13 जुलाई 2018

भागलपुर के खिरनी घाट का श्री त्रिलोकीनाथ शिव मंदिर - भाग २

पिछले लेख में मैंने आपको खिरनी घाट के विशाल वटवृक्ष और एक नाग के बारे में बताया था। आज वहाँ के बारे में अन्य जानकारी दूंगा। वैसे तो खिरनी घाट में कई छोटे-बड़े मंदिर है और सबसे बड़ा मंदिर तो वहाँ देवी माँ का है लेकिन वहाँ का सबसे प्रसिद्ध मंदिर वही भगवान शिव का मंदिर है जहाँ पर वहाँ के पंडितों के अनुसार वो नाग रहा करता था। जब मैं ये सब जानकारी ले रहा था और उस मंदिर के बारे में मैंने उन पंडितजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि उस मंदिर के पास एक अन्य पंडित दी मिलेंगे वो इसके बारे में और अधिक विस्तार से बता सकते हैं। मैं जब वहाँ पहुंचा तो देखा एक बुजुर्ग पर मजबूत व्यक्ति रुद्राक्ष की माला पहने बालू और सीमेंट के बीच एक छोटा स्थान बनाने में व्यस्त है। मैंने उससे पूछा कि ये जगह क्यों बना रहे हैं तो उसने कहा कि यहाँ पर नंदी की प्रतिमा की स्थापना की जाएगी। फिर मैंने उससे शिव मंदिर के बारे में जानना चाहा तो उसने काफी अच्छी प्रतिक्रिया दी। मैंने उससे पूछा कि आप पंडित होते हुए ये सब काम भी कर लेते हैं? तब उसने हँसते हुए कहा कि वो ब्राह्मण नहीं है। एक तरह से उसी ने इस मंदिर की स्थापना की है और इसके रख-रखाव का काम भी करता है इसी कारण लोगो उसे भी भी पंडितजी ही बुलाते हैं। 


उस व्यक्ति का नाम "खोखा यादव" था और ये जानकर बड़ा अच्छा लगा कि एक व्यक्ति जो ब्राह्मण नहीं है फिर भी इस मंदिर का पूरा कर्त्ता-धर्ता है और उसका रुतबा वहाँ सबसे बड़ा है। उसके अनुसार वही वहाँ का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब कुछ है, अर्थात मंदिर के लिए किसी भी तरह का काम हो, वे सदैव उसके लिए तैयार रहता है।  चूँकि उसके अनुसार उसी ने उस मंदिर की स्थापना की थी तो मैंने उस मंदिर का थोड़ा इतिहास जानना चाहा। वैसे तो उसे वहाँ की हर चीज से प्रेम था पर विशेषकर उस शिव मंदिर में तो जैसे उसके प्राण बचते थे। उसने बहुत उत्साह से बताना शुरू किया। उसके अनुसार सारी कहानी शुरू हुई एक शिवलिंग से जो वहाँ कहाँ से आया, किसी को पता नहीं। कहते हैं कि गंगा का जलस्तर नीचे उतरने से वो शिवलिंग वहाँ मिला। ये बात १९८५-१९८६ की है। लेकिन दुर्भाग्यवश एक दिन किसी ने उस मूल शिवलिंग को वहाँ से गायब कर दिया। उन्होंने ये भी बताया कि शायद उस समय के सांप्रदायिक तनाव का फायदा उठा कर किसी ने ऐसा किया हो। खैर उस शिवलिंग के गायब होने के बाद जो शिवलिंग अभी वहाँ है उसे देवघर से लेकर स्थापित किया गया। उस पंडित के अनुसार उसने खुद भागलपुर से पैदल देवघर जाकर उस शिवलिंग को लाया और उसे विधिवत स्थापित किया। इस नए शिवलिंग की स्थापना आज से ३० वर्ष पूर्व सन १९८८ में की गयी। उसके अनुसार उस मंदिर की एक-एक ईंट उसने स्वयं लगाई है। इस मंदिर की स्थापना के लिए उसने लोगों से चंदा भी माँगा। उसके अनुसार आज जो मंदिर इस परिसर में खड़ा है उसके निर्माण में सबसे अधिक योगदान महिलाओं ने दिया है। इस मंदिर के निर्माण में ९०% चंदा महिलाओं द्वारा ही आया है। 

जब ये मंदिर बन गया तब कुछ लोगों ने अपनी श्रद्धा के अनुसार कुछ और मूर्तियाँ, जिनमे एक श्रीगणेश की मुख्य मूर्ति है, को वहाँ स्थापित करने के लिए दान दिया। जगह की कमी होने के कारण उन मूर्तियों को उसी मुख्य शिव मंदिर में एक कोने में स्थापित किया गया। उसके अलावा ना जाने कितनी मूर्तियां है जो स्थापित नहीं हो पायी और अभी भी अंदर के कमरे में ऐसी की तैसी पड़ी है। जिस नाग की समाधि के बारे में हमने पिछले लेख में पढ़ा था, वो बिलकुल इस मुख्य शिव मंदिर के पीछे बना है। खिरनी घाट परिसर में इस शिव मंदिर के अलावा एक मुख्य देवी मंदिर, एक काली मंदिर, एक सीता-राम का मंदिर, एक हनुमान मंदिर और उसके आलावा एक अन्य मंदिर और काली माँ का एक अपूर्ण मंदिर भी बना हुआ है लेकिन सबसे अधिक महत्त्व इस शिव मंदिर का ही है। हालाँकि नवरात्रि में मुख्य देवी मंदिर में बहुत चमक-धमक रहती है लेकिन उस समय भी शिव मंदिर में नित्य पूजा की जाती है। शिवरात्रि और नागपंचमी के दिन शिव मंदिर के साथ-साथ उस नाग की समाधि पर भी बहुत अधिक भीड़ उमड़ती है। गर्मी के दिनों में गंगा में अब बहुत थोड़ा ही पानी रहता है और वहाँ नदी की जगह एक बड़ा टीला सा नजर आता है लेकिन श्रावण के दिनों में जब बरसात होती है तो भागलपुर के हर घाट के साथ इस घाट में भी गंगा का जलस्तर बढ़ता है और वो वापस एक बड़ी नदी के रूप में आ जाती है। 

खोखा यादव कहते हैं कि अब उनकी उम्र हो चली है और पता नहीं वे और कितने दिन रहेंगे। उनकी सभी संतानें अपने-अपने काम में व्यस्त है और इसी कारण मंदिर में समय नहीं दे पाती। कुल मिलकर उनके अनुसार उनके बाद ऐसा कोई और नहीं है जो उनकी ही तरह भक्ति-भाव से इस मंदिर की सेवा करे। इसी कारण वे अब इस मंदिर को बिहार सरकार को सुपुर्द करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने मुझसे भी कहा कि उन्हें सरकारी काम काज की जानकारी है नहीं और ना ही वे अधिक शिक्षित हैं इसीलिए मैं उनके साथ सरकारी दफ्तर चलूँ और इसकी अर्जी दे दूँ। दुर्भाग्य से मैं ऐसा नहीं कर सका क्यूंकि उसी दिन मुझे वापस बैंगलोर के लिए निकलना था। शायद बाद में वापस जाने पर ये कार्य हो सके। वैसे वे चाहे पढ़े लिखे हो या ना हो पर मन्त्रों का धारा प्रवाह उच्चारण कर लेते हैं। दुखी मन से कहते हैं कि धर्म और मन्त्रों का अच्छा ज्ञान होने के बाद भी वे इस मंदिर में पूजा नहीं कर सकते क्यूंकि वे ब्राह्मण नहीं है। कुल मिलकर खिरनी घाट मंदिर को बहुत प्राचीन तो नहीं पर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल तो माना ही जा सकता है। आशा करता हूँ कि ये मंदिर सदा सुरक्षित हाथोँ में रहे और इसे सरकारी मदद और संरक्षण भी मिल सके।