4 जुलाई 2018

२१० साल से अधिक पुराना भागलपुर का दुग्धेश्वरनाथ महादेव

आप भागलपुर के किसी भी व्यक्ति से अगर ये पूछे कि इस शहर का सबसे व्यस्त और भीड़-भाड़ वाला इलाका कौन सा है तो वो वेराइटी चौक का नाम लेगा। भागलपुर का मुख्य बाजार खुद ही बेहद भीड़ वाला इलाका है और इस बाजार के बीचोंबीच स्थित इस चौक पर तो पैदल चलना भी मुश्किल है। इसी चौंक पर एक शिव मंदिर है जिसपर शायद ही वहाँ से गुजरने वाला कोई व्यक्ति सर ना झुकाता हो। वैसे तो यहाँ हर दिन भीड़ रहती है लेकिन सोमवार के दिन तो इसके आस-पास से निकलना मुश्किल हो जाता है। ये शिव मंदिर भागलपुर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है लेकिन कितना पुराना, ये जानने के लिए मैं वहाँ गया। मेरा जन्म भागलपुर में ही हुआ है और इतने सालों में मैं एक बार भी उस मंदिर के अंदर नहीं गया था। तो इस कारण मैं पहली बार उस मंदिर के अंदर जाने वाला था। सौभाग्य से जब मैं वहाँ पहुँचा तो मंदिर बंद होने वाला था और अधिक भीड़ नहीं थी। अच्छी बात ये थी कि वहाँ के पुजारी भी वहाँ मौजूद थे जिनसे बात की जा सकती थी। वो एक युवा पुजारी था जो अपने फेसबुक पर व्यस्त था। मैंने उससे बात करना शुरू किया और बताया कि मेरे धार्मिक वेबसाइट के लिए मैं कुछ जानकारी जुटा रहा हूँ। उसने बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दी और फिर हम बात करने लगे। 

मैंने उससे इस मंदिर के निर्माण के बारे में पूछा तब उसने बताया कि उसे इस मंदिर के निर्माण की वास्तविक तिथि तो नहीं मालूम पर ये मंदिर २१० साल से अधिक पुराना है। मैं भी हैरान था। मेरी मान्यता ये थी कि ये मंदिर १०० साल से तो अधिक पुराना है ही लेकिन इतना प्राचीन है ये नहीं पता था। उसने आगे बताना शुरू किया कि वो और उसका परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर के पुजारी का पद संभाल रहा है। दो साल पहले ९० वर्ष में उसके पिता की मृत्यु के पश्चात अब वो इस मंदिर का पुजारी है। वो उस पीढ़ी का छठा वंशज है जो इस काम को कर रहा है। इससे पहले उसके पिता करीब ६० वर्षों से इस मंदिर के पुजारी थे। अगर मैं ३५-४० वर्ष भी एक पीढ़ी का कार्यकाल मान कर चलूँ तो भी ये मंदिर २००-२४० साल पुराना होगा। मंदिर की अवस्था बड़ी अच्छी थी। फर्श चिकने पत्थरों से बना था। उसने बताया कि १५ साल पहले दान की राशि से इस मंदिर का जीर्णोंद्धार हुआ है। वहाँ पत्थर से बना एक मुख्य शिवलिंग स्थापित था जिसका हर सोमवार वृहद् रूप से अभिषेक होता है। उस दिन उसे सजाया जाता है और महामृत्युञ्जय मन्त्रों से उनकी पूजा की जाती है। मैंने उससे पूछा कि क्या यही वो शिवलिंग है तो उसने बताया कि ये मूल शिवलिंग नहीं है बल्कि इसकी स्थापना बाद में की गयी है। हालाँकि मुझे जान कर हैरानी हुई कि ये शिवलिंग भी करीब १००-१२५ वर्ष पुराना है। वैसे देखने में वो आज भी नया जैसा लगता है। इसके चारो ओर चबूतरे की स्थापना बाद में की गयी। समय कम था इसीलिए मैंने जल्दी से उससे इस मंदिर की स्थापना की कहानी जननी चाही जिसे उसने बड़े चाव से सुनाना शुरू किया। 

उसने उस मंदिर के कोने की ओर स्थित एक बेहद पुराने शिवलिंग की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये शिवलिंग ही इस मंदिर का मूल शिवलिंग है। एक आश्चर्यजनक बात उसने ये बताई कि ये शिवलिंग"स्वयंभू" है अर्थात इसकी किसी ने स्थापना नहीं की बल्कि ये स्वयं ही प्रकाट हुआ है। अब २०० साल पहले यहाँ की वस्तुस्थति कैसी थी ये तो नहीं पता पर उसके अनुसार उस समय एक दिन अचानक ही ये शिवलिंग पृथ्वी से ऊपर आया। कुछ दिनों तक तो लोगों ने गौर नहीं किया पर फिर इसने लोगों का ध्यान खींचा और लोग वहाँ पूजा करने लगे। उसके अनुसार लोगों की भीड़ देख कर यहाँ के दीवान या शासक (जो भी हो) ने इसे मंदिर का रूप देने का निर्णय लिया और उसके पूर्वज को यहाँ का पहला पुजारी बनाया। अगले कुछ वर्षों में इस शिवलिंग की ख्याति फ़ैल गयी और मुंगेर (जो उस समय भागलपुर का एक अंग था), पटना, कलकत्ता और दूर दूर से लोग इसके दर्शनों को आने लगे।

इस शिवलिंग के प्रादुर्भाव के कुछ वर्षों के बाद एक ऐसी घटना घटी जिसने इसकी महत्ता और भी बढ़ा दी। इस शिवलिंग की ही तरह एक और पत्थर उसके थोड़ी ही दूर पर ऊपर आया। लोगों ने ध्यान से देखा तो उसमे हनुमान की आकृति दिखाई दी। ये कहते हुए उसने उस शिवलिंग के पास रखे, सिन्दूर से पूरी तरह नहाये हनुमानजी की एक मूर्ति की ओर इशारा किया। मैंने पास जाकर देखा तो पाया कि वास्तव में ये कोई गढ़ी गयी प्रतिमा नहीं है बल्कि पत्थर पर हनुमान की आकृति ही उकेरी गयी लगती है। उसने आगे बताना शुरू किया कि इस शिवलिंग की तरह ये हनुमान की प्रतिमा भी स्वयंभू है और ये भी २०० वर्ष से अधिक पुरानी है। एक कमाल की बात ये है कि उस शिवलिंग और हनुमान की प्रतिमा का स्थान कभी नहीं बदला गया। अर्थात जहाँ पर उसकी उत्त्पत्ति हुई वो आज तक उसी जगह पर है। बस उसके चारो ओर बाद में एक मंदिर की स्थापना कर दी गयी। हाल फ़िलहाल में उस मंदिर में और कुछ प्रतिमाओं की स्थापना कर दी गयी है। जहाँ पर अभी ये मंदिर है वो आज भागलपुर की सबसे महँगी जगह है। वहाँ के जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं। तो ये भी कहा जा सकता है कि ये भागलपुर का सबसे महँगा मंदिर भी है जहाँ हर दिन जबरदस्त चढ़ावा चढ़ता है। खैर ये सब तो और बात है लेकिन अपने शहर में भी एक स्वयंभू शिवलिंग और हनुमान प्रतिमा है ये जानना वाकई सुखद था। अगर आपमें से किसी और को इसके बारे में कोई और जानकारी हो तो कृपया हमारे साथ साझा करें।