20 जुलाई 2018

ॐ का महत्त्व

मन्त्र शक्ति की महत्ता बताने की आवश्यकता नहीं है। मन्त्र में एक सूक्ष्म शक्ति समाहित होती है जो उच्चारण के साथ प्रतिध्वनि द्वारा अपना प्रभाव डालती है। उसी के प्रतिनिधि स्वरुप "ॐ" (अ, उ, म) की महत्ता अनेक शास्त्रों में गयी गयी है। इसमें "अ" विष्णु को, "उ" शंकर को और "म" ब्रह्मा को प्रदर्शित करता है। ॐ जिसको "प्रणव" भी कहते हैं, शास्त्र इसे ब्रह्म की शक्ति से समन्वित मानते हैं। ॐ को आदि-अक्षर कहा गया है। इस ॐ अर्थात अ, उ एवं म अक्षर समूहों से संनिबद्ध सर्वव्यापक परब्रह्म के सम्बन्ध में कठोपनिषद १/२/१५ में उपनिषदकार कहते हैं -

सर्वे वेदा यत्पदमानन्ति,
तापसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति,
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत।। 


अर्थात सम्पूर्ण वेद जिस पद का कथन करते हैं, सम्पूर्ण तपस्याएं जिस लक्ष्य का बोध कराती हैं, जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है, संक्षेप में वही परमपद ॐ है। 

श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में भी ॐ के माहात्म्य का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है -

ओमित्येकासक्षरं ब्रह्म व्यहारन्मामनुस्मारं। 
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमा गतिम्।।

अर्थात जो व्यक्ति इस नाम का उच्चारण और चिंतन-मनन करता हुआ शरीर को त्यागता है वो निश्चय ही परमपद को प्राप्त करता है। 

महर्षि यञवल्क्य ने भी इस सन्दर्भ में कहा है -

आद्यं यत्राक्षरं ब्रह्मत्रयी यत्र प्रतिष्ठिताः। 
स गुह्योन्यस्त्रिवृद वेदो यो वेदैन स वेदवित।।

अर्थात वेदों का अदि अक्षर ॐ साक्षात् ब्रह्म है, जो ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनों देवताओं का अधिष्ठान है। इस प्रकार त्रिदेवात्मक वेद अति गहन है। इस लोक में जो ॐ को जानते हैं, वे ही सर्ववेत्ता एवं वेदवेत्ता हैं। आदि अक्षर ॐ में त्रिदेव किस प्रकार अधिष्ठित हैं, इसका वर्णन तंत्र-ग्रंथों में मिलता है -

अकारो विष्णुरुद्धिस्ट, रूकरस्तु महेश्वरः। 
मकारेणोच्यते ब्रह्मा प्रणवेन त्रयो मताः।।

अर्थात "अकार" विष्णु का वाचक है, "उकार" महेश्वर का और "मकार" ब्रह्मा का वाचक है। अतः त्रिअक्षारमय ओंकार साक्षात् परब्रह्म का वाचक है। 

"तस्य वाचकः प्रणवः" सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने उस परमात्मा का वाचक ॐ को माना है और कहा है कि इस लघुकाय ॐ मन्त्र का जाप सभी प्रकार की सिद्धियों और मुक्ति का प्रदाता है। महाभारत में महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि जिस प्रकार किसी व्यक्ति का नाम लेकर पुकारने से वो प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपने प्रिय नाम ॐ के उच्चारण से प्रसन्न हो जाते हैं। अतः ॐ ही परम लक्ष्य एवं परम साध्य है। 

सन्दर्भ - अखंड ज्योति