6 मार्च 2012

महाभारत में अठारह संख्या का महत्त्व

महाभारत कथा में १८ (अठारह) संख्या का बड़ा महत्त्व है। महाभारत की कई घटनाएँ १८ संख्या से सम्बंधित है। कुछ उदाहरण देखें:
  • महाभारत का युद्ध कुल १८ दिनों तक हुआ था। 
  • कौरवों (११ अक्षौहिणी) और पांडवों (९ अक्षौहिणी) की सेना भी कुल १८ अक्षौहिणी थी। अक्षौहिणी सेना के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ जाएँ।
  • अक्षौहिणी सेना के प्रत्येक भाग की संख्या के अंकों का कुल जमा १८ आता है।
  • महाभारत में कुल १८ पर्व हैं (आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट वरव, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशाशन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व)।
  • महाभारत में कुल १८ अध्याय हैं (अर्जुनविषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग, कर्मसंन्यासयोग, आत्मसंयमयोग, ज्ञानविज्ञानयोग, अक्षरब्रह्मयोग, राजविद्याराजगुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञविभागयोग, गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुरसम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रयविभागयोग और मोक्षसंन्यासयोग)।
  • गीता उपदेश में भी कुल १८ अध्याय हैं।
  • गीता में ही श्रीकृष्ण ने एक आदर्श पुरुष के १८ लक्षण बताये हैं। 
  • इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी १८ हैं (धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण, शकुनी, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वथामा, कृतवर्मा, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी, विदुर एवं श्रीकृष्ण)।
  • महाभारत के युद्ध के पश्चात् दोनों और से केवल १८ योद्धा ही जीवित बचे। तीन कौरवों की ओर से (अश्वथामा, कृतवर्मा एवं कृपाचार्य) और १५ पांडवों (श्रीकृष्ण, पाण्डव, सात्यिकी इत्यादि) की ओर से। 
  • महाभारत को पुराणों के जितना सम्मान दिया जाता है। दोनों को महर्षि वेदव्यास ने ही लिखा और पुराणों की संख्या भी १८ है।
  • महाभारत में कुल लगभग १८ लाख शब्द हैं। 
  • महाभारत का वास्तविक नाम "जय" (विजय) है और संस्कृत में जय की सांख्यिकी १८ बताई गयी है। 
  • श्रीकृष्ण ने कंस का वध १८ वर्ष की आयु में किया। 
  • जरासंध ने मथुरा पर १८ बार आक्रमण किया। 
  • जरासंध मथुरा पर १८ वर्षों तक आक्रमण करता रहा। 

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