4 जून 2018

जब महादेव ने हनुमान का घमंड तोडा - हनुमदीश्वर शिवलिंग की कथा

रामायण और महाभारत में ऐसी कई कहानियाँ हैं जिसमे महाबली हनुमान ने दूसरों का घमंड थोड़ा। विशेषकर महाभारत में श्रीकृष्ण ने हनुमान जी के द्वारा ही अर्जुन, बलराम, भीम, सुदर्शन चक्र, गरुड़ एवं सत्यभामा का घमंड थोड़ा था। इसमें कोई शंका नहीं कि महाबली हनुमान में अपर बल था। रामायण के बाद उनके बल का वर्णन करते हुए श्रीराम कहते हैं कि "यद्यपि रावण की सेना में स्वयं रावण, कुम्भकर्ण एवं मेघनाद जैसे अविजित वीर थे और हमारी सेना में भी स्वयं मैं, लक्ष्मण, जामवंत, सुग्रीव, विभीषण एवं अंगद जैसे योद्धा थे किन्तु इन सब में से कोई भी हनुमान के बल की समता नहीं कर सकता। इस पूरे विश्व में परमपिता ब्रह्मा, नारायण एवं भगवान रूद्र के अतिरिक्त कदाचित ही कोई और हनुमान को परास्त करने की शक्ति रखता है।" इतने बलवान होने के बाद भी हनुमान अत्यंत विनम्र और मृदुभाषी थे एवं अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं गया था। इसपर भी रामायण में एक-आध ऐसी कथा आती है जब हनुमान को क्षणिक घमंड हो गया था। किन्तु जिनके स्वामी स्वयं श्रीराम हों उन्हें उबरने में समय नहीं लगता।

ऐसी एक कथा तब की है जब श्रीराम अपनी सेना के साथ सागर तट पर पहुँच गए थे। समुद्र पर सेतु बांधने से पहले विजय का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके मन में महादेव की पूजा एवं उनका शिवलिंग स्थापित करने की इच्छा हुई। तब उन्होंने हनुमान से कहा कि काशी जाकर एक दिव्य शिवलिंग ले आएं ताकि वे उसे यहाँ स्थापित कर सकें। प्रभु की आज्ञा मिलते ही हनुमान तीव्र गति से काशी पहुँचे और एक दिव्य शिवलिंग लेकर वापस लौट चले। उसी बीच पूजा का मुहूर्त निकलते देख श्रीराम ने वही रेत से एक शिवलिंग की स्थापना की और उनकी विधिवत पूजा शुरू ही करने वाले थे कि तभी हनुमान शिवलिंग लेकर वापस आ गए। जब हनुमान ने देखा कि श्रीराम ने किसी और शिवलिंग की स्थापना कर ली है तो वे बड़े व्यथित हुए। उन्होंने श्रीराम से कहा कि "हे प्रभु! आपके आदेश पर मैं इतना श्रम कर कशी से ये शिवलिंग लाया हूँ और आपने किसी और शिवलिंग की स्थापना कर ली। ये शिवलिंग भी तो केवल बालू का बना है इसी कारण ये अधिक समय तक नहीं टिक पायेगा जबकि मैं पाषाण से बना शिवलिंग लेकर आया हूँ।" इसपर श्रीराम ने कहा "हे हनुमान! इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं है किन्तु यदि तुम्हारी इच्छा हो तो इस शिवलिंग को हटा कर तुम अपने शिवलिंग की स्थापना कर दो। यदि तुम ऐसा कर सके तो हम तुम्हारे ही शिवलिंग की पूजा करेंगे।" इसपर हनुमान ने सोचा कि उनके एक प्रहार से तो पर्वत भी टूट कर गिर जाते हैं फिर ये रेत से बना शिवलिंग क्या चीज है। इसी अहंकार की भावना से हनुमान उस शिवलिंग को हटाने का प्रयास करने लगे किन्तु आश्चर्य! बात ही बात में पर्वत को भी उखाड़ देने वाले महाबली हनुमान उस रेत के शिवलिंग को तनिक भी ना हिला सके। उस शिवलिंग को उखाड़ने के प्रयास में उन्हें एक जोर का झटका लगा और वो वहाँ से बीस योजन दूर गंधमादन पर्वत पर जा गिरे और अचेत हो गए। 

जब उनकी चेतना वापस आयी तो उन्हें अपने किये पर बड़ा पछतावा हुआ। वे वापस आये और महादेव के उस शिवलिंग एवं श्रीराम से क्षमा मांगी। श्रीराम ने उस शिवलिंग का नाम "रामेश्वरम" रखा और उसके पश्चात हनुमान का मान रखने के लिए उनके द्वारा लाये गए शिवलिंग को भी वही कुछ दूर पर स्थापित कर दिया। श्रीराम ने कहा "हे महाबली! तुम्हारा श्रम व्यर्थ नहीं जाएगा। आज से ये शिवलिंग तुम्हारे नाम पर "हनुमदीश्वर" के नाम से विख्यात होगा। मेरे द्वारा स्थापित किये गए रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा करने से पहले तुम्हारे द्वारा स्थापित किये गए हनुमदीश्वर शिवलिंग की पूजा करना आवश्यक होगा। जो ऐसा नहीं करेगा उसे रामेश्वरम महादेव के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होगा।" उसी समय से काले पाषाण से निर्मित हनुमदीश्वर महादेव रामेश्वरम तीर्थ का एक अभिन्न अंग बन गए। आज भी जो यात्री रामेश्वरम के दर्शन करने को जाते हैं वे पहले हनुमदीश्वर महादेव के दर्शन अवश्य करते हैं। जय हनुमदीश्वर महादेव।