के ९९८ हाथ काट डाले और ५०० धनुषों का नाश कर दिया। अब रक्तजा के पास को अस्त्र-शस्त्र शेष नहीं था किन्तु स्वेदजा के पास उसका एक दिव्य कवच अभी भी बाँकी था। नारायण समझ गए कि उस युद्ध में रक्त्जा स्वेदजा से पराजित हो जाएगा। ये जानकर उन्होंने बीच-बचाव किया और ब्रह्मदेव को समझा-बुझा कर उस युद्ध को रुकवाया। 

रक्त्जा को उस युद्ध में स्वेदजा को पराजित ना कर पाने का क्षोभ हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि अगले जन्म में वो अवश्य ही स्वेदजा को पराजित करेगा। रक्त्जा की इस कामना को देखकर श्रीहरि विष्णु ने उसे आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में रक्त्जा की सहायता के लिए वे भी अवतार लेंगे। जब तक उन दोनों का युद्ध समाप्त हुआ, भगवान शिव की समाधि भी टूटी। वे वहाँ आये और स्वेदजा और रक्त्जा के पराक्रम को देख कर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने दोनों को ब्रह्मदेव एवं नारायण से माँग लिया और फिर सूर्यनारायण को स्वेदजा और देवराज इंद्र को रक्त्जा के संरक्षण का दायित्व सौंपा। समय आने पर सूर्यदेव के तेज से स्वेदजा कर्ण और इंद्रदेव के तेज से रक्त्जा अर्जुन के रूप में जन्मे। उसी युग में नारायण श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। कर्ण अपने बचे हुए उस एक कवच के साथ ही जन्मा किन्तु श्रीकृष्ण और देवराज इंद्र के छल के कारण उसे अपना कवच दान करना पड़ा और अर्जुन ने अपने पूर्वजन्म की प्रतिज्ञा के कारण अंततः कर्ण को पराजित किया और उसका वध किया।