20 अक्तूबर 2009

पांडवों का दिग्विजय

युधिष्ठिर का राजसू यज्ञ प्रारंभ होने वाला था. राजसू यज्ञ करने से पहले यह जरुरी था कि सारे राजा युधिष्ठिर का आधिपत्य स्वीकार कर ले. जरासंध पहले हीं भीम के हांथों मारा जा चुका था. दिग्विजय के लिए सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम चारो दिशाओं में निकले.

नकुल पश्चिम दिशा में गया तथा रोहितक, मत्त्मयुर, मरुभूमि, शैरिशक, महेत्त, आक्रोश, दशार्ण, शिवी, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंच्कर्पट, माध्यमक, वाटधान, द्विज, पुष्कर, गंधर्व, सिन्धु, शूद्र, अभीर, पंचनद, अमर पर्वत, ज्योतिष, दिव्यकर, समाध, हार, हूण विजित करता हुआ द्वारका पहुंचा जहाँ श्रीकृष्ण ने स्नेह पूर्वक युधिष्ठिर का आधिपत्य स्वीकार किया. इसके बाद नकुल मद्रदेश पहुंचा जहाँ उसके मामा शल्य ने उसका स्वागत किया. उसके बाद वो पल्हव, बर्बर, किरात, यवन तथा शकराज पर अधिकार करता हुआ वापस इन्द्रप्रस्थ पहुंचा.

सहदेव दक्षिण में मथुरा, मतास्यदेश, अधिराज, सुकुमार, सुमित्र, मत्स्य, पटचचार, निशादभूमि, गोसृंग पर्वत, श्रेनिमान, नार्राष्ट्र, कुन्तिभोज, उज्जैन, नाटकीय, हेराम्बक, मरुध, भुज्ग्राम, अबुर्द, वात, पुलिंद, पंड्या, कृष्किन्धा, महिष्मति, त्रिपुर, पौरेश्वर, सुराष्ट्र, भोजकट (रुक्मी), भीष्मक, शुर्पारक, तालाकट, दंडक, निषाद, पुरुषाद, कर्नप्रवार्ण, कालमुख, कोल्लाचल, सुरभिपत्तम, तम्र्द्वीप, रामपर्वत, तिमी, केरल, जयंती, पंषद, कर्हतक, पंड्या, द्रविड़, उन्द, आन्ध्र, तालवन, कलिंग, उष्ट्कर्निक, आर्विपुरी, यवन तथा लंका को जीतता हुआ इन्द्रप्रस्थ पहुंचा.

अर्जुन उत्तर दिशा की ओर गया और उसने अनार्त, कालकूट, कुलिंद, सुमंडल, शकाल्द्वीप, प्रतिविन्द्य पर्वत को जीत लिया. उसके बाद वो प्रागज्योतिषपुर पहुंचा जहाँ महाराज भगदत्त के साथ उसका भीषण युद्घ हुआ. अंत में अर्जुन की वीरता से प्रसन्न होकर भगदत्त सहमत हो गए. फिर वो उलूक, ब्रिहंत, सेनाविंदु, मोदापुर, वामदेव, सुदामा, सुसंकुल, पंचगन, पुख, म्लेच्छ, कश्मीर, लोहित, त्रिगर्त, दारू, कोकनद, अभिसारी, उराभ, बाह्लीक, दरद, कम्बोज, ऋषिक, चित्रकूट, धवलगिरी, किम्प्रुवार्ष, हाटक, मानसरोवर और हरिवर्ष पर अधिकार कर हस्तिनापुर लौटा.

भीमसेन पूर्व दिशा की ओर निकला तथा उन्होंने दशार्न्देश, अश्वमेघ, पुलिन्द्नगर, प्राच्य को सहज ही जीत लिया. आगे बढ़कर उन्होंने चेदिदेश पर आक्रमण किया जहाँ उनका शिशुपाल से घोर युद्घ हुआ. अंत में शिशुपाल हो परस्त कर वो आगे बढा और कुमार्देश, कोसल, मल्लदेश, जलोद्देश, कशी, सुपर्ष, राजेश्वर, क्रथ, मतस्य, मलदेश, वसुभूमि, मदधर, सोम्धेय, वत्स्देश, भार्ग्देश, निषाद, मनिमान, दक्शिन्मल्ल, भोग्वान पर्वत, शर्मक, वाकर्मक, मिथिला, किरात, सुहाय, प्रसुह्य, दंड, दण्डधर, गिरिव्रज, मोदचल, पौन्द्रक, कौशिक, वंगदेश, चंद्रसेन, कर्वाता, ताम्र्लिप्त, म्लेच्छ, और लौहित्य पर अधिकार कर वापस इन्द्रप्रस्थ लौटा.