21 अक्तूबर 2018

माँ दुर्गा की कथा २: शुम्भ-निशुंभ, धूम्रलोचन एवं चण्ड-मुण्ड वध

पिछले लेख में आपने माँ दुर्गा की उत्पत्ति और महिषासुर के वध की कथा पढ़ी। महिषासुर की मृत्यु के पश्चात दो महापराक्रमी दैत्यों शुम्भ-निशुंभ, जो महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री दनु के पुत्र और नमुचि दानव के भाई थे, उन्होंने देवों पर अत्याचार आरम्भ कर दिया। इंद्र ने उनके भाई नमुचि का वध कर दिया जिसके बाद उन्होंने इंद्र को सिंहासनच्युत कर स्वर्ग पर अधिकार जमा लिया। इससे त्रस्त होकर सभी देवता माँ दुर्गा के पास सहायता के लिए पहुँचे। तब उनपर हुए अत्याचार को देख कर देवी उन दोनों के वध को उद्धत हुई। उन्होंने शुम्भ-निशुंभ को युद्ध के लिए ललकारा। जब दोनों भाइयों ने एक स्त्री की ललकार सुनी तो उसका परिहास करते हुए उन्होंने अपने १०००० योद्धाओं को उन्हें बंदी बना कर लाने के लिए भेजा। जब वे सभी देवी के पास पहुँचे तो उनके वाहन सिंह ने अपने तेज दांत और नाखूनों से पूरी सेना का संहार कर दिया। जब शुम्भ-निशुंभ ने ये समाचार सुना तो बड़ा हैरान हुआ। उसने अपने सेनापतिओं चण्ड-मुण्ड को देवी दुर्गा के वध की आज्ञा दे कर भेजा।

जब दोनों भाई देवी के पास पहुँचे तो वे उनका अप्रतिम सौंदर्य देख कर अपना सुध-बुध खो बैठे। उन्होंने देवी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। तब देवी ने हँसते हुए कहा - "मूर्खों! तुम लोग युद्ध की जगह प्रेम की भाषा कैसे बोलने लगे? लगता है तुम्हे अपने प्राणों से प्रेम नहीं है। यदि ऐसा नहीं है तो मुझसे युद्ध करो।" तब दोनों ने देवी का रौद्र रूप देख कर उनपर आक्रमण नहीं किया और वापस लौटकर शुम्भ-निशुंभ के पास आये और देवी के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहा - "हे महाराज! वो देवी है अथवा अप्सरा। उसका सौंदर्य ऐसा है कि उसके मुख पर दृष्टि ही नहीं टिकती। हमने ये सोच कर कि ऐसी अद्भुत स्त्री तो केवल आपकी भार्या बनने के योग्य है, उसे आप दोनों से विवाह का प्रस्ताव दिया किन्तु उन्होंने हमारे प्रस्ताव की अवहेलना की और आपसे विवाह करने से मना कर दिया।" चण्ड-मुण्ड से देवी का ऐसा सौंदर्य वर्णन सुनकर शुम्भ-निशुंभ उनसे विवाह करने को लालायित हो उठे। उसने अपने एक दूत धूम्रलोचन को आज्ञा दी कि उस देवी को उनके सामने सम्मुख करे। यदि देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व कोई भी उन्हें रोके तो उन्हें मृत्युदंड दे।

इस प्रकार धूम्रलोचन ६०००० महाशक्तिशाली योद्धाओं की सेना लेकर देवी के पास पहुँचा और उससे कहा - "सुंदरी! तुम्हारा सौंदर्य वास्तव में अद्वितीय है। तुम तो वास्तव में मेरे स्वामी शुम्भ एवं निशुंभ की महारानी बनने योग्य हो। अतः क्यों युद्ध करके अपने प्राणों को संकट में डालती हो? मेरी बात मान लो और मेरे स्वामी को अपना पति स्वीकार कर लो अन्यथा मुझे तुम्हे बलात अपने साथ ले जाना होगा।" धूम्रलोचन को उस प्रकार अनर्गल प्रलाप करते देख देवी ने उसे युद्ध के लिए ललकारा और बात ही बात में उसका और उसके ६०००० योद्धाओं का नाश कर दिया। जब शुम्भ-निशुंभ ने धूम्रलोचन के वध का समाचार सुना तो उसने अपने सेनापति चण्ड-मुण्ड को देवी को पकड़ कर लाने को कहा। दोनों भाई विशाल सेना लेकर देवी से युद्ध करने पहुँचे किन्तु माँ दुर्गा ने बात ही बात में दोनों का सेना सहित नाश कर दिया। दोनों से युद्ध करते समय मारे क्रोध के देवी का शरीर काला पड़ गया और वो पूर्णतः रक्त से नहा गयी। इसी कारण  वे "रक्तकाली" कहलायी। दोनों के वध के पश्चात उन्हें "चामुण्डा" के नाम से जाना गया। 

इसके पश्चात शुम्भ-निशुंभ ने अपने सहयोगी रक्तबीज को भेजा जो पूर्वजन्म में रक्तबीज महिषासुर का पिता रम्भासुर था। उसे ये वरदान प्राप्त था कि जहाँ भी उसके रक्त की बूँदें गिरती थी वहाँ एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था। रक्तबीज माँ काली के हाथों मारा गया। (इसके बारे में एक विस्तृत लेख अलग से प्रकाशित होगा)। अब कोई और चारा ना देख कर शुम्भ-निशुंभ स्वयं युद्ध के लिए आये। शुम्भ ने अपने छोटे भाई निशुंभ को देवी से लड़ने भेजा। निशुंभ एक बड़ी सेना लेकर युद्ध के लिए गया और वहाँ पुनः उनसे विवाह का अनुरोध किया किन्तु देवी ने क्रोध में उसे युद्ध के लिए ललकारा। निशुंभ ने देवी पर अपने सारे अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया किन्तु देवी के सामने वे तुच्छ साबित हुए। तब देवी के शक्ति प्रहार से निशुंभ मृत्यु को प्राप्त हुआ। अपने छोटे भाई की मृत्यु का समाचार मिलने पर शुम्भ क्रोध में तिलमाता हुआ माँ दुर्गा से युद्ध करने को आया किन्तु उनकी शक्ति के आगे शुम्भ की शक्ति नगण्य साबित हुई। तब देवी ने अपने त्रिशूल से शुम्भ का ह्रदय विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार समस्त दानवों का नाश हुआ और देव निष्कंटक हुए। पुनः स्वर्ग को प्राप्त कर देवों ने माँ दुर्गा की जय-जयकार की।