29 सितंबर 2018

लक्ष्मी एवं अलक्ष्मी (दरिद्रा) का विवाद

दीपावली के दिन देवी लक्ष्मी एवं श्रीगणेश के साथ कुबेर जी की भी पूजा की जाती है। उनकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से बताई जाती है जिन्होंने समुद्र से निकलने के पश्चात नारायण को अपना वर चुना। प्राचीन ग्रंथों में लक्ष्मी जी के साथ अलक्ष्मी (दरिद्रा) जी का भी उल्लेख मिलता है। अलक्ष्मी जी को नृति एवं दरिद्रा नाम से भी जाना जाता है। लक्ष्मी जी के प्रभाव का मार्ग धन-संपत्ति, प्रगति का होता है वही अलक्ष्मी जी दरिद्रता, पतन,अंधकार का प्रतीक होती है। एक बार लक्ष्मी और अलक्ष्मी में संवाद हुआ जिसमे दोनों एक दूसरे का विरोध करते हुए स्वयं को श्रेष्ठ बताने लगी।

27 सितंबर 2018

श्रीगणेश के १०८ नाम

  1. बालगणपति
  2. भालचन्द्र
  3. बुद्धिनाथ
  4. धूम्रवर्ण
  5. एकाक्षर
  6. एकदंत
  7. गजकर्ण
  8. गजानन
  9. गजनान
  10. गजवक्र
  11. गजवक्त्र
  12. गणाध्यक्ष
  13. गणपति
  14. गौरीसुत
  15. लंबकर्ण
  16. लंबोदर
  17. महाबल

25 सितंबर 2018

सती देवस्मिता

एक वैश्य जिसका नाम धर्मगुप्त था देवनगरी में रहता था। उसकी कन्या का नाम देवस्मिता था जो बहुत ही सुशील, सच्चरित्र कन्या थी। साथ ही साथ वो भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। समय के साथ देवस्मिता के रूप और गुण की चर्चा दूर-दूर तक फ़ैल गयी और फिर धर्मगुप्त ने सही समय आने पर उसका विवाह पास ही ताम्रलिपि नगर के एक धार्मिक युवक मणिभद्र से कर दिया। देवस्मिता पतिव्रता थी। घर का सारा काम -काज संभालने के साथ ही वह पति और सास- ससुर की खूब सेवा करती थी तथा अतिथियों का स्वागत सत्कार पूरी निष्ठा से करती थी जिससे सब लोग उससे प्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उसके ससुर का देहांत हो गया जिससे सारी गृहस्थी का बोझ मणिभद्र पर आ गया और उसे देवस्मिता को छोड़ व्यापार के लिए विदेश जाना पड़ा।

23 सितंबर 2018

अनंत चतुर्दशी

आप सभी को अनंत चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएँ। ये हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो गणेश चतुर्दशी के दसवें दिन मनाया जाता है। हिन्दू धर्म के अतिरिक्त जैन धर्म में भी इसका विशेष महत्त्व है। प्रतिवर्ष भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के नाम से मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा की जाती है। उनके इस रूप में उनके उस अनंत स्वरुप का वर्णन है जिसे उन्होंने अर्जुन को अपने विराट स्वरुप के रूप में दिखाया था।

21 सितंबर 2018

विजेता - धार्मिक कहानी प्रतियोगिता १ - "सत्कर्म की महिमा"

"उठिए प्राणनाथ इतनी गहरी निद्रा में सोना सृष्टि के पालनकर्ता के लिए उचित नहीं है। देखिए कितने भक्त आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।" शेष शैया पर सोते भगवान विष्णु को चिन्तित लक्ष्मी जी बार-बार जगाने का प्रयत्न कर ही रही थी कि "बहन लक्ष्मी... नारायण... कहाँ है आप लोग?" - ये कहते हुए देवी पार्वती वहाँ उपस्थित हुई।

18 सितंबर 2018

जब युधिष्ठिर की उदारता से दुर्योधन अवाक् रह गया

ये प्रसंग महाभारत के राजसू यज्ञ का है। कृष्ण ने चतुराई से भीम के हांथों जरासंध का वध करवा दिया। एक वही था जो युधिष्ठिर के राजसू यज्ञ के लिए बाधा बन सकता था। उसके बाद पांडवों ने दिग्विजय किया और समस्त आर्यावर्त के राजाओं को अपने ध्वज तले आने को विवश कर दिया। इसके बारे में विस्तार पूर्वक आप यहाँ पढ़ सकते हैं। जब राजसू यज्ञ हुआ तो पुरे आर्यावर्त से समस्त राजा इंद्रप्रस्थ को पधारे। दुर्योधन भी कर्ण, शकुनि एवं दुःशासन सहित वहाँ पहुँचा। अब तक उसने समझा था कि बटवारे में निर्जन खाण्डवप्रदेश पाकर पाण्डव हतोत्साहित हो जाएंगे किन्तु जब उसने वहाँ की चमक-धमक देखा तो हैरान रह गया। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि पांडव इतनी समृद्ध नगरी का निर्माण कर सकते हैं।

16 सितंबर 2018

जब ब्रह्मदेव ने देवर्षि नारद का भ्रम दूर किया

देवर्षि नारद को घुमक्कड़ ऋषि भी कहा जाता है क्यूँकि वे सदैव संसार का हाल जानने के लिए इधर-उधर घूमते रहते हैं। एक बार देवर्षि भगवान ब्रह्मा के दर्शनों को ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ उन्होंने प्रभु को नमस्कार किया और उनसे कहा - "पिताश्री! पृथ्वी पर लोग बड़े सरल है। मैं अनेकानेक स्थानों पर जाता रहता हूँ किन्तु मुझे कभी कोई जटिल समस्या नहीं दिखी। आपने वास्तव में बड़े सरल सृष्टि की रचना की है। किन्तु मुझे ये बात समझ में नहीं आती कि फिर भगवान विष्णु क्यों कहते हैं कि सृष्टि का पालन करना अत्यंत कठिन है? वे तो सर्वज्ञ हैं फिर जिस बात की जानकारी मुझे है वो उन्हें कैसे नहीं पता?" देवर्षि की बात सुनकर ब्रह्मदेव मुस्कुराये और उन्होंने उन्हें एक बार फिर पृथ्वी पर जाने की आज्ञा दी। देवर्षि को कुछ समझ में नहीं आया पर पिता की आज्ञा पाकर वे पृथ्वी पर पहुँचे।

14 सितंबर 2018

गणेश चतुर्थी

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ। कल से गणेश पूजा आरम्भ हो गयी है जिसे अगले १० दिनों तक पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जायेगा। वैसे तो गणेश चतुर्थी पूरे देश में मनाई जाती है किन्तु महाराष्ट्र में ये सबसे बड़ा पर्व माना जाता है और वहाँ इसकी छटा देखते ही बनती है। बहुत कम लोग ये जानते होंगे कि विनायक चतुर्थी एवं गणेश चतुर्थी में वही अंतर है जो शिवरात्रि एवं महाशिवरात्रि में है। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। शिवरात्रि की भांति ही गणेश जी की पूजा का योग हर महीने आता है जिसे हम विनायक चतुर्थी या संकष्टी चतुर्थी के नाम से मानते हैं किन्तु महाशिवरात्रि की तरह वर्ष में एक बार भाद्र महीने (सितम्बर) के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को हम गणेश चतुर्थी के रूप में मानते हैं। इस पर्व का ऐतिहासिक महत्त्व भी है। छत्रपति शिवाजी ने महाराष्ट्र में सार्वजानिक रूप से गणेश चतुर्थी मनाने की शुरुआत की। सन १८५७ की क्रांति के असफल होने के बाद श्री लोकमान्य गंगाधर तिलक ने १० दिनों तक गणेश चतुर्थी का पर्व मनाने का सुभारम्भ किया जिससे अंग्रेजी शासन की जड़ें कमजोर हुई। भारत के अतिरिक्त गणेश चतुर्थी नेपाल, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, फिजी, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में भी मनाया जाता है। इसी दिन श्रीगणेश का जन्म हुआ था, इसी दिन दुर्भाग्य से उनकी मृत्यु हुई और इसी दिन उन्हें पुनर्जीवन मिला था। श्रीगणेश के विषय में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। 

11 सितंबर 2018

वैकुण्ठ

वैकुण्ठ अथवा बैकुंठ का वास्तविक अर्थ है वो स्थान जहां कुंठा अर्थात निष्क्रियता, अकर्मण्यता, निराशा, हताशा, आलस्य और दरिद्रता ये कुछ ना हो। अर्थात वैकुण्ठ धाम ऐसा स्थान है जहां कर्महीनता एवं निष्क्रियता नहीं है। पुराणों के अनुसार ब्रह्मलोक में ब्रह्मदेव, कैलाश पर महादेव एवं बैकुंठ में भगवान विष्णु बसते हैं। श्रीकृष्ण के अवतरण के बाद बैकुंठ को गोलोक भी कहा जाता है। इस लोक में लोग अजर एवं अमर होते हैं। श्री रामानुजम कहते हैं कि वैकुण्ठ सर्वोत्तम धाम है जिससे ऊपर कुछ भी शेष नहीं रहता। इसकी स्थिति सत्यलोक से २६२००००० (दो करोड़ बासठ लाख) योजन (२०९६००००० किलोमीटर) ऊपर बताई गयी है। बैकुंठ के मुख्यद्वार की रक्षा भगवान विष्णु के दो प्रमुख पार्षद जय-विजय करते हैं। इन्ही जय-विजय को सनत्कुमारों द्वारा श्राप मिला था जिसके बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

6 सितंबर 2018

एक श्लोकी महाभारत

आदौ देवकीदेवी गर्भजननं गोपीगृहे वर्द्धनम् ।
मायापूतन जीविताप हरणम् गोवर्धनोद्धरणम् ।।
कंसच्छेदन कौरवादि हननं कुंतीतनुजावनम् ।
एतद् भागवतम् पुराणकथनम् श्रीकृष्णलीलामृतम् ।।

भावार्थ यह है कि मथुरा में राजा कंस के बंदीगृह में भगवान विष्णु का भगवान श्रीकृष्ण के रुप में माता देवकी के गर्भ से अवतार हुआ। देवलीला से पिता वसुदेव ने उन्हें गोकुल पहुंचाया। कंस ने मृत्यु भय से श्रीकृष्ण को मारने के लिए पूतना राक्षसी को भेजा। भगवान श्रीकृष्ण ने उसका अंत कर दिया। यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रदेव के दंभ को चूर कर गोवर्धन पर्वत को अपनी ऊं गली पर उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा की। बाद में मथुरा आकर भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का वध कर दिया। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरव वंश का नाश हुआ। पाण्डवों की रक्षा की। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता के माध्यम से कर्म का संदेश जगत को दिया। अंत में प्रभास क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण का लीला संवरण हुआ। 

4 सितंबर 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग मन्त्र


सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।
कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥

अर्थात सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन। उज्जैन में महाकाल, ममलेश्वर में ॐकारेश्वर। चिताभूमि (देवघर) में बैद्यनाथ, डाकिन्या में भीमाशंकर। सेतुबंध (रामेश्वरम) में रामेश्वर, दारुक वन में नागेश्वर। वाराणसी में विश्वेश्वर, गौतमी (गोदावरी) तट पर त्रयंबकेश्वर। हिमालय पर केदारनाथ, शिवालय में घुश्मेश्वर। जो कोई भी प्रातः एवं सायं इन ज्योतर्लिंगों का ध्यान करता है उसके पिछले साथ जन्मों के पाप छूट जाते हैं। जो कोई भी इनका भ्रमण एवं दर्शन करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। जो भी महेश्वर को संतुष्ट करता है वो कर्म के बंधनों से छूट जाता है। 

2 सितंबर 2018

जन्माष्टमी

आप सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामाएं। आज इस पर्व को केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को आज ही के दिन भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार ग्रहण किया था। वैसे तो सभी श्रीकृष्ण के अवतरण को कंस के वध हेतु मानते हैं किन्तु उनके इस पृथ्वी पर आने का प्रोयोजन उससे बहुत बड़ा था। आज के दिन पूरा देश, विशेषकर मथुरा पूरी तरह कृष्णमय हो जाता है। मथुरा की छटा तो ऐसी होती है कि दूर-दूर से लोग आज मथुरा पधारते हैं। जन्माष्टमी में लोग रात के १२ बजे तक व्रत करते हैं। इस रात्रि को मोहरात्रि भी कहा जाता है और जो कोई भी इस रात श्रीकृष्ण का ध्यान करता है वो मोह-माया के बंधन से छूट जाता है।