सोमवार, 10 मई 2010

प्लक्षद्वीप

हिन्दु धर्म में विष्णु पुराण के अनुसार पृथ्वी का वर्णन इस प्रकार है। यह वर्णन श्रीपाराशर जी ने श्री मैत्रेय ऋषि से कियी था। उनके अनुसार इसका वर्णन सौ वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है।

प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे: शान्तहय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेमक, ध्रुव. यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।

इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं: गोमेद, चंद्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और वैभ्राज। इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।
  • प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है। जिस प्रकार जम्बूद्वीप क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ है उसी प्रकार क्षारसमुद्रको घेरें हुए प्लक्षद्वीप स्थित है. 
  • जम्बूद्वीपका विस्तार एक लक्ष योजन है; और प्लक्षद्वीपका उससे दूना कहा जाता हैं. 
  • प्लक्शद्वीपके स्वामी मेधातिथिके सात पुत्र हुए । उनमें सबसे बड़ा शान्तहय था और उससे छोटा शिशिर. 
  • उनके अनन्तर क्रमशः सुखोदय, आनन्द, शिव और क्षेमक थे तथा सातवाँ ध्रुव था । ये सब प्लक्षद्वीपके अधीश्वर हुए (उनके अपने-अपने अधिकृत वर्षोमें) प्रथम शान्तहयवर्ष है तथा अन्य शिशिरवर्ष, सुखोदयवर्ष, आनन्दवर्ष, शिववर्ष, क्षेमकवर्ष और ध्रुववर्ष हैं. 
  • तथा उनकी मर्यादा निश्चित करनेवाले अन्य सात पर्तव हैं । गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और सातवाँ वैभ्राज. 
  • इन अति सुरम्य वर्ष-पर्वतों और वर्षोमें देवता और गन्धवोंके सहित सदा निष्पाप प्रजा निवास करती है. वहाँके निवासीगण पुण्यवान होते हैं और वे चिरकालातक जीवित रहकर मरते हैं; उनको किसी प्रकरकी अधिव्याधि नहीं होती, निरन्तर सुख ही रहता है. 
  • उन वर्षोंकी सात ही समुद्रगामिनी नदियाँ हैं । अनुतत्पा, शिखी, विपाशी , त्रिदिवा, अक्लमा, अम्रुता और सुकृता - ये ही सात नदियाँ है. यह प्रधान - प्रधान पर्वत और नदियोंका वर्णन हैं; वहाँ छोटे-छोटे पर्वत और नदियाँ तो और भी सहस्त्रों हैं. उस देशके हृष्ट-पृष्ट लोग सदा उन नदियोंका जल पान करते है. उन लोगोंमें ह्नास अथवा वॄद्धि नहीं होती और न उन सात वर्षोमें युगकी ही कोई अवस्था है. 
  • प्लक्षद्वीपसे लेकर शाकाद्वीपपर्यन्त छहों द्वीपोमें सदा त्रेतायुगके समान समय रहता है. इन द्वीपोके मनुष्य सदा नीरोग रहकर पाँच हजार वर्षतक जीते हैं और इनमें वर्णाश्रम-विभागानुसार पाँचों धर्म (अहिंसा , सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) वर्तमान रहते है. 
  • वहाँ चार वर्ण है जो आर्यक, कुरर, विदिश्य और भावी नामक जातियाँ हैं; वे ही क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र है.
  • उसीमें जम्बूवृक्षक ही परिमाणवाला एक प्लक्ष ( पाकर ) का वृक्ष है, जिसके नामसे उसकी संज्ञा प्लक्षद्वीप हुई है. वहाँ आर्यकादि वर्णोद्वारा जगत्स्त्रष्टा, सर्वरूप, सर्वेश्वर भगवान् हरिका सोमरूपसे यजन किया जाता हैं. 
  • प्लक्षद्वीप अपने ही बराबर परिमाणवाले वृत्ताकार इक्षुरसके समुद्रसे घिरा हुआ है.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें