बुधवार, 19 मई 2010

पुष्करद्वीप

  • पुष्करद्वीपमें वहाँके अधिपति महाराज सवन के महावीर और धातकिनामत दो पुत्र हुए। अतः उन दोनोंके नामानुसार उसमें महावीर-खण्ड और धातकी-खण्ड नामक दो वर्ष है.
  • इसमें मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत कहा जाता हैं जो इसके मध्यमें वलयाकार स्थित है तथा पचास सहस्त्र (५००००) योजन ऊँचा और इतना ही सब और गोलाकार फैला हुआ है.
  • यह पर्वत पुष्करद्वीपरुप गोलेकी मानो बीचमेंसे विभक्त कर रहा हैं और इससे विभक्त होनेसे उसमें दो वर्ष हो गये है. उनमेंसे प्रत्येक वर्ष और वह पर्वत वलयाकार ही है.
  • वहाँके मनुष्य रोग, शोक, और रागद्वेषादिसे रहित हुए दस सहस्त्र (१००००) वर्षतक जीवित रहते है. उनमें उत्तम अधम अथवा वध्यवधक आदि भाव नहीं हैं और न उनमें ईर्ष्या, असूया, भय द्वेष और लोभादि दोष ही है.
  • महावीरवर्ष मानसोत्तर पर्वत के बाहरकी और है और धातकी-खण्ड भीतरकी ओर. इनमें देव और दैत्य आदि निवास करते है. दो खण्डोंसे युक्त उस पुष्करद्वीपसें सत्य और मिथ्याका व्यवहार नहीं है और न उसमें पर्वत तथा नदियाँ ही हैं.
  • वहाँके मनुष्य और देवगण समान वेष और समान रूपवाले होते हैं। वर्णाश्रमाचारसे हीन, काम्य कर्मोंसे रहित तथा वेदयत्री, कृषि, दण्डनीति और शुश्रुषा आदिसे शून्य वे दोनों वर्ष तो मानो पृथवी के स्वर्ग हैं.
  • उन महावीर और धातकी-खण्ड नामक वर्षोंमें काल (समय) समस्त ऋतुओंमें सुखदायक और जरा तथा रोगादिसे रहित रहता है.
  • पुष्करद्वीपमें ब्रह्माजीका उत्तम निवासस्थान एक न्यग्रोध (वट) का वृक्ष है, जहाँ देवता और दानवादि से पूजित श्रीब्रह्माजी विराजते हैं.
  • पुष्करद्वीप चारों ओर से अपने ही समान विस्तार वाले मीठे पानी के समुद्रसे मण्डल के समान घिरा हुआ है.
  • इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोसें घिरे हुए हैं और वे द्वीप तथा (उन्हें घेरनेवाले) समुद्र परस्पर समान हैं, और उत्तरोत्तर दुने होते गये हैं. सभी समुद्रोमें सदा समान जल रहता हैं उसमें कभी न्यूनता अथवा अधिकता नहीं होती.
  • पात्र का जल जिस प्रकार अग्निका संयोग होंनेसे उबलने लगना है उसी प्रकार चन्द्रमाकी कलाओंके बढ़्नेसे समुद्रका जल भी बढ़ने लगता हैं. शुक्ल और कृष्ण पक्षोंमें चन्द्रमाके उदय और अस्तसे न्यूनाधिक न होते हुए ही जल घटता और बढ़्ता है. समुद्रके जलकी वृद्धि और क्षय पाँच सौ दस (५१०) अंगुल तक देखी जाती है.
  • पुष्करद्वीपमें सम्पूर्ण प्रजावरी सर्वदा (बिना प्रयत्नके) अपने - आप ही प्राप्त हुए षड्‌रस भोजनका आहार करते हैं. स्वादुदक (मीठे पानीके) समुद्रके चारों ओर लोकनिवाससे शून्य और समस्त जीवोंसे रहित उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिखायी देती है.
  • वहाँ दस सहस्त्र (१००००) योजन विस्तारवाला लोकालोक पर्वत है और वह पर्वत ऊँचाई में भी उतने ही सहस्त्र योजन हैं. उसके आगे उस पर्वतको सब ओरसे आवृतकर घोर अन्धकार छाया हुआ है, तथा वह अन्धकार चारों ओरसें ब्रह्माण्ड-कटाह से आवृत हैं.
  • अण्डकटाह के सहित द्वीप, समुद्र, और पर्वतादियुक्त यह समस्त भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तारवाला है. आकाशादि समस्त भूतोंसे अधिक गुणवाली यह पृथिवी सम्पुर्ण जगत्‌की आधारभूता और उसका पालन तथा उद्भव करनेवाली है.
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