6 अप्रैल 2010

राम-शंकर युद्ध

बात उन दिनों कि है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ चल रहा था. श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के नेतृत्व में असंख्य वीरों की सेना सारे प्रदेश को विजित करती जा रही थी जहाँ भी यज्ञ का अश्व जा रहा था। इस क्रम में कई राजाओं के द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन्हें झुकना पड़ा। शत्रुघ्न के आलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भारत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था।

कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोडा देवपुर पहुंचा जहाँ राजा वीरमणि का राज्य था। राजा वीरमणि अति धर्मनिष्ठ तथा श्रीराम एवं महादेव के अनन्य भक्त थे। उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे। राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह भी एक अतिरथी थे। राजा वीरमणि ने भगवान रूद्र की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान दिया था। महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था। 

जब यज्ञ का अश्व घूमते-घूमते उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया और अयोध्या के साधारण सैनिकों से कहा यज्ञ का घोडा उनके पास है इसलिए वे जाकर शत्रुघ्न से कहें की विधिवत युद्ध कर वो अपना अश्व छुड़ा लें। जब रुक्मांगद ने ये सूचना अपने पिता को दी तो वो बड़े चिंतित हुए और अपने पुत्र से कहा की अनजाने में तुमने श्रीराम के यज्ञ का घोडा पकड़ लिया है। श्रीराम हमारे मित्र हैं और उनसे शत्रुता करने का कोई औचित्य नहीं है इसलिए तुम यज्ञ का घोडा वापस लौटा आओ। इसपर रुक्मांगद ने कहा कि हे पिताश्री, मैंने तो उन्हें युद्ध के चुनौती भी दे दी है अतः अब उन्हें बिना युद्ध के अश्व लौटना हमारा और उनका दोनों का अपमान होगा। अब तो जो हो गया है उसे बदला नहीं जा सकता इसलिए आप मुझे युद्ध करने की आज्ञा दें। पुत्र की क्षत्रियसंगत बात सुनकर वीरमणि ने उसे सेना सुसज्जित करने की आज्ञा दे दी। राजा वीरमणि अपने भाई वीरसिंह और अपने दोनों पुत्र रुक्मांगद और शुभांगद के साथ विशाल सेना ले कर युद्ध क्षेत्र में आ गए। 

इधर जब शत्रुघ्न को सूचना मिली की उनके यज्ञ का घोडा बंदी बना लिया गया है तो वो बहुत क्रोधित हुए एवं अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध के लिए युध्क्षेत्र में आ गए। उन्होंने पूछा की उनकी सेना से कौन अश्व को छुड़ाएगा? तब भरत-पुत्र पुष्कल ने कहा कि "तातश्री! आप चिंता न करें। आपके आशीर्वाद और तात श्रीराम के प्रताप से मैं आज ही इन सभी योधाओं को मार कर अश्व को मुक्त करता हूँ। वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे कि पवनसुत हनुमान ने कहा कि - "हे शत्रुघ्न! मुझे आपकी और वत्स पुष्कल की वीरता पर कोई संदेह नहीं है किन्तु राजा वीरमणि के राज्य पर आक्रमण करना स्वयं परमपिता ब्रम्हा के लिए भी कठिन है क्योंकि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है। अतः उचित यही होगा कि पहले हमें बातचीत द्वारा राजा वीरमणि को समझाना चाहिए और अगर हम न समझा पाए तो हमें श्रीराम को सूचित करना चाहिए। राजा वीरमणि श्रीराम का बहुत आदर करते हैं इसलिये वे उनकी बात नहीं टाल पाएंगे और ये समस्या बिना युद्ध के हल हो जाएगी।" हनुमान की बात सुन कर शत्रुघ्न बोले "हे महाबली! आपको युद्ध से विरत होने को इच्छुक मैं पहली बार देख रहा हूँ। हमारे रहते अगर श्रीराम को युध्भूमि में आना पड़े, ये हमारे लिए अत्यंत लज्जा की बात है। अगर ये नगरी महादेव द्वारा रक्षित है तब तो हमारा जीतना असंभव है किन्तु फिर भी हम क्षत्रिय है इसी कारण अब युद्ध से पीछे नहीं हट सकते।" ये कहकर वे सेना सहित युद्धभूमि में पहुच गए। 

युद्धस्थल में उन्होंने एक बार फिर वीरमणि को अश्व लौटने को कहा किन्तु उनके मना करने पर अंततः भयानक युद्ध छिड़ गया। पुष्कल सीधा जाकर राजा वीरमणि से भिड गया। दोनों अतुलनीय वीर थे, वे दोनों तरह तरह के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करते हुए युद्ध करने लगे। हनुमान राजा वीरमणि के भाई महापराक्रमी वीरसिंह से युद्ध करने लगे। रुक्मांगद और शुभांगद ने शत्रुघ्न पर धावा बोल दिया। पुष्कल और वीरमणि में बड़ा घमासान युद्ध हुआ। पुष्कल ने वीरमणि पर आठ नाराच बाणों से वार किया जिसे राजा वीरमणि सह नहीं पाए और मुर्छित होकर अपने रथ पर गिर पड़े। वीरसिंह ने हनुमान पर कई अस्त्रों का प्रयोग किया पर उससे पवनपुत्र का क्या बिगड़ता? उन्होंने ने एक विशाल पेड़ उखाड़ कर वीरसिंह पर वार किया। इससे उनका रथ नष्ट हो गया और वीरसिंह रक्त-वमन करते हुए मूर्छित हो गए। उधर शत्रुघ्न और राजा वीरमणि के पुत्रों में असाधारण युद्ध चल रहा था किन्तु रुक्मांगद और शुभांगद शत्रुघ्न के बल का पार ना पा सके और उनसे परास्त हुए। उनकी विजय देख कर श्रीराम की की सेना के सभी वीर सिंहनाद करने लगे। उधर राजा वीरमणि की मूर्छा दूर हुई तो उन्होंने देखा की उनकी सेना की पराजय निश्चित है। ये देख कर उन्होंने भगवान रूद्र से सहायता की प्रार्थना की। 

महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जान कर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणों को युध्क्षेत्र में भेज दिया। महाकाल के सारे अनुचर उनकी जयजयकार करते हुए अयोध्या की सेना पर टूट पड़े। श्रीराम की सेना को लगा जैसे प्रलय आ गया हो। जब उन्होंने भयानक मुख वाले रुद्रावतार वीरभद्र, नंदी, भृंगी सहित महादेव की सेना को देखा तो सारे सैनिक भय से कांप उठे। शत्रुघ्न ने कहा - "जिस वीरभद्र ने बात ही बात में दक्ष प्रजापति की मस्तक काट डाला था, जिसे स्वयं नारायण परास्त ना कर पाए थे और जो तेज और समता में स्वयं महाकाल के सामान है, उसे युद्ध में कैसे हराया जा सकता है?" ये सुनकर पुष्कल ने कहा - "हे तातश्री! आप दुखी ना हों। मैं अभी इस वीरभद्र का मस्तक काट कर सेना को अभय प्रदान करता हूँ।" ये कहते हुए पुष्कल सीधे वीरभद्र से जा भिड़े। जब हनुमान ने ये देखा तो उन्होंने शत्रुघ्न से कहा - "ये तो अनर्थ हो गया। वीर मद में पुष्कल वीरभद्र से युद्ध कर रहे हैं। उनका युद्धकौशल तो वीरभद्र के लिए केवल एक खेल है।" ये सुनकर शत्रुघ्न निराश होकर बोले - "हे महावीर! पुष्कल को भ्राता भरत ने मेरे भरोसे युद्ध भूमि में भेजा था। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा। हे पवनपुत्र! आपने तो लंका युद्ध में श्रीराम की सहायता की है अतः अब जैसे भी हो पुष्कल को वीरभद्र से बचाओ।" ये सुनकर हनुमान अविलम्ब पुष्कल की सहायता के लिए वीरभद्र की ओर बढे। उधर पुष्कल ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग वीरभद्र पर कर दिया लेकिन वीरभद्र ने उन्हें हँसते हुए काट दिया। उन्होंने पुष्कल से कहा - "हे बालक! अभी तुम्हारी आयु मृत्यु को प्राप्त होने की नहीं हुई है इसलिए युद्धक्षेत्र से हट जाओ।" किन्तु पुष्कल ने उनकी बात ना सुनते हुए उनपर शक्ति से प्रहार किया जो सीधे वीरभद्र के मर्मस्थान पर जाकर लगा। इसके बाद वीरभद्र ने क्रोध से थर्राते हुए एक त्रिशूल से पुष्कल का मस्तक काट लिया।

जब तक हनुमान वीरभद्र तक पहुँचते, पुष्कल की मृत्यु हो चुकी थी। उधर नंदी, भृंगी आदि गणों ने शत्रुघ्न पर भयानक आक्रमण कर दिया और पुष्कल के वध में संतप्त शत्रुघ्न को पाश में बाँध लिया। जब हनुमान ने पुष्कल का मृत शरीर देखा तो क्रोध में भरकर वीरभद्र पर हमला किया। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति से हनुमान पर अपनी मुष्टि का प्रहार किया जिससे वीरभद्र कई हाथ पीछे गिर गए। ऐसा शक्तिशाली प्रहार उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं सहा था। वे क्रोध से उन्मत्त हो हनुमान पर टूट पड़े। फिर तो दोनों में ऐसा प्रलयंकारी युद्ध हुआ कि सब अपने हाथ रोक कर दोनों का युद्ध देखने लगे। दोनों रुद्रावतार थे, दोनों के बल का कोई पार नहीं था और दोनों के प्रहारों से ऐसी ऊष्मा उत्पन्न हो रही थी जैसे तड़ित का प्रहार हो। दोनों में से कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था और ऐसा लग रहा था कि उनके प्रहारों से सृष्टि का नाश हो जाएगा। उनके युद्ध की भीषणता को देखकर साधारण सैनिकों ने भय से अपने नेत्र बंद कर लिए। उधर नंदी ने जब देखा कि उन दोनों के युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकल सकता तो वे वीरभद्र की सहायता को आये और कोई अन्य उपाय ना देख कर उन्होंने शिवास्त्र का प्रयोग कर हनुमान पाश में बाँध लिया।

अब शत्रुघ्न को निराश देख कर हनुमान ने कहा - "मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी। अब इस संकट से बचाव का एक ही उपाय है कि श्रीराम ही यहाँ आकर इस युद्ध को बंद करवाएँ।" ऐसा सुनते ही शत्रुघ्न ने श्रीराम का स्मरण किया। अपने भाई और भक्तों की पुकार सुन कर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ युद्धक्षेत्र में आ गए। उन्हें देख कर जैसे पूरी सेना में प्राण का संचार हो गया और उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी विजय निश्चित है। श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया। जब श्रीराम ने देखा कि पुष्कल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। भरत तो शोक से मूर्छित ही हो गए। तब श्रीराम ने क्रोध में आकर वीरभद्र से कहा कि तुमने जिस प्रकार पुष्कल का वध किया है उसी प्रकार अब अपने जीवन का भी अंत समझो। ऐसा कहते हुए श्रीराम ने अपनी सेना के साथ शिवगणों पर धावा बोल दिया। जल्द ही उन्हें ये पता चल गया कि शिवगणों पर साधारण अस्त्र बेकार है इसलिए उन्होंने महर्षि विश्वामित्र और स्वयं महादेव द्वारा प्रदान किये दिव्यास्त्रों से वीरभद्र और नंदी सहित सारे शिवगणों को विदीर्ण करना आरम्भ किया। अपने ही प्रभु महादेव के अस्त्रों को रोक पाने में शिवगण असमर्थ रहे और श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान, भरत और शत्रुघ्न के प्रताप से पार न पाते हुए सारे गणों ने एक स्वर में महादेव का आह्वान किया। 

महादेव ने जब देखा कि उनकी सेना संकट में है तो वे स्वयं युद्धक्षेत्र में प्रकट हुए। हरि और हर का संयोग देखने के लिए समस्त देवता स्वयं परमपिता ब्रह्मा के साथ आकाश में स्थित हो गए। जब श्रीराम ने देखा कि स्वयं महादेव रणक्षेत्र में आये हैं तो उन्होंने शस्त्र का त्याग कर भगवान रूद्र को दंडवत प्रणाम किया एवं उनकी स्तुति की। उन्होंने महाकाल की स्तुति करते हुए कहा - "हे सारे ब्रम्हांड के स्वामी! आपके ही प्रताप से मैंने महापराक्रमी रावण का वध किया। आप स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में रामेश्वरम पधारे। हमारा जो भी बल है वो भी आपके आशीर्वाद के फलस्वरूप हीं है और ये जो अश्वमेघ यज्ञ मैंने किया है वो भी आपकी ही इच्छा से ही हो रहा है। इसीलिए हमपर कृपा करें और इस युद्ध का अंत करें।" ये सुन कर भगवान रूद्र बोले - "हे राम! आप स्वयं विष्णु के दूसरे रूप है और बल एवं तेज में उन्हें के समान है। जो मैं हूँ वो आप हैं और जो आप हैं वही मैं हूँ। किन्तु मैंने अपने भक्त वीरमणि को उसकी रक्षा का वरदान दिया है इसलिए मैं इस युद्ध से पीछे नहीं हट सकता। अतः संकोच छोड़ कर आप मुझसे युद्ध करें।

श्रीराम ने इसे महाकाल की आज्ञा मानी और युद्ध करना आरम्भ किया। श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग महाकाल पर कर दिया पर उन्हें संतुष्ट नहीं कर सके। तब हनुमान ने अचानक ही अपने अतुल बल का प्रदर्शन करते हुए नंदी को अपनी पूछ में लपेट लिया। उसी समय श्रीराम ने महादेव पर जम्हाई लाने वाले अस्त्र का प्रयोग किया जिससे महादेव को निद्रा आने लगी और वे जम्हाई लेने लगे। ये देख कर नंदी हनुमान की पकड़ से मुक्त होने का प्रयास करने लगा किन्तु हनुमान ने उन्हें रोकने के लिए अपना पूरा बल लगा दिया। इससे महादेव का तो कुछ नहीं बिगड़ा किन्तु नंदी को अपार कष्ट हुआ। तभी महादेव सचेत हुए और हँसते हुए नंदी को हनुमान के पूछ से मुक्त कराया और हनुमान की प्रशंसा करते हुए कहा - "हे वीर! तुम निश्चय ही मेरे ही अंश हो अन्यथा वीरभद्र को रोकना और नंदी को अपने पाश में जकड लेना किसी अन्य योद्धा के लिए संभव नहीं है।" महादेव से अपनी प्रसंसा सुन हनुमान ने उन्हें प्रणाम किया और युद्ध जारी रखा। उधर श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों के विफल होने पर महादेव पर ब्रह्मास्त्र चलाया। किन्तु ब्रह्मा और शिव में क्या भेद। वो अस्त्र भी महादेव को हानि ना पहुँचा सका।

अंत में श्रीराम ने पाशुपतास्त्र के संधान किया और भगवान शिव से बोले - "हे प्रभु! ये अस्त्र आपने ही मुझे वरदान में दिया था। साथ ही आपने ये वरदान दिया था कि आपके द्वारा प्रदत्त इस महास्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता। इसी महान अस्त्र से आपने एक ही बार में त्रिपुर का नाश कर दिया था। इसलिए हे महादेव! आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर हीं करता हूँ। अब आप ही अपने वरदान की रक्षा करें।" ये कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर ही चला दिया। वो अस्त्र सीधा महादेव के हृदयस्थल में समा गया और भगवान रूद्र इससे संतुष्ट हो गए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा - "हे पुरुषोत्तम! आपने और हनुमान ने मुझे युद्ध में संतुष्ट किया है। मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ इसी लिए जो इच्छा हो वार मांग लें।" इसपर श्रीराम ने कहा - "प्रभु! कृपा कर इस युद्ध को समाप्त करें। साथ ही इस युद्ध में मेरे भ्राता भरत के पुत्र पुष्कल के साथ असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है। अगर आप मुझसे प्रसन्न है तो उन्हें जीवनदान दें।" तब महादेव ने मुस्कुराते हुए तथास्तु कहा और पुष्कल समेत दोनों ओर के सारे योद्धाओं को जीवित कर दिया। उसके बाद उनकी आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का घोडा श्रीराम को लौटा दिया और अपना राज्य रुक्मांगद को सौंप कर वे भी श्रीराम की सेना के साथ दिग्विजय को चल दिए।

1 टिप्पणी:

  1. सुन्दर....जब महाकाल एवं मर्यादा में युद्ध (द्वन्द्व-किसे चुनें ) होता है तो सदैव श्रद्धा व भक्ति ही मार्गदर्शन करते हैं जो स्वयं महाकाल की ही मर्यादायें हैं.....

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