मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

पुरु वंश का वर्णन

जैसा की हम जानते हैं कि सारी सृष्टी परमपिता ब्रम्हा से उत्पन्न हुई है इसलिए उनके बाद से पुरुवंश की पचास पीढ़ियों का वर्णन इस प्रकार है. आप दिए गए नंबरों से उनकी पीढ़ी का पता लगा सकते है.
१. परमपिता ब्रम्हा से प्रजापति दक्ष हुए.
२. दक्ष से अदिति हुए.
३. अदिति से बिस्ववान हुए.
४. बिस्ववान से मनु हुए जिनके नाम से हम लोग मानव कहलाते हैं. 
५. मनु से इला हुए.
६. इला से पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया.
७. पुरुरवा से आयु हुए.
८. आयु से नहुष हुए  जो इन्द्र के पद पर भी आसीन हुए परन्तु सप्तर्षियों के श्राप के कारण पदच्युत हुए.
९. नहुष के बड़े पुत्र यति थे जो सन्यासी हो गए इसलिए उनके दुसरे पुत्र ययाति राजा हुए. ययाति के पुत्रों से ही समस्त वंश चले. ययाति के पांच पुत्र थे. देवयानी से यदु और तर्वासु तथा शर्मिष्ठा से दृहू, अनु, एवं पुरु. यदु से यादवों का यदुकुल चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया. तर्वासु से मलेछ, दृहू से भोज तथा पुरु से सबसे प्रतापी पुरुवंश चला. अनु का वंश ज्यादा नहीं चला.
१०. पुरु के कौशल्या से जन्मेजय हुए.
११. जन्मेजय के अनंता से प्रचिंवान हुए.
१२. प्रचिंवान के अश्म्की से संयाति हुए.
१३. संयाति के वारंगी से अहंयाति हुए.
१४. अहंयाति के भानुमती से सार्वभौम हुए.
१५. सार्वभौम के सुनंदा से जयत्सेन हुए.
१६. जयत्सेन के सुश्रवा से अवाचीन हुए.
१७. अवाचीन के मर्यादा से अरिह हुए.
१८. अरिह के खल्वंगी से महाभौम हुए.
१९. महाभौम के शुयशा से अनुतनायी हुए.
२०. अनुतनायी के कामा से अक्रोधन हुए.
२१. अक्रोधन के कराम्भा से देवातिथि हुए.
२२. देवातिथि के मर्यादा से अरिह हुए.
२३. अरिह के सुदेवा से ऋक्ष हुए.
२४. ऋक्ष के ज्वाला से मतिनार हुए.
२५. मतिनार के सरस्वती से तंसु हुए.
२६. तंसु के कालिंदी से इलिन हुए.
२७. इलिन के राथान्तरी से दुष्यंत हुए.
२८. दुष्यंत के शकुंतला से भरत हुए जिनके नाम पर हमारा देश भारतवर्ष कहलाता है.
२९. भरत के सुनंदा से भमन्यु हुए.
३०. भमन्यु के विजय से सुहोत्र हुए.
३१. सुहोत्र के सुवर्णा से हस्ती हुए जिनके नाम पर पूरे प्रदेश का नाम हस्तिनापुर पड़ा.
३२. हस्ती के यशोधरा से विकुंठन हुए.
३३. विकुंठन के सुदेवा से अजमीढ़ हुए.
३४. अजमीढ़ से संवरण हुए.
३५. संवरण के तपती से कुरु हुए जिनके नाम से ये वंश कुरुवंश कहलाया.
३६. कुरु के शुभांगी से विदुरथ हुए.
३७. विदुरथ के संप्रिया से अनाश्वा हुए.
३८. अनाश्वा के अमृता से परीक्षित हुए.
३९. परीक्षित के सुयशा से भीमसेन हुए.
४०. भीमसेन के कुमारी से प्रतिश्रावा हुए.
४१. प्रतिश्रावा से प्रतीप हुए.
४२. प्रतीप के सुनंदा से तीन पुत्र देवापि, बाह्लीक एवं शांतनु का जन्म हुआ. देवापि किशोरावस्था में ही सन्यासी हो गए एवं बाह्लीक युवावस्था में अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ने में लग गए इसलिए सबसे छोटे पुत्र शांतनु को गद्दी मिली.
४३. शांतनु कि गंगा से देवव्रत हुए जो आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए. भीष्म का वंश आगे नहीं बढा क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रम्हचारी रहने की प्रतिज्ञा कि थी. शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए. चित्रांगद की मृत्यु युवावस्था में ही हो गयी. विचित्रवीर्य कि दो रानियाँ थी, अम्बिका और अम्बालिका. विचिचित्रवीर्य भी संतान प्राप्ति के पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए, लेकिन महर्षि व्यास कि कृपा से उनका वंश आगे चला.
४४. विचित्रवीर्य के महर्षि व्यास की कृपा से अम्बिका से ध्रितराष्ट्र, अम्बालिका से पांडू तथा अम्बिका की दासी से विदुर का जन्म हुआ.
४५. ध्रितराष्ट्र से दुर्योधन, दुहशासन, इत्यादि १०० पुत्र एवं दुशाला नमक पुत्री हुए.  इनकी एक वैश्य कन्या से युयुत्सु नमक पुत्र भी हुआ जो दुर्योधन से छोटा और दुहशाशन से बड़ा था. इतने पुत्रों के बाद भी इनका वंश आगे नहीं चला क्योंकि इनके समूल वंश का नाश महाभारत के युद्घ में हो गया.  किन्दम ऋषि के श्राप के कारण पांडू संतान उत्पत्ति में असमर्थ थे. उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को दुर्वासा ऋषि के मंत्र से संतान उत्पत्ति की आज्ञा दी. कुंती के धर्मराज से युधिष्ठिर, पवनदेव से भीम और इन्द्रदेव से अर्जुन हुए तथा माद्री के अश्वनीकुमारों से नकुल और सहदेव का जन्म हुआ. इन  पांचो के जन्म में एक एक साल का अंतर था. जिस दिन भीम का जन्म हुआ उसी दिन दुर्योधन का भी जन्म हुआ.
४६. युधिष्ठिर के द्रौपदी से प्रतिविन्ध्य एवं देविका से यौधेय हुए. भीम के द्रौपदी से सुतसोम, जलन्धरा से सवर्ग तथा हिडिम्बा से घतोत्कच हुआ. घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक हुआ. नकुल के द्रौपदी से शतानीक एवं करेनुमती से निरमित्र हुए. सह्देव के द्रौपदी से श्रुतकर्मा तथा विजया से सुहोत्र हुए. इन चारो भाइयों के वंश नहीं चले. अर्जुन के द्रौपदी से श्रुतकीर्ति, सुभद्रा से अभिमन्यु, उलूपी से इलावान, तथा चित्रांगदा से बभ्रुवाहन हुए. इनमे से केवल अभिमन्यु का वंश आगे चला.
४७. अभिमन्यु के उत्तरा से परीक्षित हुए. इन्हें ऋषि के श्रापवश तक्षक ने कटा और ये मृत्यु को प्राप्त हुए.
४८. परीक्षित से जन्मेजय हुए. इन्होने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करवाया जिसमे सर्पों के कई जातियां समाप्त हो गयी, लेकिन तक्षक जीवित बच गया.
४९. जन्मेजय से शतानीक तथा शंकुकर्ण हुए.
५०. शतानीक से अश्वामेघ्दत्त हुए.
    ये संक्षेप में पुरुवंश का वर्णन है.

    12 टिप्‍पणियां:

    1. ..

      मित्र नीलाभ,
      रुचिकर जानकारियाँ संजोई हुई हैं आपने. पसंद आयीं.
      कुछ प्रश्न :
      — क्या कोई शिक्षित पिता या माता अपनी समस्त संतानों का नामकरण बुरे अर्थ देने वाले संज्ञा सूचक शब्दों में करना चाहेगा? यदि नहीं तो अच्छे अर्थ वाले धृतराष्ट्र ने अपनी संतानों का नाम दुर या दुह से क्यों प्रारंभ किया. यह उपसर्ग तो अच्छे-भले शब्दों को बुरा अर्थ दे देता है. युयुत्सु नाम शब्द का अर्थ भी कोई अधिक सुन्दर नहीं है 'लड़ने की इच्छा रखने वाला युयुत्सु कहलाता है'
      — क्या समकालीन लेखक इतिहासकार का उनके प्रति दुराग्रह था?
      फिलहाल इतना ही. आपके द्वारा संग्रहित समस्त आंकड़े कई प्रश्नों को मन में जन्म लेने की तैयारी करवाते हैं.

      ........... आपकी ऐतिहासिक रुचि को नमन करता हूँ.

      ..

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    2. ..

      सत्य अन्वेषक नीलाभ जी,

      मेरे आवासीय क्षेत्र के पास ही एक 'विनोद नगर' है, एक जोशी कोलोनी है, एक चन्द्र विहार है,
      अब विनोद नगर में सबसे पहले आकर बसने वाले कोई विनोद पांडे जी थे, जोशी कोलोनी में कोई 'जोशी बन्धु आकर रहे, वे अन्यों की बनस्पत काफी प्रभावशाली थे. और चन्द्र विहार किसी चंदर गूजर के खेत में बसा हुआ है. उनके नामकरण का आधार तो समझ में आ सकता है.
      अब अपने देश 'भारत' देश की बात करते हैं. यह आर्यावर्त से कब भारत बन गया और कब हिन्दुस्तान कहा जाने लगा. इसी तरह इंडिया के पीछे सत्य खोजा जा सकता है.
      — कुछ कहते हैं कि भारत नाम राम के भाई 'भरत' के नाम पर पड़ा.
      — कुछ कहते हैं कि भारत नाम शकुन्तला पुत्र सर्वदमन 'भरत' के नाम पर पड़ा.
      — कुछ विद्वान् ...... भा (ज्ञान या प्रकाश) + रत (निमग्न या डूबा हुआ) अर्थात ज्ञान-गुरु या प्रकाश-पुंज .... अर्थ करते हैं.
      — दिल्ली जैसे महानगर में एकाधिक इंदिरा के नाम पर 'प्रियदर्शनी विहार, इंदिरा विहार, इंदिरा कोलोनी, इंदिरा बस्ती, इंदिरा मोहल्ला, इंदिरा नगर, इंदिरा पार्क ....... मतलब हर तरह की छोटी-बड़ी पैमाइश का नामकरण हो चुका है, इसी तरह राजीव, सोनिया और राहुल के नाम के साथ रिआया मानसिकता ने नामकरण किये हुए हैं.
      अब आप बताइये हम किसी गाँव या प्रदेश का नामकरण कर देते हैं तो क्या केवल किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम ही कारण रहा होगा. कोई अन्य नहीं हो सकता.
      — यदि दुष्यंत पुत्र 'भरत' के नाम पर ही 'भारत' नाम पड़ा तो बाद में 'अशोक' के नाम पर वह बदल जाना चाहिए था. उसने भी तो अपना साम्राज्य लगभग पूरे प्रायद्वीप में फैला लिया था. कलिंग-विजय को उसने स्वेच्छा से नहीं स्वीकारा यह उसकी हार नहीं कही जा सकती.
      — मुझे लगता है कि आर्यावर्त का नाम 'भारत' ज्ञान-गुरु' की विशेषता के कारण पड़ा. और बाद में भी मुगलों द्वारा पददलित होकर आर्य लोग 'हिन्दू' नाम से पहचाने जाने लगे. उनके घर का नाम स्वभावतः काफिर प्रदेश मतलब 'हिन्दुस्तान' हो गया. यह नाम हमें मजबूरी में स्वीकार करना पड़ा. उसी तरह इंडिया नाम भी कोई ऐतिहासिक गौरव की प्रतीति नहीं कराता. उसे भी हमने 'इंडी'+या मतलब नील की खेती क्षेत्र — बड़े सम्मान से ग्रहण कर लिया है. हमारी घ्राण शक्ति इतनी दुर्बल हो गई है कि हमें उसमें गुलामी की गंध तक नहीं आती.
      — मुझे लगता है कि 'हस्तिनापुर' हो या 'भारतवर्ष' नाम .... व्यक्ति के नाम पर कतई नहीं रखे गये. ये संज्ञा नाम गुणवाची हैं. ये नाम विशेषता को दर्शाते हैं.
      हमारी बाद में सोच हुई है व्यक्ति को प्रधानता देने की. यदि हम व्यक्ति को ही प्रधानता देते होते तो हमारे देश का नाम युगों पहले ही 'राम' के नाम पर रूप ले चुका होता. यह देश प्रारम्भ से गुणों को ही प्राथमिकता देता आया था व्यक्ति की छुद्र महत्वाकांक्षा ने मन में बाद में जगह बनाई.

      ..

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      1. ऐतिहासिक तथ्य है की भरत नामक कबीले के नाम पर उत्तर पश्चिमी क्षेत्र का नाम भारत पड़ा। भरत कबीले का उल्लेख ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में है। इस कबीले की त्रित्सु शाखा के राजा सुदास ने अपने कौशल से अपने कबीले का क्षेत्र सिंधु नदी से पार झेलम की ओर विस्तृत कर लिया था और समस्त आर्य जाति में प्रसिद्ध हो गया था।
        सिंधु नदी को पार कर व्यास तक बढ़ आने वाले सिंकन्दर के यूनानी लेखकों ने सिंधु को अपनी भाषा में इंडस नाम दिया और यह देश उनके लिए होगया इंडिया। (प्लुटार्क, एरियन, स्ट्रेबों, जस्टिन आदि)

        जब बाद में फारस, तुर्की से लोग आए तो फारसी में "स" के स्थान पर हो जाता है "ह" तो बना सिंधु से हिन्दू, यह प्रदेश तब तक सप्त सैन्धव (सात सिंधु नदियों वाला प्रदेश)के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था। अतः सैन्धव हो गया हैंदव और यहाँ के निवासी हिन्दू और हिंदुओं का देश हिंदुस्तान।

        नामकरण में समान्यतः नदियों, पर्वतों या अन्य भौगोलिक पहचान को प्राथमिकता दी जाती थी। बाद में किसी व्यक्ति द्वारा बसाये जाने पर उसी के नाम पर नामकरण कर दिया जाता। जैसे सिकंदरिया नाम के अनेक शहर (alexendriya) सिकंदर ने बसाये।

        इंडिया का नील से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि बात उल्टी है। जो रंग इंडिया में पैदा होता था उसे दरअसल इंडिगो नाम दिया गया। हमारे देश का सबसे पुराना नाम भारतवर्ष ही है। उसके बाद बाहरी लोगों ने हमें इंडिया और हिंदुस्तान दिया।

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      2. अनुपम जी,

        इस अनुपम जानकारी के लिए धन्यवाद।

        नीलाभ

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    3. प्रिय प्रतुल जी,

      भारतीय धर्म और इसके धर्म ग्रन्थ एक सागर के सामान विशाल है. इनकी विशालता कि वजह से आप देखेंगे कि धर्म ग्रन्थ कई जगह परस्पर एक दुसरे का ही विरोध करते हैं. जहाँ तक नामांकरण कि बात है, पहले के युग में नाम पिपासा कुछ ज्यादा ही थी. अगर आप भारत का इतिहास देखें तो आप पाएंगे कि पुराने ज़माने में राजा महाराजा अपने नाम के सिक्के वैगेरह बनवाते थे. मैं समझता हूँ कि अति प्राचीन काल भी इससे अछूता नहीं था. आप ये भी कह सकते हैं कि ये परंपरा पुराने ज़माने से आ रही है. जहाँ तक अशोक और भारत या दुशंत कि बात है इनमे कोई तुलना नहीं है क्योंकि इनके युगों का अंतराल बहुत ज्यादा था. आप आस पास के राजा महाराजों कि तुलना महाभारत या रामायण काल के राजाओं से नहीं कर सकते. अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि धर्म या भगवन जिनकी कथा हम धर्म ग्रंथों में पढ़ते हैं हमारे और आपके विश्वास पर टिकी है क्योंकि उनका कोई प्रमाणिक विवरण नहीं है. अगर आपको विश्वास है तो राम थे और नहीं है तो नहीं थे.

      आपका संस्कृत ब्लॉग देखा.. बेहतरीन है.. लिखते रहिये.

      सधन्यवाद

      नीलाभ

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    4. प्रिय प्रतुल जी,

      बहुत कम लोगों को ये मालुम है कि ध्रितराष्ट्र के सरे पुत्रों के नाम "सु" से थे. दुर्वोधन का नाम वास्तव में सुयोधन था और दुह्शाशन का सुशाशन. इनके बिगड़े हुए नाम इनके घृणित कार्यों कि वजह से है. ये एक तरह से इनकी उपाधि है. कुछ पुत्रों कि गलतियों कि सजा उनके बांकी पुत्रों को भी मिली जो सदाचारी थे. युयुत्सु और विकर्ण इनके उदाहरण हैं.

      सधन्यवाद

      नीलाभ

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    5. आज मैंने भी पढ़ ली है, बेहद अकाम की जानकारी है

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    6. संदीप जी
      अकाम की या काम की?
      नीलाभ

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    7. संदीप जी,
      गलतियाँ सुधरने और उसे अच्छा करने की कला आप भली भांति जानते हैं. आपका ब्लॉग देखा. यात्रा वृतांत बेहतरीन है. मेरे अन्य वेबसाइट पर भी अपनी राय दें. धन्यवाद.
      नीलाभ
      www.itsmycountdown.com | www.nilabh.in

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    8. नीलेश जी एक पोस्ट को पेस्ट कर रहा हूं कृपया मंथन करके इनकी जानकारी दीजिये कि हैहैयवंशिय कौन है कहां से उत्पत्ति हुई। क्या ठठेरा इन्हीं के वंशज हैं?

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