22 जनवरी 2018

वसन्त पञ्चमी का माहात्म्य

सर्वप्रथम आप सभी को वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएं। वसन्त पञ्चमी भारत का एक प्रमुख त्यौहार है जो हर वर्ष माघ महीने की पाँचवी तिथि को मनाया जाता है। इसी कारण इस त्यौहार को वसन्त पञ्चमी के नाम से जाना जाता है। ये तिथि आम तौर पर जनवरी या फरवरी में पड़ती है। इसी तिथि से शिशिर ऋतु का प्रस्थान और वसन्त ऋतु का आगमन माना जाता है जो भारत में सर्वाधिक प्रिय ऋतु मानी जाती है। ये त्यौहार मुख्य रूप से महादेवी सरस्वती को समर्पित है तथा कहीं-कहीं इसे प्रेम स्वरुप कामदेव और रति को भी समर्पित किया जाता है। 

पुराणों के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में परमपिता ब्रम्हा ने भगवान विष्णु की तपस्या कर उनका साक्षात्कार किया। फिर उन्ही की इच्छा से ब्रम्हदेव ने पूरी सृष्टि की संरचना की। अपनी रचना के पश्चात भी वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें अपनी रचना में पूर्णता का अनुभव नहीं हो रहा था क्युकि उन्हें अपनी रचना में चेतना की जगह जड़ता की अधिकता प्रतीत हो रही थी। ऐसा देख कर उन्होंने पुनः भगवान विष्णु का ध्यान किया और उन्हें अपनी समस्या बताई। नारायण ने उन्हें सुझाव दिया कि कोई ऐसी रचना करें जिससे सृष्टि में चेतना का प्रादुर्भाव हो। इससे प्रेरित होकर ब्रम्हदेव ने अपने कमण्डल से जल छिड़का और अपने मन में एक योगशक्ति का आह्वान किया। उसी समय उनके मानस से एक अत्यंत सुन्दर एवं अलौकिक नारी का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने अपने हाथ में वीणा को धारण किया हुआ था। उन्होंने आकर ब्रम्हदेव को प्रणाम किया तो वे उनकी सुंदरता देख मुग्ध हो गए और स्वयं में एक प्रकार की जड़ता का अनुभव करने लगे। उन्होंने उस देवी से उनके अदभुत वाद्य को बजाने का अनुरोध किया। ब्रम्हदेव की इच्छा से वो देवी वीणा बजाने लगीं और उसके मधुर ध्वनि से समस्त जगत को चेतना की प्राप्ति होने लगी। जो कुछ भी जड़ अवस्था में था वो चेतन हो गया। जल एवं वायु को गति एवं चराचर जीवों को ध्वनि प्राप्त हो गयी। चूँकि उस देवी के संगीत से समस्त जगत को स्वर की प्राप्ति हुई थी, इसी कारण ब्रम्हा ने उन्हें "सरस्वती" नाम दिया और उन्हें संगीत और समस्त प्रकार के विद्या एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री घोषित किया। उसी समय उनके स्वर से सृष्टि में काम का प्रवाह भी हुआ और ब्रम्हा ने उन्हें अपनी भार्या का स्थान दिया।

एक कथा के अनुसार द्वापर युग में देवी सरस्वती की कृपा से श्रीकृष्ण ने केवल ६४ दिनों में समस्त ६४ विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इसी से प्रसन्न होकर उन्होंने देवी सरस्वती को कोई वर देने की इच्छा जताई। सरस्वती के स्वीकृति के पश्चात श्रीकृष्ण ने उन्हें ये वर दिया कि पृथ्वी पर उनकी पूजा की जाएगी और तभी से वसन्त पञ्चमी का पर्व मनाया जा रहा है। ये भी मान्यता है कि देवी पार्वती ने महादेव का व्रत तोड़ने के लिए देवी सरस्वती की सहायता माँगी। उनकी प्रार्थना स्वीकार कर देवी सरस्वती की ही प्रेरणा से कामदेव ने वसन्त पञ्चमी के दिन ही महादेव पर अपने बाण से प्रहार किया और उनके कोप का भाजन बनें। उनकी पत्नी रति के अनुरोध पर महादेव ने ये वरदान दिया कि वसन्त पञ्चमी के दिन देवी सरस्वती के साथ कामदेव और रति की भी पूजा होगी। आज के दिन ही भगवान् राम शबरी से मिले थे और उनके जूठे बेर खाये थे। तभी से बेर सरस्वती पूजा के प्रसाद का एक अभिन्न हिस्सा बन गए और बेर के बिना सरस्वती पूजा का प्रसाद पूर्ण नहीं माना जाता। 

इतिहास के अनुसार जब मुहम्मद गोरी १६ बार हरने के बाद १७ वी बार पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाने में सफल हुआ तो वो इन्हे सजा देने के लिए अफगान ले गया। वहाँ पृथ्वीराज की आँखें फोड़ दी गयी और अंतिम बार उनके शब्दवेधी बाण का कमाल देखने के लिए उनके हाथ में धनुष-बाण दिया गया। चंदरबाई ने गोरी को अपने सिंहासन पर बैठ घंटे पर चोट करने को कहा और साथ ही साथ संकेत से छंद के रूप में पृथ्वीराज को भी बता दिया कि गोरी ही घंटे पर चोट कर रहा है। जैसे ही गोरी ने घंटे की ध्वनि की, पृथ्वीराज का सटीक बाण उनकी छाती में जा धँसा। इसके बाद चंदरबाई और पृथ्वीराज ने एक दूसरे के प्राण लेकर आत्म बलिदान दे दिया। ११९२ को ये ऐतिहासिक घटना वसन्त पञ्चमी के दिन ही घटी थी। 

इतिहास में वीर हकीकत राय का भी जिक्र है जो लाहौर का रहने वाला था। एक बार मदरसे में अन्य मुस्लिम छात्रों ने देवी सरस्वती को अपशब्द कहा जिस कारण उसकी अन्य बच्चों के साथ झड़प हो गयी। शिक्षक के वापस आने पर बच्चों ने झूट बोल दिया कि हकीकत राय ने बीबी फातिमा को अपशब्द कहा है। फलस्वरूप काजी को शिकायत करने पर उसे मृत्युदंड की सजा दी गयी। सजा का दिन वसन्त पञ्चमी को ही निर्धारित किया गया। अंत समय में हकीकत राय से कहा गया कि अगर वो इस्लाम कबूल कर ले तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा पर उसने साफ़ मन कर दिया। सन १७३४ को वसन्त पञ्चमी के दिन ही उसे फांसी दे दी गयी। आजदी से पहले तक उसकी समाधि पर वसन्त पञ्चमी के दिन हिन्दू-मुस्लमान दोनों इकठा हो भाईचारे की मिसाल पेश किया करते थे। आज भी लाहौर में वसन्त पञ्चमी के दिन हकीकत की याद में पतंग उड़ने का रिवाज है।

आज का दिन किसी भी विद्यार्थी के लिए बड़ा खास होता है क्यूंकि ऐसी मान्यता है कि आज के दिन जो भी देवी सरस्वती से विद्या का दान माँगता है उसे वो अवश्य प्राप्त होता है। आज के दिन देवी सरस्वती के ११ नामों को लेने से भी कई गुणा अधिक फल प्राप्त होता है। वो ११ नाम हैं - शारदा, सरस्वती, भारती, वीणावादिनी, बुद्धिदायिनी, हंससुवाहिनी, वागीश्वरी, कौमुदिप्रयुक्ता, ख्यात्वा, चंद्रकांता एवं भुवनेश्वरी। 

भारत के अतिरिक्त अन्य कई देशों में भी अन्य नामों से वसन्त पञ्चमी का त्यौहार मनाया जाता है -
  • बर्मा: थुयथदी, टिपिटक मेदा
  • चीन: बियानचाइत्यान
  • जापान: बेंजाइतेन
  • थाईलैंड: सुरसवदी
आइये इस लेख का अंत एक श्लोक से करते हैं। ऋग्वेद में देवी सरस्वती के बारे में कहा गया है-


प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।


अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं।