27 जुलाई 2018

महादेव को क्यों प्रिय है चिता की भस्म?

हम सभी ने देखा है कि भोलेनाथ को वैसी चीजें ही पसंद हैं जो अन्य किसी देवता को पसंद नहीं। ये भी कह सकते हैं कि जो समस्त विश्व के द्वारा त्याज्य हो उसे महादेव अपने पास शरण देते हैं। चाहे वो चंद्र हो, वासुकि, हलाहल, भूत-प्रेत, राक्षस, दैत्य, दानव, पिशाच, श्मशान अथवा भस्म। देवों में देव महादेव ही ऐसे हैं जो देव-दानव सभी के द्वारा पूज्य हैं। सभी जानते हैं कि भगवान शिव को चिता की भस्म अत्यंत प्रिय है। उनका श्रृंगार भी भस्म से किया जाता है। शैव पंथ के साधक श्मशान और चिता की राख का प्रयोग अपनी साधना के लिए करते हैं। तो ये जानने की इच्छा होती है कि आखिर महादेव को वो चिता की रख क्यों प्रिय है जिसे कोई अन्य देवता देखना नहीं चाहता? इसे जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 

जब महादेव की पहली पत्नी देवी सती के पिता ब्रह्मपुत्र प्रजापति दक्ष ने द्वेषवश महादेव को अपने यज्ञ में नहीं बुलाया तब सती महादेव के रोकने के बाद भी उनके अपमान का कारण जानने के लिए अपने पिता के यज्ञ में पहुँच गयी। वहाँ दक्ष ने महादेव का भांति-भांति प्रकार से अपमान किया जिसे देवी सती सह ना सकी और उसी यञकुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी। जब महादेव को इसके बारे में पता चला तो मारे क्रोध के उन्होंने अपनी जटा से रुद्रावतार वीरभद्र को उत्पन्न किया और उसे दक्ष और यज्ञ के विनाश की आज्ञा दी। वीरभद्र यञशाला पहुँचे और भगवान विष्णु के रहते हुए भी उन्होंने दक्ष का सर काट डाला और यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। उसके बाद भगवान शंकर यञशाला पहुँचे और वहाँ पड़े भस्म को अपने पूरे शरीर पर मल लिया और फिर देवी सती के शरीर को लेकर इधर उधर भटकने लगे। उनके इस प्रकार वैराग्य और क्रोधित होने के कारण सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर को ५१ भागों में खंडित कर दिया और वे भाग पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ देवी के शक्तिपीठ की स्थापना हुई। उसके बाद भी भगवान शिव देवी सती के भस्म को लगाए बहुत काल तक श्मशान में समाधि में लीन रहे। महादेव के शरीर पर जो भस्म हम देखते हैं वो वास्तव में देवी सती के पार्थिव शरीर का भस्म है और इसी कारण उन्हें ये अत्यंत प्रिय है। इसके अतिरिक्त भी इसके और कई दार्शनिक विवरण हैं।  
  • राख विरक्ति का प्रतीक है। भगवान शिव लौकिक देव लगते हैं और उनका रहन-सहन एक आम सन्यासी सा लगता है। एक ऐसे ऋषि सा जो गृहस्थी का पालन करते हुए मोह माया से विरक्त रहते हैं और संदेश देते हैं कि अंत काल सब कुछ राख हो जाना है।
  • ब्रह्मा सृष्टि की निर्माण करते हैं और विष्णु पालन-पोषण लेकिन जब सृष्टि में नकारात्मकता बढ़ जाती है तो भगवान शिव प्रलय लाते हैं। भस्म इसी प्रलय या विध्वंस का प्रतीक भी है जो सदा याद दिलाता है कि अधर्म और पाप के मार्ग पर चलने वाले का अंत राख ही होता है। 
  • इसका एक दार्शनिक अर्थ ये है कि यह शरीर जिस पर हम घमंड करते हैं, जिसकी सुविधा और रक्षा के लिए ना जाने क्या-क्या करते हैं एक दिन इसी इस भस्म के समान हो जाएगा।
  • मनुष्य के लिए मृत्यु अवश्यम्भावी है और उसके पश्चात ये शरीर चिता की राख ही बन जाएगा। 
  • जब कोई वस्तु अग्नि के स्पर्श से राख में बदलती है तो परम पवित्र को जाती है। किसी भी प्रकार का दुर्गुण उसमे शेष नहीं रहता। 
  • कई सन्यासी तथा नागा साधु पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं। यह भस्म उनके शरीर की कीटाणुओं से तो रक्षा करता ही है तथा सब रोम कूपों को ढंककर ठंड और गर्मी से भी राहत दिलाती है। इसके अतिरिक्त मच्छर, खटमल आदि जीव भी भस्म रमे शरीर से दूर रहते हैं।
  • श्रौत, स्मार्त और लौकिक ऐसे तीन प्रकार की भस्म कही जाती है। श्रुति की विधि से यज्ञ किया हो वह भस्म श्रौत है, स्मृति की विधि से यज्ञ किया हो वह स्मार्त भस्म है तथा कण्डे को जलाकर भस्म तैयार की हो वह लौकिक भस्म है।
वैसे तो शिवलिंग को भस्म से नहलाना आम बात है किन्तु उज्जैन स्थित महाकालेश्वर की भस्मार्ती विश्व भर में प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है क‌ि वर्षों पहले श्मशान भस्‍म से भूतभावन भगवान महाकाल की भस्‍म आरती होती थी लेक‌िन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है और अब कंडे की भस्‍म से आरती-श्रृंगार क‌िया जा रहा है। वर्तमान में महाकाल की भस्‍म आरती में कपिला गाय के गोबर से बने औषधियुक्त उपलों में शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर बनाई भस्‍म का प्रयोग क‌िया जाता है। जलते कंडे में जड़ीबूटी और कपूर-गुगल की मात्रा इतनी डाली जाती है कि यह भस्म सेहत एवं वातावरण के लिए बहुत उपयुक्त और प्रभावी बन जाती है।