24 अप्रैल 2018

मूलकासुर: वह असुर जिसका वध श्रीराम भी नहीं कर पाए - देवी सीता की अनसुनी वीरगाथा

कुम्भकर्ण के बारे में सब ने सुना है और वो रामायण के प्रमुख पात्रों में से एक है। कुम्भकर्ण के दो पुत्रों कुम्भ और निकुम्भ के विषय में रामायण में विस्तार से बताया गया है और उसके एक और पुत्र भीम का वर्णन भी शिव पुराण में आता है किन्तु उसका पुत्र मूलकासुर के बारे में कही पढ़ने को नहीं मिलता। इसका कारण ये है कि कुम्भकर्ण ने उसे बचपन में ही त्याग दिया था। मूलकासुर कुम्भकर्ण का सबसे कनिष्ठ पुत्र था जिसका जन्म अत्यंत अशुभ मूल नक्षत्र में हुआ था। अशुभ नक्षत्र में जन्म लेने के कारण वो राक्षस कुल के लिए संकट बन सकता था अतः कुम्भकर्ण ने उसे मार डालने का निश्चय किया किन्तु रावण ने अपने कुल के पुत्र की हत्या उचित नहीं समझी और उसे त्यागने का निर्णय लिया। रावण के निर्देशानुसार उस नवजात बालक को बचपन में ही वन में छोड़ दिया गया जहाँ पर मधुमक्खियों ने अपने मधु से उसका पालन-पोषण किया। बड़े होने पर उसे ज्ञात हुआ कि वो राक्षस कुल में जन्मा कुम्भकर्ण जैसे महारथी का पुत्र है। ये ज्ञात होने पर वो लंका पहुँचा जहाँ पर उसे पता चला कि लंका में एक भीषण युद्ध हुआ है जिसमे उसके पिता वीरगति को प्राप्त हो गए हैं। उसे ये भी पता चला कि उसके काका विभीषण ने युद्ध में शत्रुओं का साथ दिया जिस कारण लंका का विनाश हुआ। जब विभीषण को पता चला कि बचपन में खोया उसका भतीजा लौट आया है तो वो बड़े स्नेह से उसे वापस लाने गए किन्तु मूलकासुर ने उन्हें धिक्कारते हुए अपने पिता और लंका के विनाश का कारण बताया। अपने ह्रदय में प्रतिशोध की ज्वाला लेकर वो लंका से वापस चला गया। 

उसने प्रतिशोध लेने के लिए परमपिता ब्रम्हा की घोर तपस्या की। ब्रम्हदेव के प्रसन्न होने पर उसने उनसे अमरता का वरदान माँगा किन्तु ब्रम्हा ने मना कर दिया। इसपर उसने ये वर माँगा कि चूँकि उसे राम और विभीषण से प्रतिशोध लेना है अतः उसका वध किसी पुरुष के हाँथों ना हो। साथ ही कोई परादेवी जैसे दुर्गा अथवा काली भी उसके वध को उद्धत ना हो। अगर उसका वध हो तो किसी सामान्य नारी के हाथों वो भी उसके हाँथों जिसका उसने अपमान किया हो। ब्रम्हा ने मुस्कुराते हुए वरदान दे दिया। ऐसा वरदान पते ही मूलकासुर घमंड के मद में आकर कि अब तो उसका विनाश असंभव है, पुरे विश्व में त्राहि मचता हुआ लंका की ओर बढ़ा। मार्ग में दैवयोग से उसे ऋषिओं का एक झुंड मिल गया जिससे वार्ता करते हुए अपने पिता के वध के शोक में मूलकासुर ने कहा कि "जिस चंडी सीता के कारण मेरे पिता और कुल का नाश हुआ है उसे मैं अवश्य मृत्यु के घाट उतार दूँगा।" इसपर उनमे से एक ऋषि ने क्रोधित हो उसे श्राप दे दिया और कहा "हे नराधम! तूने अनुचित शब्दों से एक सती का अपमान किया है इसीलिए जा जिस स्त्री को तूने चंडी कह कर बुलाया है उसी के हाँथों तेरी मृत्यु होगी।" ऐसा श्राप पाने के कारन मूलकासुर ने क्रोध में उस ऋषि का वध कर दिया और अन्य ऋषि भय से वहाँ से पलायन कर गए। अब कोई समय नष्ट ना कर वो लंका पहुँचा और विभीषण को युद्ध के लिए ललकारा। विभीषण अपने सेना सहित युद्ध करने आये किन्तु ब्रम्हा के वरदान के कारण उसे परास्त नहीं कर पाए। युद्ध छः मास तक चलता रहा और अंततः विभीषण को युद्धक्षेत्र छोड़कर हटना पड़ा। 

विभीषण तत्काल अपने पुष्पक विमान से अयोध्या पहुँचे और श्रीराम से सहायता माँगी। श्रीराम तुरंत लक्ष्मण एवं हनुमान सहित लंका पहुँचे और मूलकासुर को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया किन्तु सात दिनों तक युद्ध होने के बाद भी श्रीराम उसका वध ना कर सके। तब युद्धभूमि में स्वयं ब्रम्हदेव उपस्थित हुए और श्रीराम को अपने वरदान के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मूलकासुर का वध केवल देवी सीता ही कर सकती हैं। श्रीराम ने ब्रम्हदेव को प्रणाम किया और सहायता के दिए धन्यवाद दिया। इसके पश्चात उन्होंने तत्काल पुष्पक विमान को अयोध्या देवी सीता को लाने भेजा। श्रीराम का सन्देश सुनकर देवी सीता अविलम्ब युद्धस्थल पहुँची और मूलकासुर को युद्ध के लिए ललकारा। मूलकासुर सीता को देखते ही समझ गया कि उसका अंत समय आ गया है इसलिए उसने युद्ध को टालने के लिए कहा "हे देवी! इस प्रकार युद्धक्षेत्र में आना तुम्हारे अदम्य साहस को प्रदर्शित करता है। मैं ये भी मानता हूँ कि क्रोध में आकर मैं आपको अपशब्द भी कहे जिसके लिए मैं लज्जित हूँ किन्तु फिर भी मैं एक स्त्री के साथ युद्ध नहीं कर सकता। क्या तुम्हारे स्वामी राम का साहस समाप्त हो गया है जो कायरों के भांति तुम्हे युद्ध के लिए भेज दिया है? जाओ और जाकर अपने स्वामी से कहो कि अगर युद्ध करने का साहस ना बचा हो तो युद्ध छोड़कर भाग जाये।" श्रीराम के बारे में इस प्रकार के अपशब्द सुनकर सीता ने क्रोधित होकर कहा "हे नीच! तू अपनी तुलना मेरे स्वामी से करता है। सत्य तो ये है कि तू उनके समक्ष एक बालक के सामान है। तू किस प्रकार उनका सामना कर सकता है जब तुझे मुझ जैसी एक स्त्री से युद्ध करने में इतना भय लग रहा है। तेरे पिता कुम्भकर्ण तो वीरता पूर्वक लड़ते हुए मेरे स्वामी के हाँथों वीरगति को प्राप्त हुए किन्तु तू तो उस महावीर के नाम पर कलंक है। किसे पता था कि कुम्भकर्ण का पुत्र ऐसा कापुरुष होगा जो एक स्त्री से भी युद्ध करने से भयभीत होता हो।"

एक स्त्री द्वारा अपने पुरुषार्थ पर ऐसा कटाक्ष मूलकासुर को सहन नहीं हुआ। क्रोध में आकर उसने देवी सीता पर अपने बाण से प्रहार कर दिया। वो तो यही चाहती थी। उन्होंने तत्काल ही चंडिकास्त्र का प्रयोग किया और मूलकासुर का सर धड़ से अलग कर दिया। उस अजेय राक्षस का वध होते देख सभी हर्ष से भर गए। सम्पूर्ण युद्धभूमि देवी सीता के जयनाद से गूँज उठी। ये कथा हमें एक और सन्देश देती है कि जब कोई पुरुष दैवयोग से विवश हो जाता है तब एक स्त्री ही उसे उस संकट से उबार सकती है। इस कथा के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि ने स्त्री के सामर्थ्य पर प्रकाश डाला है कि वो किसी भी रूप में पुरुष से पीछे नहीं है।