14 जनवरी 2018

मकर संक्रांति की कथा एवं उसका महत्त्व

सर्व-प्रथम आप सभी लोगों को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें। आज पूरा देश और कई अन्य जगह विदेशों में भी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। तो आइये आज हम मकर संक्रांति का महत्व जानते हैं और समझते हैं कि ये क्यों मनाया जाता है। मकर संक्रांति से जुडी कुछ पौराणिक कथाएं भी हैं और कई ऐसे पौराणिक प्रसंग हैं जो आज के ही दिन घटित हुए थे।
  • मकर संक्रांति के दिन ही भगवान सूर्य नारायण धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। ऐसी मान्यता है कि आज के ही दिन सूर्यदेव अपनी नाराजगी त्याग कर अपने पुत्र शनिदेव से मिलने जाते हैं जो कि मकर राशि के स्वामी हैं। धनु और मकर राशि के इसी संयोग को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। 
  • मान्यता है कि आज के दिन ही भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर भगवान रूद्र ने देवी गंगा को अपने शीश पर धारण किया था और आज ही के दिन गंगा भगीरथ का अनुसरण करते हुए कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए धरती पर आयी थी। इसी कारण आज के दिन गंगा स्नान, विशेषकर प्रयाग (इलाहबाद) का बड़ा महत्त्व है। माना जाता है कि आज के दिन गंगा स्नान करने वाला व्यक्ति अपने सारे पापों से मुक्त हो जाता है। हालाँकि आज के दिन स्त्रियों का स्नान वर्जित बताया गया है।
  • कहा जाता है कि आज के ही दिन यशोदा माँ ने भगवान विष्णु को अपने पुत्र के रूप में पाने के लिए व्रत किया था और भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर उनकी इच्छा पूरी की। 
  • ऐसा माना जाता है कि आज ही के दिन सूर्यदेव की गति एवं ऊष्मा तिल-तिल करके बढ़ती है अतः इसी कारण आज के दिन तिल से बने मिष्ठान्न बनाने की प्रथा है। 
  • आज के दिन दान का बड़ा महत्त्व है। आज के दिन दान करने से अन्य दिनों के दान से १०० गुणा फल प्राप्त होता है। कहा जाता है कि संक्रांति के दिन सूर्यपुत्र कर्ण अपने समस्त भंडार दान के लिए खोल देता था। 
  • मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही देवताओं का दिन आरम्भ होता है। 
  • शिव पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने भगवान विष्णु को आत्मज्ञान दिया था। 
  • संक्रांति के दिन ही यज्ञ द्वारा दिए गए हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। 
  • आज के दिन को साल का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। कहा जाता है कि आज के दिन जिसे मृत्यु प्राप्त होती है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। आज के दिन ही पितामह भीष्म ने अपना शरीर त्यागा था। जब अर्जुन के बाणों ने उन्हें शर-शैया पर सुला दिया तो उन्होंने शरीर त्यागने से मना कर दिया क्योंकि सूर्य उस समय दक्षिणायन में था। उन्होंने सूर्यदेव के उत्तरायण में आने की प्रतीक्षा करते हुए आज ही के दिन युधिष्ठिर को अंतिम शिक्षा देने के पश्चात अपनी देह का त्याग किया था।
इस दिन का ज्योतिष एवं वैज्ञानिक महत्त्व भी है। इसी दिन सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाते है। अर्थात इसी दिन सूर्य पृथ्वी के दक्षिण गोलार्ध से यात्रा करते हुए उत्तरी गोलार्ध में पहुँचते है। जब सूर्य दक्षिण गोलार्ध में रहते हैं तो दिन छोटे और अपेक्षाकृत ठन्डे होते हैं। सूर्य के उत्तरी गोलार्ध में पहुँचने के बाद धीरे धीरे दिन बड़े होते हैं और तपन थोड़ी बढ़ने लगती है।

कई वर्षों से मकर संक्रांति का दिन १४ जनवरी को आ रहा है इसीलिए लोगों में ये भ्रम है कि मकर संक्रांति का दिन निश्चित होता है। जबकि ऐसा नहीं होता है। ज्योतिष आंकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष २० सेकंड बढ़ रही है। हर वर्ष सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश २० मिनट देरी से होता है इसी कारण हर तीन वर्ष बाद सूर्य एक घंटे और हर ७२ वर्ष बाद १ दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसका मतलब सन २०८० के बाद मकर संक्रांति १४ की जगह १५ जनवरी को मनाई जाएगी। ऐसा कहा जाता है कि अकबर के शासन काल में मकर संक्रांति १० जनवरी को मनाई जाती थी। आज से १००० वर्ष पहले धनु और मकर का ये संयोग ३१ दिसंबर को पड़ता था इसीलिए मकर संक्रांति भी ३१ दिसंबर को मनाई जाती थी। जैसे जैसे सूर्य की दिशा बदली, मकर संक्रांति का दिन आगे बढ़ता गया। आज से लगभग ५००० वर्ष बाद कलियुग के अंत समय ये संयोग बढ़कर फरवरी के अंत तक पहुँच जायेगा। अर्थात मकर संक्रांति तब फरवरी के अंत में मनाई जाएगी। साल २०१२ में धनु और मकर राशि का ये संयोग बिलकुल मध्यरात्रि में हुआ था इसी कारण उस वर्ष मकर संक्रांति १५ जनवरी को मनाई गयी थी। 

मकर संक्रांति को पुरे भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से जाना और मनाया जाता है। तिल और गुड़ से बने मिष्टान्न विशेषकर तिलकुट, दही-चूड़ा, स्वादिष्ट सब्जी और पतंग उड़ाने की भी विशेष प्रथा है। अधिकतर राज्यों में इसे मकर संक्रांति के नाम से ही बनाया जाता है किन्तु कुछ राज्यों में अलग नाम भी हैं। विशेषकर पंजाब और हरियाणा में इसे एक दिन पहले, १३ फरवरी को "लोहड़ी" के नाम से मनाया जाता है।
  • मकर संक्रान्ति: छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, और जम्मू
  • ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल: तमिलनाडु
  • उत्तरायण: गुजरात, उत्तराखण्ड
  • माघी: हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब
  • भोगाली बिहु: असम
  • शिशुर सेंक्रात: कश्मीर घाटी
  • खिचड़ी: उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार
  • पौष संक्रान्ति: पश्चिम बंगाल
  • मकर संक्रमण: कर्नाटक
यही नहीं, मकर संक्रांति को भारत से बाहर भी अन्य नामों से मनाया जाता है। नेपाल में विशेषकर इसे धूम-धाम से मनाया जाता है।*
  • बांग्लादेश: पौष संक्रान्ति
  • नेपाल: माघे सङ्क्रान्ति या 'माघी सङ्क्रान्ति' 'खिचड़ी सङ्क्रान्ति'
  • थाईलैण्ड: सोङ्गकरन
  • लाओस: पि मा लाओ
  • म्यांमार: थिङ्यान
  • कम्बोडिया: मोहा संगक्रान
  • श्री लंका: पोंगल, उझवर तिरुनल
*अन्य राज्यों एवं देशों में अलग-अलग नाम का सन्दर्भ विकिपीडिआ से लिया गया है।