21 नवंबर 2018

दंबोधव - जिसके पाप का दण्ड महारथी कर्ण ने भोगा

महाभारत ऐसी छोटी-छोटी कथाओं का समूह भी है जो हमें आश्चर्यचकित कर देती है। जी सुंदरता के साथ वेदव्यास ने सहस्त्रों छोटी-छोटी घटनाओं को एक साथ पिरोया है वो निश्चय ही अद्वितीय है। ऐसी ही एक कथा दंबोधव दानव की है जो सीधे तौर पर कर्ण से जुडी है और अर्जुन एवं श्रीकृष्ण भी उसका हिस्सा हैं। ये कथा वास्तव में कर्ण के पूर्वजन्म की कथा है जिसके कारण उसे अगले जन्म में भी इतना दुःख भोगना पड़ा। ये कथा महाभारत से बहुत पहले, रामायण से भी बहुत पहले, त्रेतायुग की है। दंबोधव नाम का एक प्रतापी असुर था जिसने भगवान सूर्यनारायण की १००० वर्षों तक तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे दर्शन दिए और वर माँगने को कहा। वर में उसने अमरत्व का वरदान माँगा जिसपर सूर्यदेव ने उसे कहा कि "भक्त! अमरत्व का वरदान देना संभव नहीं है क्यूँकि सृष्टि के नियम के रचयिता स्वयं परमपिता ब्रह्मा भी अपने विधान को नहीं बदलते।" तब उस दानव ने बहुत सोच कर कहा - "हे देव! अगर ऐसा है तो मैंने सहस्त्र वर्षों तक आपकी तपस्या की है इसी कारण मुझे प्रत्येक वर्ष के लिए एक दिव्य कवच प्रदान करें। उन १००० कवचों में मैं पूर्णतः सुरक्षित रहूँ। प्रत्येक कवच को केवल एक मानव ही नष्ट कर सके और वो भी वही जिसने मेरी तरह १००० वर्षों तक तप किया हो। साथ ही जैसे ही वो मेरा कवच तोड़े, वो तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाये।" अब सूर्यदेव धर्मसंकट में पड़ गए। उन्हें ये तो पता था कि दंबोधव ये वरदान सृष्टि के अहित के लिए ही माँग रहा है किन्तु वे विवश थे इसी कारण उन्हें वरदान देना पड़ा। उनके वरदान के प्रभाव से उसके चारो ओर १००० दिव्य कवच उत्पन्न हो गए और वो "सहस्रकवच" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जैसी आशंका थी, उसने अपनी शक्ति से तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मचा दी। त्रिदेव भी विवश थे कि वे उसका वध नहीं कर सकते अन्यथा सूर्यदेव का अपमान हो जाएगा। पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया। ब्रह्मपुत्र दक्ष ने अपनी पुत्री मूर्ति का विवाह ब्रह्मदेव के मानसपुत्र धर्म से किया था। मूर्ति से दंबोधव का ये अत्याचार देखा नहीं गया और उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उसके गर्भ से जन्म लेकर उस राक्षस का अंत करें। नारायण ने ये वरदान दिया। समय आने पर मूर्ति के गर्भ से जुड़वाँ पुत्र का जन्म हुआ जिसे "नर-नारायण" के नाम से जाना गया। उपनयन होते ही नारायण ने भगवान शिव की तपस्या आरम्भ कर दी और नर ने दंबोधव के राज्य में जाकर उसे ललकारा। जब उस असुर ने एक बालक को देखा तो हँसते हुए जाने को कहा। इसपर नर ने कहा - "रे अधम! मुझे तेरे वरदान के बारे में ज्ञात है। मेरे बदले मेरा भाई नारायण तप कर रहा है। हम दो शरीर अवश्य है पर हमारी आत्मा एक है। आज मैं अवश्य तेरा वध करूँगा।" तब दोनों में भयानक युद्ध छिड़ गया। दंबोधव ये देख कर आश्चर्यचकित रह गया कि वास्तव में नारायण के तप की शक्ति नर को मिल रही है। वर्षों तक दोनों का युद्ध चलता रहा। उधर जैसे ही नारायण ने अपनी तपस्या के १००० वर्ष पूरे किये, नर ने दंबोधव का एक कवच तोड़ डाला। कवच टूटते ही वरदान के कारण नर की मृत्यु हो गयी। दंबोधव प्रसन्न हुआ कि एक कवच भले ही नष्ट हो गया किन्तु उसका शत्रु भी नष्ट हो गया। वो विजयनाद करते हुए अपने नगर लौट गया। 

उधर नारायण की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे दर्शन दिए। नारायण ने वर के रूप में उनसे मृतसञ्जीवनी माँगी, जिसे महादेव ने उन्हें प्रदान किया। वो विद्या लेकर नारायण तत्काल नर के मृत शरीर के पास पहुँचा और उसे जीवित कर दिया। अब नर तपस्या को गया और नारायण ने दंबोधव को ललकारा। दोनों के रूप-गुण में कोई भेद ना था इसी कारण दंबोधव को लगा कि नर लौट आया है। दोनों में पुनः युद्ध प्रारम्भ हुआ और जैसे ही नर ने १००० वर्षों की तपस्या पूर्ण की, नारायण ने दंबोधव का एक और कवच तोड़ डाला। कवच टूटते ही नारायण मृत हो गए किन्तु नर ने नारायण को मृतसञ्जीवनी विद्या से जीवित कर दिया। अब फिर नारायण तप को गए और नर ने दंबोधव को पुनः युद्ध के लिए ललकारा। ये क्रम चलता ही रहा और तबतक चलता रहा जबतक उस असुर के ९९९ कवच नष्ट नहीं हो गए। जब अंतिम कवच शेष रहा तो दंबोधव भयभीत हो सूर्यदेव की शरण में चला गया जिन्होंने उसे अपने तेज का एक भाग बना कर स्वयं में समा लिया। उधर तपस्या पूर्ण कर नर और नारायण उसे ढूँढ़ते हुए सूर्यदेव के पास पहुँचे और उनसे कहा कि वे दंबोधव को उनके सुपुर्द कर दें। किन्तु शरणागत की रक्षा करने के लिए सूर्यदेव ने ऐसा नहीं किया। तब नर-नारायण ने सूर्यदेव की भर्त्स्यना करते हुए कहा - "हे सूर्यदेव! आपने ही अविवेक के कारण इस असुर को ऐसा वरदान दिया जिससे पृथ्वी त्रस्त हो गयी। आपके वरदान के कारण हम दोनों भाई ९९९ बार मृत्यु का कष्ट भोग चुके हैं। ये जानते हुए कि इसका वध अनिवार्य है, आप इसकी रक्षा कर रहे हैं। अतः अब आपको भी इसका दंड भोगना पड़ेगा। जाइये हम आपको श्राप देते हैं कि इस असुर को अगला जन्म आपके ही तेज से मिलेगा और इसे जीवन भर संघर्ष करना होगा। यही नहीं, अगले जन्म में भी इसके वध के लिए हम दोनों भाई पुनः जन्म लेंगे।"

नर और नारायण के श्राप के कारण ही दंबोधव द्वापर युग में सूर्यदेव के तेज के साथ उसी एक बचे हुए कवच के साथ कर्ण के रूप में जन्मा। द्वापर में नर और नारायण अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जन्मे जिनके कारण अंततः कर्ण मृत्यु को प्राप्त हुआ। सूर्य एवं और के मेल के कारण जहाँ कर्ण में सूर्यदेव का तेज और अतुल बल था, वही असुर दंबोधव के प्रभाव से उसने धर्म का मार्ग त्याग कर अधर्म का मार्ग चुना और अंत में उसका पतन हुआ। कर्ण के पूर्वजन्म के विषय में एक और विवरण पद्मपुराण में मिलता है जिसे हम किसी और लेख में आपके सामने प्रस्तुत करेंगे।