4 अप्रैल 2018

कावेरी

कावेरी भारत में बहने वाली प्रमुख नदियों में से एक है। कावेरी परमपिता ब्रम्हा की पुत्री है और इसे देवी गंगा की तरह ही पूजनीय माना गया है। पुराणों के अनुसार जब महर्षि अगस्त्य उत्तर भारत से दक्षिण की ओर आ गए तो उन्हें वहाँ पड़ने वाले सूखे ने चिंतित कर दिया। इसी के निराकरण के लिए वे ब्रम्हलोक पहुँचे और परमपिता ब्रम्हा को नमन करते हुए कहा "हे ब्रम्हदेव! आप तो जानते ही हैं कि भगवान शिव की आज्ञा अनुसार अब मैं दक्षिण में निवास करता हूँ। महादेव ने मुझसे कहा था कि दक्षिण हर प्रकार से उत्तर के प्रदेश से पिछड़ा हुआ है और उन्होंने मुझे आज्ञा दी कि मैं अपने ज्ञान से दक्षिण को समृद्ध बनाऊँ। उनके आज्ञा अनुसार मैंने अपने ज्ञान का वहाँ प्रसार किया किन्तु भौगोलिक दृष्टि से भी दक्षिण में जीवन बहुत कठिन है। पूरे प्रदेश में सूखा पड़ा है और जल का कोई साधन नहीं है। इसीलिए हे परमपिता कृपा कर दक्षिण को अपने वरदान से परिपूर्ण करें।"

महर्षि अगस्त्य की ऐसी याचना सुनकर ब्रम्हदेव बोले "वत्स! प्राणिमात्र के लिए तुम्हारे ह्रदय में जो करुणा है उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हे अपनी पुत्री कावेरी प्रदान करता हूँ जो गंगा के सामान ही पवित्र और कल्याणकारी है। इसके दृष्टिमात्र से पूरा दक्षिण प्रदेश हरा-भरा हो जाएगा।" ऐसा कह कर ब्रम्हदेव ने कावेरी का आह्वान किया जिस कारण कावेरी तुरंत उनके समक्ष उपस्थित हुई। ब्रम्हदेव ने कहा "हे पुत्री! तुम इतने दिन मेरे साथ रही और तुम्हारे सानिध्य से मुझे भी बड़ा संतोष मिला किन्तु इस समय पृथ्वी को तुम्हारी आवश्यकता है। इसी कारण मैं तुम्हे महर्षि अगस्त्य को प्रदान करता हूँ। तुम इनके साथ जाओ और जिस प्रकार गंगा ने पृथ्वी का कल्याण किया है, उसी प्रकार तुम भी पृथ्वी का कल्याण करो। मैं तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ कि तुम भी गंगा की भांति सदैव पूजी जाओगी और दक्षिण के लोग तुम्हे गंगा का ही प्रतिरूप मानेंगे।" फिर कावेरी ने पूछा "हे परमपिता! आपका कथन सर्वथा उचित है किन्तु मैं पृथ्वी पर किस प्रकार अवतरित होऊँगी? गंगा को तो स्वयं महादेव के जटाओं में जाने का सौभाग्य मिला था किन्तु मैं किस प्रकार पृथ्वी पर अवतरित होऊं?" तब ब्रम्हदेव ने अपना कमण्डल अगस्त्य को देते हुए कावेरी को कहा "हे पुत्री! तुम मेरे इस कमण्डल में समा जाओ और फिर अगस्त्य तुम्हे भगीरथ की ही भांति पृथ्वी पर लेकर जाएँगे।" तब ब्रम्हदेव का आशीर्वाद प्राप्त कर कावेरी उस कमण्डल में समा गयी और महर्षि अगस्त्य उन्हें लेकर पृथ्वी पर आये।

एक और कथा के अनुसार जब दक्षिण की भूमि ताप से दग्ध हो गयी तो महर्षि अगस्त्य ने महादेव की बड़ी घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने कहा कि दक्षिण में कोई जल-स्रोत नहीं है इसीलिए तुम कैलाश आओ, मैं तुम्हे अखंड जल-स्रोत प्रदान करूँगा। जब महर्षि अगस्त्य कैलाश पहुँचे तो भगवान शंकर ने एक मुट्ठी बर्फ उनके कमण्डल में डाला और कहा कि जहाँ भी तुम्हे जल की आवश्यकता पड़े, इसे प्रवाहित कर देना। ये कावेरी नदी गंगा की ही भाँति दक्षिण का पोषण करेगी। महर्षि कावेरी को लेकर दक्षिण की ओर चल पड़े। मार्ग में कई बार उन्हें प्यास लगी किन्तु उन्होंने कावेरी को मुक्त नहीं किया। एक उजाड़ क्षेत्र में पहुँचने पर महर्षि अगस्त्य विश्राम के लिए रुके। उनके पीछे-पीछे कैलाश से श्री गणेश भी चले आ रहे थे। उन्होंने देखा कि ये स्थान कावेरी के उद्गम के लिए सर्वश्रेष्ठ था इसी कारण उन्होंने एक कौवे का रूप धरा और महर्षि अगस्त्य के कमण्डल को उलट दिया जिससे कावेरी नदी मुक्त हो गयी और पूरा प्रदेश से जल से परिपूर्ण हो गया। कावेरी को इस प्रकार मुक्त होते देख महर्षि अगस्त्य उस कौवे पर अत्यंत क्रोधित हो गए। वे उसे श्राप देना ही चाहते थे कि श्री गणेश उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें बताया कि कावेरी के उद्गम का ये स्थान सर्वश्रेष्ठ था इसी कारण उन्होंने ही कौवे का रूप धर कर कावेरी को मुक्त कर दिया। इससे महर्षि अगस्त्य बड़े प्रसन्न हुए और अपने कार्य को पूर्ण समझा। दक्षिण के ग्रंथों के अनुसार कावेरी ऋषि कावेरा की पुत्री थी जिनका विवाह अगस्त्य ऋषि से हुआ था। एक बार वे कही जा रहे थे पर कावेरी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था। उन्होंने उसे अकेला छोड़ना ठीक नहीं समझा और जल के रूप में परवर्तित कर उन्हें भी अपने साथ रख लिया। जब वे विश्राम करने रुके तो गणेश ने उस जल को मुक्त कर दिया जिससे दक्षिण में जल की समस्या समाप्त हो गयी।

इन कई कथाओं से हमें जानने को मिलता है कि कावेरी की महत्ता कितनी अधिक है। वर्त्तमान में ये नदी तमिलनाडु और कर्णाटक में बहती है और इसका उद्गम ब्रम्हगिरी से बताया गया है। इसकी लम्बाई करीब ८०० किलोमीटर बताई गयी है और इसके किनारे हिन्दुओं के कई धार्मिक स्थल हैं जिसमे से तिरुचिरापल्ली प्रमुख है। कावेरी को दक्षिण भारत की जीवन रेखा भी कहा गया है। कदाचित यही कारण है कि उसे दक्षिण की गंगा के नाम से भी जाना जाता है और मान्यता है कि इसमें स्नान करने से कई जन्मों के पाप छूट जाते हैं।