29 मई 2018

क्या आपको देवी सीता के भाई के बारे में पता है?

आज मंगलवार है और इस लेख को लिखने के लिए ये दिन सर्वथा उचित है। आज मैं आपको रामायण के उस प्रसंग के बारे में बताऊंगा जिसके बारे में अधिकतर लोग नहीं जानते। हममे से किसी ने देवी सीता के भाई के बारे में नहीं सुना है। उनके किसी भाई का उल्लेख रामायण में कहीं आता भी नहीं है। किन्तु रामायण में एक ऐसा भी प्रसंग है जहाँ किसी ने कुछ समय के लिए माता सीता के भाई की भूमिका निभाई थी।

27 मई 2018

जलांधर और वृंदा की कथा

बहुत काल पहले एक बार भगवान शिव की देवी पार्वती के साथ रमण करने की इच्छा हुई। उस समय माता पार्वती अनुष्ठान पर बैठी थी इस कारण उन्होंने महादेव से क्षमा मांगते हुए अपनी असमर्थता जाहिर की। महादेव ने उनका मान रखा और अपने तेज को समुद्र में फेंक दिया। महादेव के तेज को समुद्र संभाल नहीं पाया और तब उससे परम तेजस्वी दैत्य जालंधर की उत्पत्ति हुई।

24 मई 2018

गंगा दशहरा

आप सबों को गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनायें। कुछ दिनों पहले मैंने "गंगा सप्तमी" पर एक लेख लिखा था। कई लोग इन दो पर्वों को एक ही समझ लेते हैं किन्तु ये सही नहीं है। गंगा सप्तमी या गंगा जयंती के दिन महादेव ने देवी गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया था किन्तु आज, गंगा दशहरा के दिन देवी गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे पृथ्वी पर पहुँची थी। अर्थात आज का दिन देवी गंगा का पृथ्वी पर अवतार लेने का दिन है। अतः ये दो पर्व भी अलग है और इनका महत्त्व भी। गंगा सप्तमी के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

22 मई 2018

अपरा (अचला) एकादशी

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा या अचला एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। अपरा एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी, भद्रकाली तथा अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु और उनके पाँचवें अवतार भगवान वामन की पूजा की जाती है। अपरा/अचला एकादशी की प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा।

19 मई 2018

दान के नियम

हिन्दू धर्म में दान की बड़ी महत्ता बताई गयी है। शास्त्रों में दान को मोक्ष की प्राप्ति का एक साधन भी कहा गया है। ये भी कहा गया है कि दान गृहस्थ आश्रम का आधार है। जिस घर में प्रतिदिन सुपात्र को दान दिया जाता है वही सफल गृहस्थ माना जाता है। आजकल केवल किसी को कुछ दे देना ही दान कहलाता है किन्तु प्राचीन समय में इसके कुछ विशेष नियम थे इनमे से १० महत्वपूर्ण कहे गए हैं। आइये इन महत्वपूर्ण नियम के बारे में कुछ जानते हैं:

17 मई 2018

पांडवों की पत्नी और पुत्रों के नाम

सभी जानते हैं कि द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी थी किन्तु उसके अतिरिक्त भी सभी पांडवों ने अन्य विवाह भी किये। हालाँकि द्रौपदी को पांडवों की पटरानी या ज्येष्ठ रानी कहा जाता है किन्तु वो कुरुकुल की पहली पुत्रवधु नहीं थी। पांडवों में सबसे पहले भीम का विवाह हिडिम्बा नमक राक्षसी से हुआ किन्तु राक्षसी होने तथा कुंती को दिए वचन के कारण भीम ने कभी उसे अपने साथ नहीं रखा और ना ही उसकी गणना कभी कुरुकुल की कुलवधू में हुई। इसी कारण द्रौपदी को पटरानी का स्थान मिला। उसने पाँचों पांडवों से विवाह किया और वो बारी-बारी एक वर्ष के लिए एक पांडव की पत्नी बनकर रहती थी।

15 मई 2018

वट सावित्री

आप सबों को वट सावित्री की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज का दिन विवाहिता स्त्री के लिए बड़े महत्त्व का दिन होता है। वट सावित्री का व्रत भारत के प्रमुख व्रतों में से एक है और ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने पर ईश्वर स्त्रिओं के सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देते हैं और उनके पति और पुत्र पर किसी प्रकार की आपदा नहीं आती। ये व्रत पौराणिक काल की सतिओं में श्रेष्ठ "सावित्री" से जुड़ा है जिसने अपने पति सत्यवान को स्वयं मृत्यु के मुख से बचा लिया था। देवी सावित्री के अतिरिक्त उस व्रत में वटवृक्ष (बरगद का पेड़) का भी अत्यंत महत्त्व है। महर्षि पराशर ने कहा है कि "वट मूल तपोवासा।" अर्थात वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनो देवों का वास होता है। वटवृक्ष अपनी विशालता के कारण हिन्दू धर्म के विशाल स्वरुप का भी प्रतिनिधित्व करता है। आज के दिन सुहागिनें वटवृक्ष की ३ अथवा ५ परिक्रमा कर उसपर सुहाग की निशानियां भेंट करती हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से उनके पतियों की आयु लम्बी और निरोगी होती है। इससे जुडी एक पौराणिक कथा भी है।

12 मई 2018

कृष्ण और कर्ण के बीच हुआ अति सुन्दर संवाद

ये कथा तब की है जब कृष्ण शांतिदूत बन कर हस्तिनापुर गए थे। जब उनका प्रयास असफल हो गया तो युद्ध भी अवश्यम्भावी हो गया। उस स्थिति में ये आवश्यक था कि वे पाण्डवों की शक्ति जितनी बढ़ा सकते थे उतनी बढ़ाएं। इसी कारण उन्होंने वापस लौटते समय कर्ण से मिलने का निश्चय किया। जब कर्ण ने देखा कि श्रीकृष्ण स्वयं उनके घर आये हैं तो उन्होंने उनका स्वागत सत्कार किया। फिर कृष्ण ने कर्ण को अपने रथ पर बिठाया और उन्हें गंगा तट पर ले गए। सात्यिकी को रथ पर ही छोड़ दोनों एकांत में वार्तालाप हेतु चले गए। कर्ण अनिश्चित था कि कृष्ण उससे क्या बात करना चाहते हैं। कुछ औपचारिक बातों के बाद कृष्ण ने कर्ण से कहा कि "हे राधेय! आज इस युद्ध को रोकने का मेरा अंतिम प्रयास भी असफल हो गया। अब तो युद्ध निश्चित है। किन्तु ये तो तुम भी जानते हो कि धर्म पाण्डवों के पक्ष में है अतः तुम जैसे महावीर के लिए यही उचित है कि तुम कौरवों का पक्ष छोड़ कर पांडवों के पक्ष से युद्ध करो। हे कर्ण! वास्तव में तुम भी पाण्डव ही हो क्यूंकि तुम्हारी वास्तविक माता कुंती हैंअतः ये तुम्हारा धर्म है कि तुम अपने पुत्र धर्म का पालन करो।" कृष्ण के ऐसा कहने पर उनके बीच एक अत्यंत सुन्दर संवाद हुआ।

9 मई 2018

अष्टांग योग


पौराणिक काल में महर्षि पतंजलि ने योग को चित्तवृत्तिनिरोधः के रूप में परिभाषित किया है तथा उन्होंने "योगसूत्र" नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया है, जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग का अर्थ है आठ अंगों वाला योग जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पाँच अंग - यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार को "बहिरंग" और शेष तीन अंग - धारणा, ध्यान, समाधि को "अंतरंग" कहते हैं। अंतरंग साधना को आरम्भ करने से पहले व्यक्ति को पहले बहिरंग साधना को पूर्ण करना पड़ता है।

8 मई 2018

हिन्दू धर्म का सार अति-संक्षेप में

आज हम सभी लोग धर्म, उपनिषद, वेद, न्याय और अन्य भी कई विषयों पर बातें करते रहते हैं। परंतु हिंदू धर्म और सनातन धर्म कहां से आरंभ होता है और कहां तक जाता है इसके बारे में संपूर्ण जानकारी इस लेख में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है। हर चीज के बारे में गहनता से बताया गया है ताकि कोई भी पहलू अछूता न रहे। लेकिन आपको यह जानकारी होना चाहिए कि पुराण, रामायण और महाभारत हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं है, धर्मग्रंथ तो वेद ही है।

2 मई 2018

ब्रह्मा

ब्रह्मा हिन्दू धर्म के त्रिदेवों में से एक हैं। ये सृष्टिकर्ता हैं जो पालनहार नारायण एवं संहारक शिव के साथ त्रिमूर्ति को पूर्ण करते हैं। इन्हे हिरण्यगर्भ कहा जाता है क्यूँकि इनकी उत्पत्ति ब्रम्ह-अण्ड (ब्रम्हांड) से मानी जाती है। समस्त सृष्टि का सृजन करने के लिए इन्हे परमपिता भी कहा जाता है। हालाँकि ये त्रिदेवों में एक हैं लेकिन आधुनिक युग में इन्हे अन्य दो देवों विष्णु एवं शिव के जितना महत्त्व और सम्मान नहीं दिया जाता जो कि बिलकुल भी सही नहीं है। रही सही कसर आज कल के फालतू धार्मिक टीवी शोज ने पूरी कर दी है।