29 जनवरी 2018

दशावतार और डार्विन के सिद्धांत में समानता

हम सभी भगवान् विष्णु के दस अवतारों के बारे में जानते हैं (आप उसके बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं)। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु के ये दस अवतार वैज्ञानिक दृष्टि से भी आश्चर्यजनक रूप से भी प्रकृति के विकास-क्रम से बिलकुल मेल खाती है। डार्विन ने सन १८६० में पृथ्वी पर विकास-क्रम का सिद्धांत दिया था जिसमे उन्होंने ये बताया था कि पृथ्वी पर विभ्भिन्न प्राणी किस क्रम में आये थे। आज इतने वर्षों बाद भी डार्विन का सिद्धांत प्राणी विकास-क्रम में मील का पत्थर माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जो सिद्धांत डार्विन ने १९वीं सदी में दिया था वो हमारे पास सहस्त्रों वर्ष पहले से दशावतार के रूप में हैं। आज बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं कि जो क्रम १५० वर्ष पहले बताया गया था, ठीक उसी क्रम में दशवतार हजारों वर्ष पूर्व हो चुका था। तो ये कहना अनुचित नहीं होगा कि दशावतार के आधार पर डार्विन ने अपना सिद्धांत दिया। हालाँकि इस लेख में हम डार्विन सभी प्राणियों का वर्णन नहीं कर सकते क्योकि वो संभव नहीं है इसलिए मुख प्राणियों का उल्लेख करेंगे। तो आइये इस आश्चर्यजनक तथ्य को जानते हैं।
  1. मत्स्य अवतार: डार्विन के अनुसार प्राणियों में सबसे पहले जलचरों की उत्पत्ति हुई थी। अगर जीवाणुओं/विषाणुओं को छोड़ दिया जाये तो मछली प्राणी-विकास क्रम में सबसे प्रथम स्थान पर थी। हालाँकि जीवाणुओं की तरह ईश्वर को भी सूक्ष्म रूप में माना जा सकता है जो उपस्थित तो हैं किन्तु हम उन्हें देख नहीं सकते। आश्चर्यजनक रूप से भगवान् विष्णु ने पहला अवतार मत्स्य अथवा मछली के रूप में लिया। 
  2. कूर्म अवतार: डार्विन के सिद्धांत के अनुसार दूसरे क्रम में उन प्राणियों और सरीसृपों अस्तित्व में आये जो जल तथा थल दोनों स्थान पर रह सकते थे, जैसे कि कछुआ, मगरमच्छ एवं सर्प। आश्चर्यजनक रूप से विष्णु ने अपना दूसरा अवतार कूर्म यानि कछुए के रूप में लिया। 
  3. वराह अवतार: डार्विन के सिद्धांत के अनुसार अगले क्रम में वो प्राणी थे जो धीरे-धीरे जल को छोड़ थल को अपना निवास स्थान बनाने लगे। थल पर जीवित रहने के लिए वे उग्र स्वाभाव के हुए और शिकार कर अपना भोजन प्राप्त करने लगे। वैसे इस समय भी जलचर उनके भोजन का प्रमुख स्रोत हुआ करते थे। आज के ज़माने में भी ध्रुवीय भालू उसका निकटतम उदाहरण हैं। यहाँ पर भी भगवान् विष्णु का अगला अवतार वराह यानि शूकर के रूप में हुआ। यहाँ तक कि कथा के अनुसार भगवान् वराह ने पृथ्वी को जल स बाहर निकाला जो डार्विन के सिद्धांत में प्राणियों के जल से भूमि पर आने का प्रतीक है। साथ ही साथ ये अवतार पिछले अवतारों से अधिक उग्र था। 
  4. नृसिंह अवतार: डार्विन का अगला क्रम मनुष्यों का विकास था किन्तु वे पूर्ण मनुष्य नहीं थे बल्कि पशु एवं मनुष्यों के मिले जुले रूप थे। स्वाभाव से अत्यधिक उग्र किन्तु पशुओं से अधिक समझदार। डार्विन के सिद्धांत में एप-मैन यानि यतिओं का उल्लेख है जो मानव और पशुओं का मिला जुला रूप था। आज के युग में भी गुर्रिले या वनमानुष उसी श्रेणी में रखे जाते हैं जो है तो पशु किन्तु मनुष्य की बुद्धि के अत्यंत निकट हैं। अगर हम विष्णु के अगले अवतार को देखें तो हमें नृसिंह अवतार पशु एवं मनुष्यों का मिले-जुले रूप में देखने को मिलता है। वे पशुओं की तरह अत्यंत उग्र हैं किन्तु प्रह्लाद की प्रार्थना पर मनुष्यों की तरह शांत भी हो जाते हैं। कई देशों में आदम-भेड़िये की कथा भी प्रचलित है। 
  5. वामन अवतार: डार्विन के अगले क्रम में पशु-मानव धीरे-धीरे पूर्ण मानव की तरह विकसित होते हैं किन्तु उनका पूर्ण विकास नहीं होता। डार्विन इस "निएंडरथल" यानि पुरातन मनुष्य कहते हैं जिनकी ऊंचाई लगभग आधे से २ फुट बताई गयी है। इसे हम मनुष्य क्रम का पहला चरण कह सकते हैं। आश्चर्यजनक रूप से अगर हम विष्णु के अगले अवतार को देखें तो वे वामन अर्थात बौने के रूप में आये। ये भी डार्विन के इस चरण से पूर्णतः मेल खाता है। 
  6. परशुराम अवतार: डार्विन के अनुसार अगला चरण पहले आधुनिक मनुष्यों का है जो लौह-कालीन युग में थे। इन्हे भी पूर्ण रूपेण सभ्य नहीं माना जाता। मार-काट करना उनका स्वाभाव था और उनके पास पत्थरों और धातुओं से बने हथियार होते थे। विष्णु के अगले अवतार परशुराम भी इसके बहुत निकट है। वे भी परशु धारण करते हैं और क्रोधित इतने कि २१ बार पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर देते हैं। परशुराम से ही वास्तव में डार्विन के मनुष्य क्रम की शुरुआत होती है। 
  7. राम अवतार: डार्विन के अनुसार अभी का जो मानव है अब एक प्राणी के रूप में उससे अधिक विकसित होना संभव नहीं है किन्तु सामाजिक रूप से अब हम अपने आप को विकसित कर सकते हैं। अगला प्राणिरूप विकास तभी संभव है जब ब्रम्हांड में कुछ खगोलीय बदलाव हो। विष्णु का अगले अवतार श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम माना जाता है। ये ना केवल सम्पूर्ण मानव है बल्कि समाज की प्रत्येक मर्यादा को वहन करने वाले हैं। भगवान् विष्णु के सभी अवतारों में श्रीराम से अधिक सभ्य, संतुलित एवं मर्यादित कोई और अवतार नहीं है। 
  8. कृष्ण अवतार: इसे परमावतार माना जाता है। जहाँ राम हमेशा से अपने सद्गुणों के कारण विख्यात थे, कृष्ण में हर प्रकार के मानुषिक गुण के साथ-साथ दोष भी थे। आजकल के राजनीतितिक परिवेश में कृष्ण एक कुशल राजनितिक के रूप में बिलकुल फिट बैठते हैं। ये डार्विन के सामाजिक विकास-क्रम का एक उत्तम उदाहरण है। जहाँ राम ने किसी प्रकार का छल नहीं किया, कृष्ण धर्म की विजय के लिए समस्त छल करते दीखते हैं। 
  9. बुद्ध अवतार: शांति कदाचित मनुष्य के सामाजिक विकास-क्रम का अगला पड़ाव है और बुद्धावतार मुख्य रूप से शांति का पक्षधर है। साथ ही साथ ये अवतार ही एक ऐसा अवतार है जो अमानवीय या अतिमानवीय घटनाओं से बहुत दूर है। 
  10. कल्कि अवतार: डार्विन के अनुसार विकास का चक्र के निश्चित समय के बाद अपने आप को दोहराता है। कल्कि अवतार कदाचित उसी का प्रतीक होगा जब भगवान् विष्णु का ये अवतार पाप में लिप्त प्राणियों को पुण्य की ओर तथा कलियुग को पुनः सतयुग की ओर धकेलेगा। 
अभी तक आपको आश्चर्य अवश्य हुआ होगा किन्तु अब अंतिम आश्चर्यजनक चीज बताता हूँ। डार्विन का सिद्धांत मुख्यतः ४ भाग में बंटा है - पशु, पशुवत, अपूर्ण प्राणी एवं पूर्ण प्राणी। ठीक इसी प्रकार दशावतार भी विभाजित है। मत्स्य, कूर्म एवं वराह पशुरूपी अवतार हैं, नृसिंह पशुवत अर्थात पशु एवं मनुष्य के मिले जुले रूप हैं, वामन और कुछ हद तक परशुराम अपूर्ण तथा राम, कृष्ण एवं बुद्ध पूर्ण पुरुष अवतार हैं। यही नहीं ये सारे अवतार चार युगों में भी बटें हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह एवं नृसिंह सतयुग में, वामन, परशुराम, श्रीराम त्रेतायुग में, श्रीकृष्ण द्वापरयुग में तथा बुद्ध एवं कल्कि कलियुग में अवतरित हैं। है ना आश्चर्यजनक!