8 जनवरी 2010

शकुनि

शकुनि गंधार साम्राज्य का राजा था। यह स्थान आज के अफ़्ग़ानिस्तान में है। वह हस्तिनापुर महाराज और कौरवों के पिता धृतराष्ट्र का साला था, और कौरवों का मामा। दुर्योधन की कुटिल नीतियों के पीछे शकुनि का हाथ माना जाता है, और वह कुरुक्षेत्र के युद्ध के लिए दोषियों में प्रमुख माना जाता है। उसने कई बार पाण्डवों के साथ छ्ल किया और अपने भांजे दुर्योधन को पाण्डवों के प्रति कुटिल चालें चलने के लिए उकसाया।

शकुनि का जन्म गंधार के राजा सुबल के यहाँ हुआ था। शकुनि की बहन गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ था। शकुनि की कुरुवंश के प्रति घृणा का कारण यह था, की हस्तिनापुर के सेनापति भीष्म एक बार धृतराष्ट्र के लिए गांधारी का हाथ माँगने गंधार गए। तब गांधारी के पिता सुबल ने ये बात स्वीकार कर ली, लेकिन उस समय उन्हें ये पता नहीं था की धृतराष्ट्र जन्मांध है। इसका शकुनि ने भी विरोध किया, लेकिन गांधारी अब तक धृतराष्ट्र को अपना पति मान चुकी थी। इसलिए शकुनि ने उस दिन ये प्रण लिया की वह समूचे कुरुवंश के सर्वनाश का कारण बनेगा। कहा जाता है कि वो श्रीराम के छोटे भाई भरत का वंशज था क्यूंकि भरत के वंश को श्रीराम ने गांधार का क्षेत्र दिया था। उसके एक वंशज अम्बी कुमार का वर्णन भी मिलता है जो चन्द्रगुप्त मौर्य का सहपाठी था और उसी के हाँथों सिकंदर के आक्रमण के समय मारा गया था। शकुनि को ही महाभारत का असली कारण माना जाता है क्यूंकि उसी के कहने पर दुर्योधन सदैव अधर्म करने में लगा रहता था। उसी के कहने पर बचपन में दुर्योधन ने भीम को विष दिया, लाक्षागृह की योजना भी उसी की थी, द्यूतसभा में जो हुआ वो सब जानते हैं, अभिमन्यु को छल से मारने का सुझाव भी उसी का था। कर्ण का शकुनि से भारी विरोध था और वो उसकी नीतियों से कभी सहमत नहीं हुआ किन्तु अपने मित्र दुर्योधन के कारण वो चुप रहा। 

हस्तिनापुर राज्य को दो बराबर टुकडो़ में बाँटकर एक भाग, हो की पुर्णतः बंजर था, पाण्डवों को दे दिया गया, जिसे उन्होनें अपने अथक प्रयासों से इंद्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) नामक सुंदर नगरी में परिवर्तित कर दिया। शीघ्र ही वहाँ की भव्यता कि चर्चाएँ दूर-दूर तक होने लगीं। युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ के अवसर पर, दुर्योधन को भी उस भव्य नगरी में जाने का अवसर मिला। वह राजमहल की भव्यता देख रहा था, की एक स्थान पर उसने पानी की तल वाली सजावट को ठोस भूमि समझ लिया और उसमें गिर पडा़। यह देखकर द्रौपदी को हँसी आ गई और उसने मजा़क में कह दिया, "अंधे का पुत्र अंधा"। इसे दुर्योधन ने अपना अपमान समझा और वह हस्तिनापुर लौट आया। अपने भांजे की यह मानसिक स्थिति भाँपकर, शकुनि ने मन में पाण्डवों का राजपाट छिनने का कुटिल विचार आया। उसने पाण्डवों को चौसर के खेल के लिए आमंत्रित किया, और अपनी कुटिल बुद्धि के प्रयोग से युधिष्ठिर को पहले तो छोटे-छोटे दाव लगाने के लिए कहा। जब युधिष्ठिर खेल छोड़ने का मन बनाता तो शकुनि द्वारा कुछ ना कुछ कहकर युधिष्ठिर से कोई ना कोई दाव लगवा लेता। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर एक-एक कर अपनी सभी वस्तुओं को दाव पर लगा कर हारते रहे और अंत में उन्होनें अपने भाईयों और अपनी पत्नी को भी दाव पर लगा दिया और उन्हें भी हार गए और इस प्रकार द्रौपदी का अपमान करके दुर्योधन ने अपना प्रतिशोध ले लिया, और उसी दिन महाभारत के युद्ध की नींव पडी़। कुरुक्षेत्र के युद्ध में शकुनि का वध सहदेव के द्वारा १८ वें दिन के युद्ध में किया गया। उसके सभी भाइयों का वध इरवन और अर्जुन के द्वारा किया गया।

शकुनि अपने काल का सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ था और विदुर के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ज्ञान एवं बुद्धि में वो विदुर से कम नहीं था किन्तु अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए उसने कभी भी अपना ज्ञान धर्म के लिए इस्तेमाल नहीं किया। वो चौसर का भी महान खिलाडी था और चौसर के पाँसे जैसे उसकी इच्छा के दास थे। एक और भी कथा है कि उसके पिता सुबल जब अपनी अंतिम साँसे ले रहे थे तो उन्होंने भी शकुनि को बताया कि उन्हें गांधारी का विवाह मजबूरी में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि मृत्यु के उपरांत शकुनि उनकी रीढ़ की हड्डी से चौसर के पाँसे बना लें ताकि वो उनसे मनचाहा अंक ला सके। इस पाँसों का इस्तेमाल उसने द्यूत भवन में किया और पांडवों को हराया। गांधारी के विवाह के पश्चात शकुनि सदा के लिए हस्तिनापुर में बस गया। उसके दो पुत्र थे - उलूक एवं वृकासुर। उलूक को वो गांधार का कार्यकारी राजा बना कर हस्तिनपुरसे ही गांधार का शासन संभालता था। इतिहास के अनुसार उसके पुत्र उलूक ने सदा उसे गांधार वापस बुलाना चाहा किन्तु असफल रहा। बहुत कम लोगों को ये मालूम होगा कि गांधार राज सुबल के भी १०० पुत्र और एक पुत्री गांधारी थी। शकुनि उनका सबसे छोटा बेटा था और सौंवा पुत्र होने के कारण उसे सौबाला भी कहा जाता था। ठीक उसी प्रकार गांधारी के भी १०० पुत्र और एक पुत्री दुःशला थी। शकुनि और गांधारी सहित उनका पूरा परिवार भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। शकुनि को हमेशा के खलनायक की तरह दिखाया गया है पर उसका अपना तर्क था। उसकी पांडवों से कोई दुश्मनी नहीं थी बल्कि वो भीष्म से बदला लेना चाहता था। आपको जानकर आश्चर्य होगा पर केरल के कोल्लम जिले के पवित्रेश्वरम नामक जगह में शकुनि का एक मंदिर भी है जिसकी देख-रेख कुरावर समुदाय के लोग करते हैं। महाभारत में शकुनि को द्वापरयुग का और दुर्योधन को कलियुग का अवतार माना जाता है।