सोमवार, 18 मई 2009

तमसा के तट पर पहुंचना एवं भीलराज गुह से भेंट

प्रजाजनों को रथ के पीछे दौड़ते देखकर राम ने रथ को रुकवाया और उन्हें सम्बोधित करते हुये बोले, "प्रिय अयोध्यावासियों! मैं जानता हूँ कि तुम लोगों का मेरे प्रति अटूट और निश्छल प्रेम है इसीलिये तुम लोग मुझे बार-बार अयोध्या लौट चलने का आग्रह कर रहे हो। मेरे लिये तुम्हारे इस प्रेम को टालना भी अत्यन्त ही कठिन है। किन्तु मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि तुम लोग मेरी विवशता को समझने का प्रयास करो। क्या तुम लोग चाहोगे कि मैं पिता की आज्ञा भंग कर दूँ? और इस प्रकार से पाप का भागी बनूँ? क्योंकि तुम लोग मुझसे वास्तविक स्नेह रखते हो इसलिये तुम लोग कदापि ऐसा नहीं चाहोगे। अतः तुम लोगों के लिये यही उचित है कि मुझे प्रेमपूर्वक वन जाने के लिये विदा करो और भरत को राजा स्वीकार करके उसके निर्देशों का पालन करो।" इस प्रकार राम ने और भी अनेकों प्रकार से नगरवासियों को समझा-बुझा कर सुमन्त से पुनः रथ को आगे बढ़ाने का आग्रह किया।

राम के कथन का प्रभाव प्रजाजनों पर केवल कुछ क्षणों के लिये ही पड़ा और रथ के चलते ही वे फिर से रोते-बिलखते रथ के पीछे चलने लगे। वे राम-लक्ष्मण के प्रेम की डोर में इतना अधिक बँधे थे कि राम के द्वारा दिये गये उपदेशों और निर्देशों को क्रियान्वित करना चाहकर भी विवश होकर बरबस रथ के पीछे चले जा रहे थे। उनका मस्तिष्क उन्हें रोक रहा था, किन्तु हृदय उन्हें बलात् रथ के साथ घसीटे लिये जा रहा था। उनकी भावनाओं के आगे उनकी बुद्धि कुछ भी काम नहीं कर पा रही थी। अपनी बातों का उन पर कुछ भी प्रभाव न पड़ते देख कर राम ने सुमन्त से रथ को और तेज चलाने का आदेश दिया और रथ की गति तेज हो गई। किन्तु भावनाओं में बहते हुये प्रजाजनों की भीड़ फिर भी रथ के पीछे दौड़ी जा रही थी। तमसा नदी के तट पर पहुँचते पहुँचते रथ के अश्व भी क्लांत हो चुके थे तथा उन्हें विश्राम आवश्यकता थी। मन्त्री सुमन्त ने रथ वहीं रोक दिया। राम, सीता और लक्ष्मण तीनों रथ से उतर आये और वे तमसा के तट पर खड़े होकर उसकी लहरों का आनन्द लेने लगे। इतने में ही रोते बिलखते वे सहस्त्रों अयोध्यावासी वहाँ आ पहुँचे जो रथ की गति के साथ न चल पाने के कारण पीछे रह गये थे। उन्होंने चारों ओर से राम, लक्ष्मण तथा सीता को घेर लिया और अनेकों प्रकार के भावुकतापूर्ण तर्क देकर उनसे लौट चलने का अनुरोध करने लगे। उनकी इस दशा को देखकर रामचन्द्र ने उन्हें अनेकों प्रकार से धैर्य बँधाया। फिर उनके कुछ शान्त होने पर रामचन्द्र ने प्रजाजनों से प्रेमपूर्वक आग्रह किया कि वे वापस लौट जावें। राम तथा प्रजाजनों के मध्य संवाद निरंतर चलता रहा और रात्रि हो गई। भूख-प्यास तथा लम्बी यात्रा की थकान से आक्रान्त अयोध्यावासी वहीं वन के वृक्षों के कन्द-मूल-फल खाकर भूमि पर सो गये।

जब ब्राह्म-मुहूर्त में रामचन्द्र की निद्रा टूटी तो वे सोये हुये उन नगरवासियों की ओर देखकर लक्ष्मण से बोले, "भैया! हमारे लिये अब यही उचित है कि हम लोग चुपचाप यहाँ से निकल पड़ें क्योंकि मुझसे इन प्रजाजनों का यह त्यागपूर्ण कष्ट देखा नहीं जाता। अतः हे लक्ष्मण! तुम शीघ्र जाकर तत्काल रथ तैयार करवा लो। इस बात का ध्यान रखना कि किसी प्रकार की आहट न हो वरना ये जाग कर फिर हमारे पीछे पीछे आने लगेंगे।" राम के आदेशानुसार लक्ष्मण ने सुमन्त से आग्रह करके रथ को थोड़ी दूर पर एक निर्जन स्थान में खड़ा करवा दिया। इस प्रकार पुरवासियों को आभास तक नहीं मिला कि कब वे रथ में सवार होकर तपोवन की ओर चल दिये। जब पुरवासियों की निद्रा भंग हुई तो वे सब उन्हें ढूँढने लगे और रथ की लीक के पीछे-पीछे बहुत दूर तक गये। आगे का मार्ग कँकरीला-पथरीला होने के कारण जब रथ के लीक के चिह्न दिखाई देना बन्द हो गया और अनेकों प्रयत्न करने पर भी जब वे रथ के मार्ग का अनुसरण न कर सके तो वे विलाप करते हुये निराश होकर लौट पड़े।

तमसा नदी को पार करने के पश्चात् सुमंत रथ को तीव्र गति से हाँकने लगे। कौशल देश की अंतिम सीमा तक पहुँचते-पहुँचते भगवान भुवन भास्कर उदित हो गये। सीमा पार करते ही राम रथ से नीचे उतरे और अयोध्या की ओर मुख कर श्रद्धापूर्ण वचनों में कहने लगे, "सूर्यकुल के सत्यवादी नरेशों द्वारा स्नेहपूर्वक परिपालित हे अयोध्या नगरी! विवश होकर मुझे तुझसे दीर्घकाल के लिये पृथक होना पड़ रहा है। हे जन्मभूमि! मेरी दृष्टि में तुम सदैव स्वर्ग से भी अधिक श्रद्धेय और पूजनीय रही हो। तुम्हारी सेवा करना मेरे लिये गौरव का विषय होता, किन्तु परिस्थितिवश मुझे आज तुम्हारी सेवा से विमुख होना पड़ रहा है। हे जननी! तुम सदैव मेरे लिये प्रेरणामयी रही हो। तुम्हारी धूलि मुझे चन्दन की भाँति शान्ति देती थी, तुम्हारा जल मेरे लिये अमृतमयी और जीवनदायी था। तुमसे विदा लेते हुये मेरा हृदय भारी हुआ जा रहा है। पिताजी की आज्ञा का पालन करके चौदह वर्ष पश्चात् मैं फिर तुम्हारे दर्शन करूँगा तथा तुम्हारी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करूँगा। तब तक के लिये हे माता! मुझे विदा दो। हे माता! तुम्हें शतशत प्रणाम! कोटि कोटि प्रणाम!!" इतना कह कर राम ने अयोध्या प्रदेश की धूलि को उठाकर मस्तक से लगा लिया। ऐसा करते समय उनके नेत्र अश्रुपूरित हो गये। फिर प्रयास करके उन्होंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया और पुनः रथ पर आसीन हो गये।

रथारूढ़ हो जाने के पश्चात् वे लक्ष्मण एवं सीता को मातृभूमि की गरिमा एवं महत्व के विषय में बताने लगे। द्रुत गति से दौड़ता हुआ रथ निर्मल जल से युक्त वेदश्रुति नामक नदी के तट पर जा पहुँचा। उसके बाद रथ दक्षिण दिशा की ओर चलता हुआ अगस्त्य मुनि के समीप पहुँच गया। कुछ ही दूरी पर विख्यात गोमती नदी प्रवाहित हो रही थी। सरिता के दोनों तटों पर सहस्त्रों गौओं के झुंड हरी-हरी घास चरा करती थीं। गोमती नदी को पार करके वे परम पावन भागीरथी गंगा के तट पर पहुँच गये। उस सुरम्य वातावरण में वे बहुत देर तक चकित से खड़े रहे। उन्होंने देखा दूर-दूर तक हरे भरे खेत नेत्रों को सुख देने वाली हरीतिमा बिखेर रहे हैं। वातावरण अत्यंत सुरम्य है। स्वर्णकलशों से सुशोभित धवल मंदिर भक्ति भावना जागृत कर रहे हैं। आश्रमों में साम गान की ध्वनि गुंजायमान हो रही है। सम्पूर्ण वायुमण्डल हवन कुण्डों से निकलने वाले धुएँ से सुगन्धित हो रहा है। अनन्य काल से ऋषि-मुनियों द्वारा सेवित पवित्र भागीरथी कल-कल नाद के साथ द्रुत गति से प्रवाहित हो रही है। गंगा के जल में हंस, कारण्डव आदि पक्षी विहार करते हुये मधुर स्वर में गा रहे हैं मानों वे गंगा की स्तुति कर रहे हों। त्रयतापहारिणी पुण्यसलिला गंगा के दोनों तटों पर खड़े वृक्ष रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अपने फूलों का अर्ध्य चढ़ाकर गंगा का अभिषेक कर रहे हैं। वे इस मनोमुग्धकारी छवि में लीन हो गये। कुछ देर के पश्चात् राम सुमन्त से बोले, "मन्त्रिवर! आज हम यहीं विश्राम करेंगे। हंगुदी के उस विशाल वृक्ष पर लगे हुये फल कितने सुन्दर तथा आकर्षक हैं। आज हम इन्हीं फलों का आहार करेंगे और रात्रि भी यहीं पर व्यतीत करेंगे।" रामचन्द्र का आदेश पाते ही सुमन्त ने रथ को हंगुदी के वृक्ष के नीचे खड़ा कर दिया और अश्वों को निकट ही हरी-हरी घास चरने के लिये छोड़ दिया।

भीलराज गुह से भेंट: गंगा के इस प्रदेश, जिस पर भीलों का अधिकार था, के राजा का नाम गुह था। गुह एक लोकप्रिय एवं सशक्त शासक होने के साथ ही साथ राम का भक्त भी था। जब उसे ज्ञात हुआ कि राम अपने लघु भ्राता लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ उसके क्षेत्र में आये हुये हैं तो वह अपने मन्त्रियों तथा परिजनों के साथ उनके स्वागत के लिये आ पहुँचा। भीलराज गुह को आते देखकर राम स्वयं आगे बढ़कर उनसे गले मिले। वक्कल धारण किये हुये राम, सीता और लक्ष्मण को देख कर गुह को बड़ा क्षोभ हुआ। उसने राम से विनयपूर्ण तथा आर्त स्वर में कहा, "हे रामचन्द्र! इस प्रदेश को आप अपना ही प्रदेश समझें। आप यहाँ का अधिपति बनकर यहाँ के शासन की बागडोर सँभालें। आपके समान समदर्शी एवं न्यायवेत्ता शासक को पाकर यह प्रदेश धन्य हो जायेगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह सम्पूर्ण भूमि आपकी ही है और हम सब आपके अनन्य सेवक हैं।" इतना कहकर गुहराज ने अपने साथ लाई हुई सामग्री को राम के समक्ष रख दिया और बोला, "हे, स्वामी! आपकी सेवा में यह भक्ष्य, पेय, लेह्य तथा स्वादिष्ट फलों का तुच्छ भेंट प्रस्तुत है। आप कृपा करके इन्हें ग्रहण कीजिये। आप लोगों के विश्राम के लिये सभी प्रकार की व्यवस्था कर दी गई है। अश्वों के लिये दाना-चारा भी तैयार है।"

गुह की प्रेममय वचनों को सुनकर राम बोले, "हे निषादराज! इस प्रदेश के राजा होने के बाद भी आप मेरे स्वागत के लिये पैदल चलकर आये। मैं आपकी जितनी प्रशंसा करूँ, कम है। आपने दर्शन देकर हम लोगों को कृतार्थ कर दिया है।" इस प्रकार निषादराज की प्रशंसा करते हुये राम उन्हें प्रेमपूर्वक अपने पास बिठा लिया और मधुर वाणी में आगे कहने लगे, "भीलराज! आपको सानन्द और सकुशल देखकर मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है। आपके द्वारा लाये गये इन उत्तमोत्तम पदार्थ के लिये मैं आपका अत्यंन्त आभारी हूँ। किन्तु बन्धुवर! खेद के साथ मुझे कहना पड़ रहा है कि मैं इन्हें स्वीकार नहीं कर सकता। ये सारे पदार्थ राजा-महाराजाओं के खाने योग्य हैं किन्तु तपस्वी होने के नाते हमारा भोजन तो केवल कन्द-मूल-फल है। अतः हम इसे ग्रहण नहीं कर सकते। हाँ, अश्वों के लिये आप जो दाना-चारा लाये हैं उन्हें स्वीकार करके मुझे बहुत प्रसन्नता होगी क्योंकि ये मेरे पिताजी के प्रिय अश्व हैं, जिनकी सदैव विशेष देख-भाल की जाती है।" राम की बातें सुनकर गुह ने भीलों को अश्वों के विशेष प्रबन्ध करने के लिये आदेश दे दिया। सन्ध्या होने पर राम, सीता और लक्ष्मण ने गंगा में स्नान किया तथा ईश्वरोपासना के पश्चात् उन्होंने कन्द-मूल-फल का आहार किया। गुहराज उन्हें उस कुटी तक ले गये जहाँ पर उन्होंने उनके विश्राम के लिये अपने हाथों से प्रेमपूर्वक तृण शैयाएँ बनाई थीं। कुटी में पहुँच कर वे बोले, "हे दशरथनन्दन! आप इन शैयाओं पर विश्राम कीजिये। मैं आपका दास हूँ अतः मैं पूर्ण रात्रि जाग कर हिंसक पशुओं से आप लोगों की रक्षा करूँगा आप हमें सबसे अधिक प्रिय हैं। इसलिये आप लोगों की सुरक्षा के लिये रात भर मेरे ये सभी साथी धनुष बाण लेकर तत्पर रहेंगे।"

उनकी बातें सुनकर लक्ष्मण ने कहा, "हे गुहराज! मुझे आपकी शक्ति, निष्ठा और भैया राम के प्रति आपके अनन्य प्रेम पर पूर्ण विश्वास है। निःसन्देह आपके राज्य में हमें किसी प्रकार की विपत्ति की आशंका नहीं हो सकती। किन्तु मैं भैया राम का दास हूँ अतः मैं इनके बराबर में सो नहीं सकता। मैं भी रात भर आपके साथ पहरा देकर अपना कर्तव्य पूरा करूँगा। कुटी के बाहर एक शिला पर बैठकर पहरा देते हुये भीलराज गुह और लक्ष्मण बातें करने लगे। लक्ष्मण ने गुह को अयोध्या में घटित समस्त घटनाओं के विषय में बताया। इस प्रकार वह रात्रि व्यतीत हो गई। राम ने ब्राह्म बेला होते ही शैया का परित्याग कर दिया और लक्ष्मण से कहा, "भैया अब रात्रि अपनी अंतिम अवस्था में है। उषा की लालिमा ने सम्पूर्ण अंबर पर गुलाल बिखेर दिया है। कोयल की कूक सुनाई दे रही है। मोर नृत्य कर रहे हैं। यही वह अवसर है जब कि हमें परम पावन गंगा को पार कर लेना चाहिये।" उनके वचनों को सुनकर लक्ष्मण के साथ खड़े निषादराज ने अपने मन्त्रियों को आदेश दिया कि एक सुन्दर पतवारों वाली द्रुतगामी नौका ले आओ। मैं स्वयं उस नौका को खे कर इन्हें गंगा पार कराउँगा। आज्ञा पाते ही निषादराज के अनुचर तत्काल जाकर उनके लिये एक श्रेष्ठ नौका ले आये। नौका के घाट पर लग जाने पर राम, सीता और लक्ष्मण घाट की ओर चले।

उन्हें घाट की ओर जाते देखकर मन्त्री अश्रुपूरित सुमन्त ने हाथ जोड़ते हुये कहा, "हे रघुकुलशिरोमणि! अब मेरे लिये क्या आज्ञा है?" रामचन्द्र ने उनकी कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा करते एवं धन्यवाद देते हुये कहा, "सुमन्त! अब आपका कार्य पूर्ण हो चुका है अतः अब आप शीघ्र अयोध्या के लिये प्रस्थान करें। गंगा पार करने पश्चात् हम उसके आगे की यात्रा पैदल ही करेंगे। आप अयोध्या जाकर मेरी, सीता और लक्ष्मण की ओर से पिताजी, माताओं एवं अन्य गुरुजनों की चरण वन्दना करें और उन्हें धैर्य दिलाते हुये हमारी ओर से कहें कि हम तीनों में से किसी को भी अपने वनवास का किन्चितमात्र भी दुःख नहीं है। उन्हें मेरा यह संदेश भी दें कि चौदह वर्ष की अवधि समाप्त होने पर मैं, सीता और लक्ष्मण आपके दर्शन करेंगे। आप भाई भरत को कैकेय से शीघ्र बुला लें तथा राज्य सिंहासन सौंप दें ताकि प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट व असुविधा न हो। हे मन्त्रिवर! भरत से भी मेरा यह संदेश देना कि वे सभी माताओं का समान रूप से आदर करें और प्रजाजनों के हितों का सदैव ध्यान रखें।" राम के वचन सुनकर सुमन्त अत्यंत विह्वल हो गये और उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। वे अवरुद्ध कण्ठ से बोले, "हे तात! आपके वियोग में संतप्त होकर तड़पती हुई अयोध्या की प्रजाजनों के सम्मुख मैं कैसे जा सकूँगा? आप लोगों के बिना खाली हाथ लौट आने के विषय में पूछे गये उनके प्रश्नों का मैं क्या उत्तर दूँगा? मैं जानता हूँ कि आपको न पाकर सहस्त्रों अयोध्यावासी शोक से मूर्छित हो जायेंगे। उनकी दशा सेनापति रहित सेना जैसी हो जायेगी। हे स्वामी! अयोध्या से वन के लिये चलते समय जो दशा अयोध्यावासियों की हुई थी वह तो आप देख ही चुके हैं। इस खाली रथ को देख कर उनकी उससे भी सैकड़ों गुणा दुःखदायिनी दशा हो जायेगी। हे प्रभु! मैं माता कौशल्या को कैसे अपना मुख दिखा सकूँगा? आप लोगों के बिना लौटना मेरे लिये बड़ा कठिन है। इसलिये हे नाथ! आप कृपा करके मुझे भी अपने साथ ले चलें।"

सुमन्त के इन दीन किन्तु स्नेहभरे वचनों को सुनकर राम ने प्रेमपूर्वक कहा, "भाई सुमन्त! मै अच्छी तरह से समझता हूँ कि तुम मुझसे बहुत अधिक स्नेह करते हो। किन्तु तुम्हारे न लौटने से माता कैकेयी के मन में शंका उत्पन्न हो जायेगी और वे समझेंगी कि हम लोग षड़यंत्र करके राज्य में ही कहीं छुप गये हैं। इसलिये मेरा तुमसे अनुरोध है कि तुम नगर को लौट जाओं। तुम्हारे लौटने से जहाँ माता कैकेयी की शंका समाप्त हो जायेगी वहीं महाराज तथा मुझ पर किसी प्रकार का कलंक भी नहीं लगेगा। कलंक चाहे झूठा ही क्यों न हो, उसकी प्रतिक्रिया बड़ी व्यापक होती है।" इस प्रकार अनेकों प्रकार से समझा बुझाकर रामचन्द्र ने सुमन्त को विदा किया। सुमन्त अश्रुपूरित नेत्रों से रथ में बैठ कर अयोध्या के लिये चल पड़े। सुमन्त के जाने के पश्चात् राम गुह से बोले, "निषादराज! तुम कृपा करके हमारे लिये बड़ का दूध मँगा दो क्योंकि अब हम वनवासी और तपस्वी हो गये हैं और हमें जटाएँ धारण करके तापस धर्म की मर्यादाओं का पालन करते हुये निर्जन वनों में निवास करना चाहिये।" राम की बात सुन कर गुह स्वयं जाकर बड़ का दूध ले आये जिससे राम, सीता और लक्ष्मण ने जटाएँ बनाईं और नियमपूर्वक तपस्वी धर्म को स्वीकार करते हुये गंगा पार करने को उद्यत हुये। नौका पर सवार होकर तीनों ने पतित-पावनी गंगा को पार किया। गंगा के पार पहुँच जाने पर राम ने गुह को हृदय से लगा लिया। फिर उनके स्नेहपूर्ण आतिथ्य के लिये उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये उन्होंने निषादराज को विदा किया।

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