23 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला ९: श्री नागेश्वर महादेव

गुजरात के द्वारकापुरी से करीब २५ किलोमीटर दूर भगवान शिव का नवां ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर महादेव स्थित है जिसके दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। इसकी एक विशेषता ये भी है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों की तरह इस ज्योतिर्लिंग का अभिषेक साधारण जल से नहीं किया जा सकता। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक केवल गंगाजल से किया जाता है जो कि मंदिर प्रशासन की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। इस मंदिर में महादेव की एक विशाल प्रतिमा है जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। ये इतनी विशाल है कि मंदिर की ओर जाते हुए ये कई किलोमीटर पहले से ही दिख जाती है। वैसे तो ये मंदिर और शिलिंग बहुत प्राचीन है किन्तु वर्तमान के मंदिर का निर्माण टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने १९९६ में शुरू करवाया किन्तु बीच में उनकी हत्या हो जाने के बाद इसे उनके परिवार ने पूर्ण किया। इसके निर्माण में करीब १ करोड़ २५ लाख का खर्च आया था जिसे गुलशन कुमार चैरिटबल ट्रस्ट ने अदा किया था। टी सीरीज द्वारा बनाये गए कई धार्मिक विडिओ में भी आपको इस मंदिर के दर्शन हो जाएंगे। मूल शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थित है जो काफी बड़े आकर का है। इसके ऊपरी हिस्से पर चाँदी का आवरण चढ़ाया गया और और साथ ही साथ शिवलिंग के ऊपर चाँदी द्वारा निर्मित नाग की प्रतिमा है जो इसके नाम को सार्थक करती है। इस शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गयी है। गर्भगृह में सभी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहाँ केवल वही प्रवेश कर सकते हैं जिन्हे अभिषेक करवाना हो और पुरुष यहाँ केवल धोती धारण करके ही प्रवेश कर सकते हैं। इस शिवलिंग के अतिरिक्त भी दो अन्य शिवलिंगों को नागेश्वर कहा जाता है। इसमें से एक हैदराबाद के निकट औढ़ाग्राम में स्थित है और दूसरा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित शिवलिंग है जिसे नागेश्वर के साथ जागेश्वर महादेव भी कहा जाता है। हालाँकि इन दोनों जगह के स्थानीय निवासी इन्हे ही ज्योतिर्लिंग मानते हैं किन्तु शिवपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण की नगरी द्वारकापुरी के निकटनागेश्वर शिवलिंग को ही वास्तविक ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

इसके पीछे की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक भयानक राक्षस था जिसका नाम दारुक था। उसकी पत्नी दारुका ने कठिन तपस्या कर देवी पार्वती को प्रसन्न कर लिया और उनसे ये वरदान प्राप्त किया कि जिस जंगल में वे रहते हैं वहाँ कोई उनसे जीत ना सके एवं वे अपनी इच्छानुसार इस जंगल को अपने साथ ले जा सकें। इस प्रकार के वर को प्राप्त कर उन्होंने पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा दी। वे जहाँ चाहते उस जंगल के साथ पहुँच जाते और अत्याचार करते किन्तु देवी पार्वती के आशीर्वाद के कारण कोई उनका कुछ अहित ना कर पाता। जब उनका आतंक हद से अधिक हो गया तो अन्य ऋषि-मुनि महर्षि और्व के पास पहुँचे और उनसे सहायता माँगी। जब ऋषि और्व ने उनका दुःख सुना तो उन्होंने क्रोधित हो दारुक और दारुका को श्राप दे दिया कि अगर वे किसी भी तप में लीन व्यक्ति पर आक्रमण करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी। तब इस श्राप के भय से दारुक और दारुका ने अपने उस जंगल को समुद्र के बीचों बीच स्थित कर दिया और वहाँ से आने वाले व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया। वहाँ से कुछ दूर नगर में सुप्रिय नाम का एक परम शिवभक्त वैश्य रहता था। एक बार वो अपनी पत्नी सहित व्यापार का सामान लेकर उसी समुद्र से गुजर रहा था कि उस वन में दारुक नेउसे पत्नी सहित बंदी बना लिया। उसपर अनेक अत्याचार किये गए और उसे कारागार में डाल दिया गया। वैश्य सुप्रिय वहाँ भी अपनी पत्नी सहित भगवान शिव का पार्थिव शिवलिंग बना कर उसकी पूजा में तल्लीन हो गया। एक बार दारुक ने उसे शिव पूजा में लीन देखा और क्रोधित हो उसे मारने हेतु उस कारगर में पहुँचा। शस्त्र सहित उस महाभयंकर असुर को देख कर भी सुप्रिय भयभीत नहीं हुआ और अपनी पूजा करता रहा। उसे विश्वास था कि भगवान शिव के रहते उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। 

जब दारुक ने देखा कि सुप्रिय पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो उसने उसे मारने के लिए अपना खड्ग उठाया। तभी उसी जगह सूर्य के तेज को लज्जित करने वाले महारुद्र एक स्वर्ण सिँहासन पर प्रकट हुए। तब दारुक ने भयभीत होते हुए महादेव से कहा - "हे प्रभु! मुझ जैसे साधारण राक्षस को मारने के लिए आप स्वयं यहाँ आये हैं जो सर्वथा उचित नहीं है। आपके और मेरे बल का क्या मेल अतः अगर आप मुझ निर्बल पर प्रहार करेंगे तो ये अन्याय हो जाएगा। अगर ये सुप्रिय आपका इतना बड़ा भक्त है तो इसी को मेरा सामना करने दें।" तब महादेव ने हँसते हुए सुप्रिय को अपना प्रलयंकारी पाशुपतास्त्र प्रदान किया जिसके प्रहार से सुप्रिय ने क्षण भर में ही दारुक का उसके सभी बंधू-बांधवों सहित नाश कर दिया। तब सुप्रिय ने भगवान शिव से उसी स्थान पर रुकने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर महादेव वहाँ नागेश्वर नाम से स्थित हो गए। दारुक का विनाश करने के कारण उनका एक नाम दारुक नागेश्वर भी पड़ा। भक्ति भाव से लिप्त सुप्रिय अपनी पत्नी सहित शिवलोक को चला गया। जो कोई भी इस पवित्र तीर्थ का दर्शन करता है उसके समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है और वो निश्चय ही शिवलोक को प्राप्त करता है। जय शिव शंकर।