29 मार्च 2010

अश्वमेध यज्ञ

अश्वमेध भारतवर्ष का एक प्रख्यात यज्ञ था। सार्वभौम राजा अर्थात् चक्रवर्ती नरेश ही अश्वमेध का अधिकारी माना जाता था, परंतु ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार अन्य महत्वशाली राजन्यों का भी इसके विधान में अधिकार था। आश्वलायन श्रौत सूत्र का कथन है कि जो सब पदार्थो को प्राप्त करना चाहता है, सब विजयों का इच्छुक होता है और समस्त समृद्धि पाने की कामना करता है वह इस यज्ञ का अधिकारी है। इसलिए सार्वीभौम के अतिरिक्त भी मूर्धाभिषिक्त राजा अश्वमेध कर सकता था। यह अति प्राचीन यज्ञ प्रतीत होता है क्योंकि ऋग्वेद के दो सूक्तों में  अश्वमेधीय अश्व तथा उसके हवन का विशेष विवरण दिया गया है। शतपथ तथा तैतिरीय ब्राह्मणों में इसका बड़ा ही विशद वर्णन उपलब्ध है जिसका अनुसरण श्रौत सूत्रों, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में तथा जैमिनीय अश्वमेध में किया गया है।

अश्वमेध का आरंभ फाल्गुन शुक्ल अष्टमी या नवमी से अथवा ज्येष्ठ (या आषाढ़) मास की शुक्लाष्टमी से किया जाता था। आपस्तंब ने चैत्र पूर्णिमा इसके लिए उचित तिथि मानी है। मूर्धाभिषिक्त राजा यजमान के रूप में मंडप में प्रवेश करता था और उसके पीछे उसकी चारों पत्नियाँ सुसज्जित वेश में गले में सुनहला निष्क पहनकर अनेक दासियों तथा राजपुत्रियों के साथ आती थीं। इनके पदनाम थे
  • महिषी (राजाके साथ अभिषिक्त पटरानी)
  • वावाता (राजा की प्रियतमा)
  • परिवृक्त्री (परित्यक्ता भार्या)
  • पालागली (हीन जाति की रानी)
अश्वमेध का घोड़ा बड़ा ही सुडौल, सुदंर तथा दर्शनीय चुना जाता था। उसके शरीर पर श्याम रंग की चौरी होती थी। पास के तालाब में उसे विधिवत् स्नान कराकर इस पावन कर्म के लिए अभिषिक्त किया जाता। तब वह सौ राजकुमारों के संरक्षण में वर्ष भर स्वच्छंद घूमने के लिए छोड़ दिया जाता था। अश्व की अनुपस्थिति में तीन इष्टियाँ प्रति दिन सवितृदेव के निमित दी जाती थीं और ब्राह्मण तथा क्षत्रिय जाति के वीणावादक स्वरचित पद्य प्रति दिन राजा की स्तुति में वीणा बजाकर गाते थे। प्रति दिन पारिप्लव (विशिष्ट आख्यान) का पारायण किया जाता था। एक साल तक निविघ्न घूमने के बाद जब घोड़ा सकुशल लौट आता था तब राजा दीक्षा ग्रहण करता था। अवश्मेध तीन सुत्या दिवसों का अहीन याग था। "सुत्या" से अभिप्राय सोमलता को कूटकर सोमरस चुलाने से था। इसमें बारह दीक्षाएँ, बारह उपसद और तीन सुत्याएँ होती थीं। २१ अरत्नि ऊँचे २१ यूप प्रस्तुत किए जाते थे। दूसरा सुत्यादिवस प्रधान और विशेष महत्वशाली होता था। उस दिन अश्वमेधीय अश्व को अन्य तीन घोड़ों के साथ रथ में जोतकर तालाब में स्नान कराया जाता था। ब्रह्मोद्य से तात्पर्य गूढ़ पहेलियों का पूछना और बूझना होता है। तब राजा व्याघ्रचर्म या सिंहचर्म पर बैठता था। तीसरे दिन उपांग याग होते थे और ऋत्विजों को भूरि दक्षिणा दी जाती थी। होता, ब्रह्मा, अध्वर्यु तथा उद्गाता को पूरब, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशाओं में विजित देशों की संपति क्रमश: दक्षिणा में दी जाती थी ओर अश्वमेध समाप्त हो जाता था।

पौराणिक काल में इस बात का उल्लेख मिलता है कि अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को सेना के साथ स्वछन्द विचरण करने के लिए छोड़ दिया जाता था और वो जहाँ-जहाँ जाता था वहाँ की भूमि अश्वमेघ यज्ञ करने वाले राजा के अधीन हो जाती थी। अर्थात वहाँ के राजा को या तो अश्वमेघ यज्ञ करने वाले राजा की अधीनता स्वीकार करनी होती थी अथवा उनसे युद्ध करना होता था। यही कारण था कि कोई साधारण राजा अश्वमेघ यज्ञ नहीं कर सकता था। जिस राजा के पास असीम बल होता था, जो सबसे श्रेष्ठ होते थे और जिनका वर्चस्व पूरे आर्यावर्त के राजाओं के ऊपर होता था केवल वही अश्वमेघ यज्ञ करने का साहस कर सकते थे। जो राजा सफलतापूर्वक अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण कर लेता था उसे "चक्रवर्ती सम्राट" की उपाधि मिलती थी। किन्तु इस पदवी को पाने के लिए उन्हें असंख्य युद्ध लड़ने पड़ते थे। श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ का घोडा राजा वीरमणि ने पकड़ लिया था जिस कारण उन्हें स्वयं महादेव से युद्ध लड़ना पड़ा। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

अश्वमेध एक प्रतीकात्मक योग है जिसके प्रत्येक अंश का गूढ़ रहस्य है। ऐतरेय ब्राह्मण में अश्वमेधयागी प्राचीन चक्रवर्ती नरेशों का बड़ा ही महत्वशाली ऐतिहासिक निर्देश है। ऐतिहासिक काल में भी ब्राह्मण राजाओं ने या वैदिकधर्मानुयायी राजाओं ने अश्वमेध का विधान बड़े ही उत्साह के साथ किया। महाराज भरत, दशरथ तथा श्रीराम के अश्वमेध प्राचीन काल में संपन्न हुए कहे जाते हैं। अश्वमेघ यज्ञ करने वाले राजाओं में सबसे बड़ा नाम दुष्यंत पुत्र महाराज भरत का है जिन्होंने १०० यज्ञ यमुना के तट पर, ३०० यज्ञ सरस्वती तट पर एवं ४०० यज्ञ गंगा तट पर किये। इसके अतिरिक्त उन्होंने १००० अश्ववमेघ अन्य स्थानों पर भी किये। इसके साथ उन्होंने १०० राजसु यज्ञ भी किये। उनके अतिरिक्त महाराज दशरथ और श्रीराम के अश्वमेघ यही करने का उल्लेख भी आता है।