6 जुलाई 2018

समदर्शी मनुष्य का महत्त्व

महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना ही योग है। यही वो स्थिति है जब व्यक्ति द्रष्टा भाव से जगत को निहारता भर है किन्तु उसमे लिप्त नहीं होता। वो सब कुछ देखता हुआ भी यही समझता है कि सब इन्द्रियां अपने-अपने कर्म को कर रही है और वह स्वयं कुछ नहीं कर रहा। अतः उसे किसी चीज  का क्षोभ अथवा प्रसन्नता नहीं होती। वो ना दुखी होता है और ना ही आनंदित, ना चीजों में आसक्त होता है और ना ही विरक्त। वह तो आत्मविभोर हो कर स्वयं में आनंदित रहता है। फिर चाहे वन हो या नगर, महल हो या श्मशान, उसके लिए सब सामान है। वह सर्वत्र सुखी और निर्भय रहता है। इस प्रकार निरंतर आत्मभाव, ब्रह्मभाव से परमानन्द में मग्न व्यक्ति कही सम्मानित तो कही अपमानित होकर भी समदर्शी बने रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए आचार्य शंकर ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ "विवेक चूड़ामणि" में कहा है -


अपि कुर्वन्नकुर्वाणश्चभोक्ता फलभोग्यापि।
शरीरयाप्यशरीरयेष परिछिन्नोपि सवर्गः।।
अशरीरं सदा संतमिमं ब्रह्मविन्दं क्वचित। 
प्रियप्रिये न स्पृशतत्सथैव च शुभाशुभे।।
क्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेतकेवलात्मना।। 
शिव एवं स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः।।

अर्थात सदा ब्रह्मभाव, साक्षीभाव में स्थित महात्मा सब कुछ करता हुआ भी अकर्ता है, नाना प्रकार के फल भोगता हुआ भी अभोक्ता है, शरीरधारी होने पर भी अशरीरी है एवं परिच्छिन्न होने पर भी सर्वव्यापी है। सदा अशीर भाव में स्थित रहने से इस ब्रह्मवेत्ता को प्रिय अथवा अप्रिय, शुभ अथवा अशुभ कभी छू नहीं सकते। जो लक्ष्य और अलक्ष्य दोनों दृष्टियों को त्याग कर केवल एक आत्मरूप में ही स्थित रहता है, वो ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महापुरुष साक्षात् शिव ही है।

सन्दर्भ अखंड ज्योति

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