8 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला ३: श्री महाकालेश्वर

आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

अर्थात आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।

इस एक ही श्लोक से महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा पता चलती है। मध्यप्रदेश के प्राचीन शहर उज्जैन दो चीजों के लिए प्रसिद्ध है। एक महाकुम्भ एवं दूसरे श्री महाकालेश्वर महादेव। कहते हैं कि ये शिवलिंग स्वयंभू है जिसके ऊपर बाद में मंदिर बना दिया गया। सोमनाथ की भांति ये मंदिर भी ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ शक्तिपीठ भी माना जाता है जो यहाँ उनकी पत्नी महाकाली कहलाती है। सोमनाथ की ही भांति मुस्लिम शासकों ने महाकेश्वर मंदिर को भी नष्ट करने का पूरा प्रयास किया। सन १२३४ में मुग़ल शासक इल्तुतमिश ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया किन्तु हमेशा की तरह शिवलिंग को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। उसके बाद सभी राजाओं ने इस मंदिर की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा। कहा जाता है कि भगवान महाकाल के कारण ही महाराज विक्रमादित्य इतने महान सम्राट बने और उन्ही के कारण किसी और राज्य का उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं होता था। महाकवि कालिदास एवं विद्वान बाणभट्ट का कर्मक्षेत्र भी उज्जैन ही रहा और उनके काव्यों में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्रभाव साफ़ झलकता है। यही नहीं स्वयं श्रीकृष्ण ने अपनी शिक्षा-दीक्षा के लिए महाकाल की नगरी उज्जैन को ही चुना और महादेव के सानिध्य में केवल ६४ दिनों में ही ६४ कलाओं में वे पारंगत हो गए। कुम्भ मेले के समय तो उज्जैन और महाकालेश्वर की छटा देखते ही बनती है। महादेव को भस्म क्यों प्रिय है इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। भगवान महाकाल की ये भस्मारती पूरे विश्व में प्रसिद्द है जिसे देखने के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं और ये कई कारणों से विशिष्ट है: 
  • यही एक ज्योतिलिंग है जिनकी आरती प्रतिदिन भस्म से की जाती है। ये प्रतिदिन प्रातः भगवान महाकाल को नींद से जगाने की क्रिया है। 
  • हर दिन उनका श्रृंगार भिन्न तरीके से किया जाता है जिसमे भस्म का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है।
  • पहले महाकाल की भस्मारती श्मशान के मुर्दे के भस्म से की जाती थी किन्तु अब ये प्रथा बंद हो गयी है। अब उनकी आरती कपिला गाय के गोबर के कंडे, शमी, पीपल और पलाश के भस्म से उनकी आरती और श्रृंगार किया जाता है। 
  • आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक कापालिक योगी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ये अर्जी डाली गयी है कि महाकाल की आरती पहले की तरह ही श्मशान के मुर्दे की भस्म से की जाये। हालाँकि कोर्ट का ये कहना है कि पूजा कैसे की जाये इसमें कोर्ट कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा किन्तु चूँकि भस्म लोगों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है इसी कारण मुर्दे की भस्म का प्रयोग करना उचित नहीं है। 
  • महाकाल की भस्म प्रसाद के रूप में लोग ग्रहण करते हैं। कहते हैं जो भी महाकाल ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर उसकी भस्मारती को ग्रहण करते हैं उन्हें निश्चय ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
  • महाकाल की भस्मारती को स्त्रिओं को देखना मना है इसी कारण भस्मारती के समय महिलाओं को या तो वहाँ प्रवेश नहीं मिलता अथवा जो भी स्त्रियाँ वहाँ हो उनका चेहरा कपडे या घूँघट से ढक दिया जाता है। 
  • भस्मारती के समय पुजारियों को केवल एक कटिवस्त्र (धोती) पहनने की अनुमति होती है। उसके अतिरिक्त वे और कोई वस्त्र धारण नहीं कर सकते।
वर्तमान का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग तीन भागों में बटा हुआ है। ऊपरी खंड में श्री नागचंद्रेश्वर, मध्य में श्री ॐकारेश्वर एवं निचले गर्भगृह में महाकालेश्वर विद्यमान हैं। गर्भगृह में महाकाल पश्चिम में श्रीगणेश, उत्तर में माता पार्वती, पूर्व में कार्तिकेय एवं दक्षिण में नंदी से घिरे हैं। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में एक कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में उज्जैन में राजा चन्द्रसेन का राज्य था। उनके राज्य में दूषण नाम के एक दैत्य ने आतंक मचाना आरम्भ कर दिया। देव, दानव, मानव, गन्धर्व सभी उससे आतंकित रहते थे क्योंकि उसे ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त था कि उसे कोई हरा या मार नहीं सकता। उसके अत्याचार से जब सब त्राहि-त्राहि करने लगे तब ब्रह्मदेव की प्रार्थना पर महादेव ने उज्जैन में महाकाल का अवतार लिया और दूषण सहित सभी असुरों का समूल नाश कर दिया। उसके बाद चन्द्रसेन और समस्त प्रजा ने उनसे प्रार्थना की कि भविष्य में भी किसी भी आपदा से रक्षा के लिए वे वही रुक जाएँ। तब उनकी इच्छा पूरी करने के लिए महादेव वहाँ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए। एक और कथा के अनुसार चन्द्रसेन की महादेव के प्रति अनन्य भक्ति देख कर एक बालक कहीं से एक पथ्थर लेकर उसकी पूजा करने लगा। उसे अपनी कोई सुध-बुध नहीं रही। जब उसकी माता उसे बुलाने आयी तब भी वो समाधि में लीन रहा। तब उसकी माता ने क्रोध में आकर उस शिवलिंग को उठा कर फेक दिया जिससे बालक अत्यंत दुखी हुआ। तब महादेव के चमत्कार से वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण हो गया और तभी वहाँ रामभक्त श्री हनुमानजी अवतरित हुए और उन्होंने उस बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जन को सम्बोधित किया: 

ऋते शिवं नान्यतमा गतिरस्ति शरीरिणाम्‌॥
एवं गोप सुतो दिष्टया शिवपूजां विलोक्य च॥
अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवम्‌ वाप्तवान्‌।
एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्द्धनः
इह भुक्तवा खिलान्‌ भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति॥
अस्य वंशेऽष्टमभावी नंदो नाम महायशाः।
प्राप्स्यते तस्यस पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम्‌॥

अर्थात शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं है। इस गोप बालक ने अन्यत्र शिव पूजा को मात्र देखकर ही, बिना किसी मंत्र अथवा विधि-विधान के शिव आराधना कर शिवत्व-सर्वविध, मंगल को प्राप्त किया है। यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इस लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा। इसी के वंश का आठवाँ पुरुष महायशस्वी नंद होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण कृष्ण के नाम से अवतरित होंगे। तब से ये मान्यता है कि महाकाल के रहते उज्जैन का कोई अनिष्ट नहीं हो सकता। जय महाकाल।।