30 अप्रैल 2018

बुद्ध पूर्णिमा

आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज सारा विश्व भगवान गौतम बुद्ध का २५८० वाँ जन्मदिवस मना रहा है। आज के ही दिन पूर्णिमा को ५६३ ईस्वी पूर्व लुम्बिनी (आज का नेपाल) में ये महाराजा शुद्धोधन की पत्नी महामाया के गर्भ से जन्में। आगे चल कर उन्होंने स्वयं का धर्म चलाया किन्तु हिन्दू धर्म में जन्मे बुद्ध को भगवान विष्णु का नवां अवतार भी माना जाता है। हालाँकि इसपर मतभेद है। कई लोग श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को विष्णु का आठवाँ एवं कृष्ण को विष्णु का नवां अवतार भी बताते हैं। वैसे इससे बुद्ध के महत्त्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और कई समुदायों द्वारा वे विष्णु-अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। दशावतार के विषय में आप यहाँ विस्तार से पढ़ सकते हैं। दुर्भाग्य से उनकी माता का निधन उनके जन्म से सातवें दिन ही हो गया।  माता की मृत्यु के पश्चात शुद्धोधन की दूसरी पत्नी और महामाया की छोटी बहन ने प्रजावती, जिनका एक नाम गौतमी भी था, ने उनका पालन-पोषण किया। उनके पुत्र होने के कारण और गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाये। उन्होंने उनका नाम सिद्धार्थ रखा। कहा जाता है कि बचपन में अपने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा एक पक्षी को बाण मारे जाने पर उनके ह्रदय में प्राणिमात्र के लिए करुणा का भाव उत्पन्न हुआ। ऐसा विवरण है कि उन्होंने अपनी शिक्षा स्वयं विश्वामित्र से ली, हालाँकि अधिकतर विद्वान उन्हें महर्षि विश्वामित्र नहीं मानते बल्कि उनके काल में विश्वामित्र को एक गुरुपद माना जाता था, ऐसी मान्यता है। १६ वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह कोली की राजकुमारी यशोधरा से हुआ और अगले वर्ष उन्हें राहुल नामक एक पुत्र की प्राप्ति हुई। सिद्धार्थ का मन कभी भी गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और वे स्वयं को जकड़ा हुआ महसूस करते थे। एक बार भ्रमण करते समय उन्होंने एक व्यक्ति को अपने आँखों के सामने मरते हुए देखा जिससे उन्हें संसार से विरक्ति हो गयी और उसी छोटी उम्र में उन्होंने अपनी पत्नी और नवजात शिशु को छोड़ कर संन्यास ग्रहण कर लिया।

घूमते-घूमते वे राजगृह पहुंचे जहाँ उनकी भेंट रामपुत्र नामक साधक से हुई जिन्होंने उन्हें ध्यान और समाधि लगाने की शिक्षा दी। किन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं हुआ और वे सत्य की खोज में आगे बढ़ गए। वे उरुवेला पहुँचे और वहाँ छः वर्षों तक निराहार रह कर घोर तपस्या की किन्तु उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। वहीँ पर उन्होंने एक स्त्री की बात सुनी कि वीणा के तार मृदु रहें तभी मधुर स्वर देते हैं किन्तु अति कड़े होने पर वे टूट जाते हैं। बुद्ध ने इस ज्ञान को बहुत गंभीरता से लिया और अत्यंत कठिन साधना को त्याग आहार सहित साधना जारी रखी। ये बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण शिक्षा भी है कि कभी भी अत्यंत कठिन तप ना करें। इसे उन्होंने मध्यमार्ग का नाम दिया। वे आगे बढे और बोधगया में एक वटवृक्ष के नीचे समाधि में लीन हो गए। कई दिनों तक समाधि लगाने के बाद भी उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। इसी समय उस गाँव में सुजाता नामक एक स्त्री को लम्बी प्रतीक्षा के बाद पुत्र की प्राप्ति हुई। वे अत्यंत प्रसन्न हुई और जल अर्पण करने उसी वटवृक्ष के पास पहुँची। वहाँ उसे समाधि में लीन बुद्ध दिखे जिनके मुख पर विषाद का भाव था। सुजाता ने उसी प्रसन्नता के भाव से ईश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना की कि "हे प्रभु! जैसे आपने मेरी मनोकामना पूरी की है उसी प्रकार इस संन्यासी की प्रार्थना भी स्वीकार कीजिये क्यूँकि इसके चेहरे का तेज बताता है कि ये कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है।" कदाचित उसकी प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली और उसी रात्रि बुद्ध को उस वटवृक्ष के नीचे सत्य की प्राप्ति हुई। वे वृक्ष जिसके नीचे उन्होंने तपस्या की थी वो "बोधिवृक्ष" कहलाया और आज भी बिहार के बोधगया में उपस्थित है। ये स्थान संसार भर के बौद्ध भिक्षुकों के लिए सबसे बड़ा तीर्थ है और हर वर्ष लाखों की संख्या में लोग इसके दर्शन को आते हैं।

ज्ञान प्राप्त करने के बाद वे उसे बाँटने के लिए आगे बढे और सारनाथ में उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया। संस्कृत उस समय तक उतनी सरल भाषा नहीं रह गयी थी इसी कारण बुद्ध ने अपना उपदेश पाली भाषा में देना शुरू किया। लोगों ने उनके सरल शब्दों में दिए गए उपदेशों को प्रसन्नता से अपनाया और देखते ही देखते उनकी ख्याति देश भर में फ़ैल गयी। अपने पाँच मित्रों को उन्होंने अपना पहला अनुनायी बनाया और उन्हें धर्म प्रचार के लिए भेज दिया। उन्हें विश्व का सबसे पहला अहिंसा का प्रचार करने वाला माना जाता है। उनके तेज का प्रताप इतना था कि अँगुलीमाल जैसा निर्दयी हत्यारा केवल उनके दर्शन मात्र से सत्य के मार्ग पर चलने लगा। धीरे-धीरे उनकी ख्याति इतनी बढ़ी कि देश-विदेश के राजा-महाराजा बौद्ध धर्म को अपनाने लगे। उनके अनुनायिओं में चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और हर्षवर्धन प्रमुख थे। उनकी ख्याति देश तक नहीं रही बल्कि चीन, वियतनाम, कम्बोडिया, लंका एवं अन्य बाहरी देशों तक पहुँची। ८० वर्ष की आयु तक प्रवचन देने के बाद उन्होंने अपने निर्वाण की घोषणा कर दी। एक लोहार कुंडा के हाँथों उन्होंने अपना अंतिम भोजन ग्रहण किया और फिर अन्न-जल का त्याग कर दिया। ऐसा कर उन्होंने जातिप्रथा के दुराचार पर भी प्रहार किया। अंततः ८० वर्ष की आयु में ४८३ ईस्वी पूर्व उन्होंने अपने प्राणों का त्याग कर दिया। बौद्ध और जैन धर्म को हिन्दू धर्म का ही एक भाग माना जाता है इसी कारण दोनों धर्मों में हिन्दू धर्म से बड़ी समानता है। वैष्णव समुदाय में बुद्ध को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में मान्यता दी जाती है। हालाँकि बौद्ध धर्म में ऐसा नहीं माना जाता। गौतम बुद्ध की सनातन हिन्दू धर्म के वेद, पुराणों, अग्निहोत्र एवं गायत्री मन्त्र में बड़ी आस्था थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने चार आर्यसत्य एवं अष्टांग मार्ग की शिक्षा दी।

चार आर्यसत्य
  1. दुःख: संसार में दुःख है।
  2. कारण: दुःख होने के कारण हैं।
  3. निवारण: दुःख दूर करने के लिए निवारण हैं।
  4. मार्ग: दुखों के निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग है।

अष्टांगिक मार्ग
  1. सम्यक दृष्टि: चार आर्यसत्य पर विश्वास करना।
  2. सम्यक संकल्प: मानसिक एवं नैतिक विकास।
  3. सम्यक वाक्: सदैव सत्य बोलना और हानिकारक वचन से बचना।
  4. सम्यक कर्म: किसी भी स्थिति में हिंसा ना करना।
  5. सम्यक जीविका: किसी को हानि पहुँचाने वाली जीविका अथवा व्यापर से दूर रहना।
  6. सम्यक प्रयास: स्वयं को सुधारने का निरंतर प्रयास करना।
  7. सम्यक स्मृति: स्पष्ट ज्ञान से विश्व को देखने की योग्यता प्राप्त करना।
  8. सम्यक समाधि: सही समय पर स्वयं इस शरीर का त्याग करना।