31 मार्च 2018

क्यों धरा हनुमान ने पञ्चमुखी रूप?

सबसे पहले आप सभी को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ। ११वें रुद्रावतार हनुमान के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है किन्तु उनके पंचमुखी रूप के बारे में लोगों को उतनी जानकारी नहीं है। आप सबने हनुमान के पंचमुखी रूप के कई जगह दर्शन किये होंगे किन्तु क्या आप जानते हैं कि आखिर क्या कारण था कि उन्हें ये रूप धरना पड़ा? अगर नहीं, तो आइये जानते हैं।

श्रीराम और रावण का भयानक युद्ध चल रहा था। रावण की राक्षस सेना के महाभयंकर वीर मारे जा चुके थे और अब रावण को भी लगने लगा था कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं और उसकी पराजय हो सकती है। इस समस्या से बचने के लिए रावण ने अपने भाई अहिरावण को याद किया जो उसका सौतेला भाई और ऋषि विश्रवा का पुत्र था। वो अत्यंत मायावी और शक्तिशाली था और पूरे विश्व में मायायुद्ध में उसके समान कोई और नहीं था। रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद ने भी मायावी विद्या का ज्ञान अहिरावण से ही लिया था। इसके साथ ही अहिरावण माता भवानी का परम भक्त था।

29 मार्च 2018

उर्मिला

उर्मिला कदाचित रामायण की सर्वाधिक उपेक्षित पात्र है। जब भी रामायण की बात आती है तो हमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम याद आते हैं जो अपने पिता के वचन के लिए १४ वर्षों के वन को चले गए थे। हमें देवी सीता याद आती हैं जो अपने पति के पीछे-पीछे वन की और चल दी। एक आदर्श भाई महापराक्रमी लक्ष्मण याद आते हैं जिन्होंने श्रीराम के लिए अपने जीवन का हर सुख त्याग दिया। भ्रातृ प्रेम की मिसाल भरत याद आते हैं जिन्होंने अयोध्या में एक वनवासी सा जीवन बिताया। महाज्ञानी और विश्वविजेता रावण याद आता है जो पंडित होते हुए भी राक्षस था। महावीर हनुमान, कुम्भकर्ण और मेघनाद याद आते हैं।

28 मार्च 2018

क्यों मेघनाद का वध केवल लक्षमण ही कर सकते थे?

लंका के युद्ध के कुछ वर्षों बाद एक बार अगस्त्य मुनि अयोध्या आए। श्रीराम ने उनकी अभ्यर्थना की और आसन दिया। राजसभा में श्रीराम अपने भ्राता भरत, शत्रुघ्न और देवी सीता के साथ उपस्थित थे। बात करते-करते लंका युद्ध का प्रसंग आया। भरत ने बताया कि उनके भ्राता श्रीराम ने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा। अगस्त्य मुनि बोले - "हे भरत! रावण और कुंभकर्ण निःसंदेह प्रचंड वीर थे, किन्तु इन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाद ही था। उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और उन्हें पराजित कर लंका ले आया था। तब स्वयं ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब जाकर इंद्र मुक्त हुए थे। लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए। और ये भी सत्य है कि इस पूरे संसार में मेघनाद को लक्ष्मण के अतिरिक्त कोई और मार भी नहीं सकता था, यहाँ तक कि स्वयं श्रीराम भी नहीं।"

27 मार्च 2018

जब गंगापुत्र ने कर ली पाण्डवों के वध की भीष्म प्रतिज्ञा

महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था। कौरवों की ओर से ११ और पांडवों की ओर से ७ अक्षौहिणी सेना आमने सामने थी। पांडवों के सेनापति जहाँ धृष्ट्द्युम्न थे वही कौरवों की सेना का सञ्चालन स्वयं गंगापुत्र भीष्म कर रहे थे। भीष्म कभी भी ये युद्ध नहीं चाहते थे और विवश होकर उन्हें कौरवों की ओर से युद्ध करना पड़ रहा था। युद्ध के आरम्भ से लेकर ही कौरव सेना पांडवों की सेना से इक्कीस ही थी किन्तु दुर्योधन को इससे संतोष ना था। युद्ध से पहले वो सोच रहा था कि भीष्म थोड़े ही समय में पांडवों का नाश कर देंगे किन्तु सेनापति का पद सँभालने के पूर्व ही भीष्म ने साफ़ कर दिया कि वो पांडव अथवा उनके वंश के किसी भी व्यक्ति का वध नहीं करेंगे। किन्तु उन्होंने दुर्योधन को ये विश्वास भी दिलाया कि प्रतिदिन वे पांडव सेना के कम से कम १०००० रथिओं, अतिरथों एवं महारथिओं का वध अवश्य करेंगे।

25 मार्च 2018

राम नवमी

आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनायें। राम भारत की आत्मा में बसते हैं। उनपर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि हम उससे अधिक क्या लिख सकते हैं? संक्षेप में कुछ कहने की कोशिश करते हैं। वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस एवं पुराणों के अनुसार आज के दिन ही अयोध्या में प्रभु श्रीराम ने भगवान विष्णु के सातवें अवतार रूप में इक्षवाकु कुल में राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में रानी कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया। अगस्त्य संहिता के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के नवमी के दिन, पुनर्वसु नक्षत्र, कर्क लग्न में जब सूर्य एवं पंचग्रह अपनी शुभ दृष्टि के साथ मेष राशि पर विराजमान थे, तब उस अतिशुभ लग्न में श्रीराम का जन्म हुआ। आज के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरिमानस के रचना का शुभारम्भ किया था। राम नवमी के साथ ही चैत्र नवरात्र भी समाप्त हो जाता है। आज के दिन स्त्री तथा पुरुष व्रत रखते हैं और आठों प्रहर फलाहार करने का प्रावधान है।

23 मार्च 2018

जब महाबली हनुमान के भार से स्वयं नारायण का रक्त बह निकला

महाभारत का युद्ध आरम्भ होने वाला था। दोनों ओर की सेनाएँ युद्ध की तैयारी में जोर शोर से जुटी थीं। श्रीकृष्ण के परामर्श से अर्जुन ने देवराज इंद्र से सारे दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिए थे। उससे भी ऊपर उन्हें भगवान रूद्र से पाशुपतास्त्र भी मिल चुका था। इतने दिव्यास्त्र प्राप्त करने के कारण अर्जुन में थोड़ा घमंड आ गया। श्रीकृष्ण जानते थे कि इस घमंड के साथ वो महाभारत का युद्ध नहीं जीत सकता क्यूँकि जिन दिव्यास्त्रों पर उसे गर्व था उनके ज्ञाता कुरु सेना में भी थे। भीष्म, द्रोण और कर्ण के पास सभी दिव्यास्त्रों का ज्ञान था। इसके अतिरिक्त कर्ण के पास दिव्य कवच और कुण्डल थे और भीष्म भी अवध्य थे। इसके अतिरिक्त अर्जुन का घमंड तोडना भी आवश्यक था। श्रीकृष्ण ने महाबली हनुमान के द्वारा सुदर्शन चक्र, गरुड़ और बलराम के गर्व का मर्दन किया था और इसीलिए उन्होंने अर्जुन के घमंड को तोड़ने के लिए भी हनुमान को ही चुना।

21 मार्च 2018

गणगौर तीज की कथा

गुड़ी पाड़वा के अगले दिन गणगौर तीज का पर्व मनाया जाता है जो राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बहुत प्रसिद्द है। इस दिन कुंवारी कन्याएँ मनचाहे वर के लिए और विवाहित स्त्रियाँ अखंड सौभाग्य की कामना से गुड़ी पड़वा के अगले दिन किसी नदी, तालाब या शुद्ध स्वच्छ शीतल सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौर को जल पिलाती हैं। दूसरे दिन शाम को बिदा के सुंदर व मार्मिक लोकगीतों के साथ उनका विसर्जन होता है। इसकी पौराणिक कथा भी बड़ी चर्चित है।

20 मार्च 2018

जब चौसर ने स्वयं महादेव और नारायण का भी अनिष्ट किया

बहुत कम लोगों को ये पता होगा कि चौसर का निर्माण भी भगवान शिव ने ही किया था। एक दिन महादेव ने देवी पार्वती से कहा कि आज मैंने एक नए खेल का निर्माण किया है। उनके अनुरोध पर दोनों चौसर का खेल खेलने लगे। चूँकि चौसर का निर्माण महादेव ने किया था, वे जीतते जा रहे थे। अंत में माता पार्वती ने कहा कि ये उचित नहीं है। अगर ये एक खेल है तो उसके नियम भी होने चाहिए। उनके ऐसा कहने पर महादेव ने चौसर के नियम बनाये और एक बार फिर चौसर का खेल आरम्भ हो गया।

19 मार्च 2018

भैरव (अष्टभैरव)

भैरव या काल भैरव भगवान शिव के रूद्र-रूप है तथा उनके गणो में से एक है। उन्हें भगवान रूद्र के समकक्ष ही माना गया है तथा वे माता भवानी के अनुचार भी है। भैरव देवता को रात्रि का देवता भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म ग्रंथो में भगवान शिव के दो रूपों का वर्णन मिलता है जिसमे भगवान शिव का एक स्वरूप जगत के रक्षक व् भक्तो को अभ्य देने वाले विश्वेशर के रूप में जाना जाता है तो दूसरा स्वरूप ठीक उसके विपरीत है। अपने दूसरे स्वरूप कालभैरव के रूप में भगवान शिव दुष्टो का संहार करते है और उनका यह रूप अति विकराल और भयंकर है। भगवान भैरव के मुख्यतः आठ स्वरूप है जिन्हे अष्टभैरव कहते हैं। उनके इन आठो स्वरूपों को पूजने से वे अपने भक्तो पर प्रसन्न होते है तथा उन्हें अलग-अलग फल प्रदान करते है। अष्टभैरव के सभी मंदिर तमिलनाडु राज्य में हैं।

17 मार्च 2018

जब हनुमान जी ने भीम को अपने शरीर के तीन बाल दिए - ऋषि पुरुष-मृगा की कथा

पांडवों ने श्री कृष्ण की मदद से कौरवों पर विजय प्राप्त कर ली थी। अब हस्तिनापुर का राज्य पांडवों के अधीन था। धर्मराज युधिष्ठर राजा बने थे। न्याय और धर्म की प्रतिमूर्ति महाराज युधिष्ठर के राज्य में सब कुशल मंगल था। समस्त हस्तिनापुर आनंदमयी जीवन व्यतीत कर रहा था। कहीं कोई किसी प्रकार का दुःख ना था। एक दिन नारद मुनि राजा युधिष्ठर के पास आये और कहा कि महाराज आप यहाँ वैभवशाली जीवन जी रहे हैं लेकिन वहां स्वर्ग में आपके पिता बड़े ही दुखी हैं। युधिष्ठर ने नारद मुनि से पिता के दुखी होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पाण्डु का सपना था कि वो राज्य में एक राजसू यज्ञ करायें लेकिन वो अपने जीवन काल में नहीं करा पाए बस इसी बात से दुःखी हैं। तब युधिष्ठर ने अपने पिता की शांति के लिए राजसू यज्ञ करने का निर्णय लिया।

16 मार्च 2018

एक प्रश्न जिसके उत्तर देने में ८ पीढ़ियाँ असफल रही - कक्षीवान एवं प्रियमेघ की कथा

पौराणिक काल में एक विद्वान ऋषि कक्षीवान हुए जो हर प्रकार के शास्त्र और वेद में निपुर्ण थे। एक बार वे ऋषि प्रियमेध से मिलने गए जो उनके सामान ही विद्वान और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। दोनों सहपाठी भी थे और जब भी वे दोनों मिलते तो दोनों के बीच एक लम्बा शास्त्रात होता था जिसमे कभी कक्षीवान तो कभी प्रियमेघ विजय होते थे। उस दिन भी ऋषि कक्षीवान ने प्रियमेध से शास्त्रार्थ में एक प्रश्न पूछा कि ऐसी कौन सी चीज है जिसे यदि जलाये तो उस से ताप तो उत्पन्न हो किन्तु तनिक भी प्रकाश ना फैले?

15 मार्च 2018

जब भगवान शिव ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य को निगल लिया

शुक्राचार्य महर्षि भृगु के पुत्र थे तथा बृहस्पति महर्षि अंगिरस के। जब दोनों युवा हुए तो साथ ही सहपाठी के रूप में बृहस्पति के पिता महर्षि अंगिरस के पास शिक्षा प्राप्त करने लगे। थोड़ा समय बीतने पर शुक्राचार्य को लगा कि महर्षि अंगिरस अपने पुत्र बृहस्पति पर अधिक कृपालु हैं। इसी कारण उन्होंने महर्षि अंगिरस का आश्रम छोड़ दिया और महर्षि गौतम को अपना नया गुरु बनाया। गौतम ऋषि ने शुक्राचार्य को बताया कि इस संसार की समस्त विद्या और उससे भी श्रेष्ठ मृतसंजीवनी का ज्ञान तुम्हे केवल महादेव से प्राप्त हो सकता है।

12 मार्च 2018

जब भगवान शंकर ने सेवक का कार्य किया - उगना महादेव की कथा

बिहार पौराणिक कथाओं का एक केंद्र रहा है। आप जब बिहार के मधुबनी जिले के भवानीपुर कस्बे में प्रवेश करते हैं तो वहाँ आपको दो सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम सुनने को मिलते हैं। पहला है मैथली भाषा के महान कवि विद्यापति और दूसरा है महादेव का उगना शिवलिंग मंदिर। ये दोनों एक दूसरे से सम्बंधित हैं जिनकी कथा मधुबनी की लोक कथाओं में हमें मिलती है। लोक कथाओं के अनुसार विद्यापति भगवान् शिव के अनन्य भक्त थे और वे प्रतिदिन प्रातः और सायं भगवान शिव का भजन किया करते थे। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। अपने पति का मन इस प्रकार वैराग्य की ओर झुका देख वे उतनी प्रसन्न नहीं थी।

8 मार्च 2018

पुराण में वर्णित विभिन्न विष

वैसे तो विष या जहर एक आम शब्द है किन्तु हिन्दू पुराणों में कई प्रकार के विष का वर्णन है। आम तौर पर हमने कदाचित केवल कालकूट एवं हलाहल के बारे में सुना है। कई लोगों को ये भी लगता है कि कालकूट और हलाहल एक ही हैं लेकिन ये भी सत्य नहीं है। पुराणों में ९ प्रकार के विष का वर्णन किया गया है जिसकी तीव्रता अलग अलग होती है। कालकूट ब्रम्हांड का दूसरा सबसे घातक और हलाहल ब्रम्हांड का सर्वाधिक घातक विष है। समुन्द्र मंथन के समय सर्व प्रथम सर्वाधिक जहरीला हलाहल ही निकला था जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया था। यहाँ पर उन विषों को उनकी तीव्रता के आधार पर श्रेणीबद्ध किया गया है। ये विष हैं:

3 मार्च 2018

ऐरावत

हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में ऐरावत का वर्णन एक श्वेत गज के रूप में है जो देवराज इंद्र का वाहन है। इसकी भार्या गजा का नाम अभ्रमु कहा गया है। ऐरावत के दस दन्त है जो दसों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और पाँच सूंड हैं जो पाँच प्रमुख देवताओं (पञ्चदेवता) का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहीं-कहीं उसके चार दन्त होने का भी उल्लेख है जो चार प्रमुख दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पुराणों में ऐरावत के और भी कई नाम हैं जिनमे से प्रमुख हैं - अभ्रमातंग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेतहस्ति, मल्लनाग, हस्तिमल्ल, सदादान, सुदामा, श्वेतकुंजर, गजाग्रणी तथा नागमल्ल। महर्षि कश्यप और दक्ष पुत्री क्रुदु द्वारा उत्पन्न एक नाग का नाम भी ऐरावत है किन्तु ये लेख इंद्र के वाहन ऐरावत के बारे में है।

1 मार्च 2018

होलिका दहन

सबसे पहले आप सभी को होलिका दहन की हार्दिक शुभकामनाएं। होलिका दहन सामान्यतः होली से एक दिन पहले मनाया जाने वाला पर्व है जिसे हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसे छोटी होली या धुड़खेली भी कहते हैं। आज के दिन "गोधूलि" स्नान या होली का बड़ा महत्त्व है। गोधूलि का अर्थ होता है गाय के द्वारा उड़ाए गए धूल से होली खेलना। श्रीकृष्ण के बारे में भी ये मान्यता थी कि उनका आकर्षक व्यक्तित्व "गोधूलि स्नान" के कारण ही है। गावों और कस्बों में आज धूल-मिट्टी से होली खेलने की प्रथा है। कई जगह लोग होलिका जलने के बाद उसकी राख से भी होली खेलते हैं। उसके अगले दिन यानि होली के दिन गीले एवं सूखे रंगों से होली खेली जाती है और स्वादिष्ट पकवानों, विशेषकर "पुए" का मजा लिया जाता है।