19 मई 2009

रामायण-20: सीता हरण एवं जटायु वध

लक्ष्मण के जाने के पश्चात् सन्यासी का वेष धारण कर रावण सीता के पास आया और बोला, "हे रूपसी! तुम कोई वन देवी हो या लक्ष्मी अथवा कामदेव की प्रिया स्वयं रति हो? तुम्हारे जैसी रूपवती, लावण्यमयी युवती मैंने आज तक इस संसार में नहीं देखा है। मझे यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि जो सौन्दर्य महलों में होना चाहिये था आज इस वन में कैसे दिखाई दे रहा है। तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? और इस वन में किस लिये निवास कर रही हो?"

रावण के प्रश्न को सुन कर सीता ने कहा, "हे सन्यासी! मैं तुम्हें और तुम्हारे वेश को नमस्कार करती हूँ। आप इस आसन पर बैठ कर यह जल और फल ग्रहण कीजिये। मेरा नाम सीता है। मैं मिथिलानरेश जनक की पुत्री और अयोध्यापति दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र की पत्नी हूँ। पिता की आज्ञा से मेरे पति अपने भाई भरत को अयोध्या का राज्य दे कर चौदह वर्ष के लिये वनवास कर रहे हैं। उन पराक्रमी सत्यपरायण वीर के साथ मेरे तेजस्वी देवर लक्ष्मण भी हैं। आप थोड़ी देर बैठिये, वे अभी आते ही होंगे। अब आप बताइये महात्मन्! आप कौन हैं और इधर किस उद्देश्य से पधारे हैं?" सीता का प्रश्न सुन कर रावण गरज कर बोला, "हे सीता! मैं तीनों लोकों, चौदह भुवनों का विजेता महाप्रतापी लंकापति रावण हूँ जिसके नाम से देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, मुनि सब थर-थर काँपते हैं। इन्द्र, वरुण, कुबेर जैसे देवता जिसकी चाकरी कर के अपने आप को धन्य समझते हैं। मैं तुम्हारे लावण्यमय सौन्दर्य को देख कर अपनी सुन्दर रानियों को भी भूल गया हूँ और मैं तुम्हें ले जा कर अपने रनिवास की शोभा बढ़ाना चाहता हूँ। हे मृगलोचने! तुम मेरे साथ चल कर नाना देशों से आई हुई मेरी अतीव सुन्दर रानियों पर पटरानी बन कर शासन करो। मेरे देश लंका की सुन्दरता को देख कर तुम इस वन के कष्टों को भूल जाओगी। इसलिये मेरे साथ चलने को तैयार हो जाओ।"

रावण का नीचतापूर्ण प्रस्ताव सुन कर सीता क्रुद्ध स्वर में बोली, "हे अधम राक्षस! तुम तेजस्वी, अद्भुत पराक्रमी और महान योद्धा रामचन्द्र के प्रताप को नहीं जानते इसीलिये तुम मेरे सम्मुख यह कुत्सित प्रस्ताव रखने का दुःसाहस कर रहे हो। अरे मूर्ख! क्या तू वनराज सिंह के मुख में से उसके दाँत उखाड़ना चाहता है? क्या तेरे सिर पर काल नाच रहा है जो तू यह घृणित प्रस्ताव ले कर यहाँ आया है? इस विचार को ले कर यहाँ आने से पूर्व तूने यह भी नहीं सोचा कि तू अपने नन्हें से हाथों से सूर्य और चन्द्र को पकड़ कर अपनी मुट्ठी में बन्द करना चाहता है। वास्तव में तेरी मृत्यु तुझे यहाँ ले आई है।" सीता के ये अपमानजनक वाक्य सुन कर रावण के तन बदन में आग लग गई। वह आँखें लाल करते हुये बोला, "सीते! तू मेरे बल और प्रताप को नहीं जानती। मैं आकाश में खड़ा हो कर पृथ्वी को गेंद की भाँति उठा सकता हूँ। अथाह समुद्र को एक चुल्लू में भर कर पी सकता हूँ। मैं तुझे लेने के लिये आया हूँ और ले कर ही जाउँगा।" यह कह कर रावण ने गेरुये वस्त्र उतार कर फेंक दिया और दोनों हाथों से सीता को उठा कर अपने कंधे पर बिठा निकटवर्ती खड़े विमान पर जा सवार हुआ। इस प्रकार अप्रत्यशित रूप से पकड़े जाने पर सीता ने 'हा राम! हा राम!!' कहते हुये स्वयं को रावण के हाथों से छुड़ाने का प्रयास किया। परन्तु बलवान रावण के सामने उनकी एक न चली। उसने उन्हें बाँध कर विमान में एक ओर डाल दिया और तीव्र गति से लंका की ओर चल पड़ा। सीता निरन्तर विलाप किये जा रही थी, "हा राम! पापी रावण मुझे लिये जा रहा है। हे लक्ष्मण! तुम कहाँ हो? तुम्हारी बलवान भुजाएँ इस समय इस दुष्ट से मेरी रक्षा क्यों नहीं करतीं? हाय! आज कैकेयी की मनोकामना पूरी हुई।" इस प्रकार विलाप करती हुई सीता ने मार्ग में खड़े जटायु को देखा। जटायु को देखते ही सीता चिल्लाई, "हे आर्य जटायु! देखो, लंका का यह दुष्ट राजा रावण मेरा अपहरण कर के लिये जा रहा है। आप तो मेरे श्वसुर के मित्र हैं। इस नराधम से मेरी रक्षा करें। यदि आप मुझे इस नीच के फंदे से नहीं छुड़ा सकते तो यह वृतान्त मेरे पति से तो अवश्य ही कह देना।

जटायु वध: सीता का आर्तनाद सुन कर जटायु ने उस ओर देखा तथा रावण को सीता सहित विमान में जाते देख बोले, "अरे ब्राह्मण! तू चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान होते हुये एक पर-स्त्री का अपहरण कर के ले जा रहा है। अरे लंकेश! महाप्रतापी श्री रामचन्द्र जी की यह भार्या है। तुम ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे कर रहे हो? राजा का धर्म तो पर-स्त्री की रक्षा करना है। तुम काम के वशीभूत हो कर अपना विवेक खो बैठे हो। छोड़ दो राम की पत्नी को। हे रावण! यह जानते हुये कि तुम बलवान, युवा तथा शस्त्रधारी हो और मैं दुर्बल, वृद्ध एवं शस्त्रहीन हूँ; फिर भी प्राण रहते मैं सीता की रक्षा करूँगा। तुमने जो यह भीषण अपराध किया है, उससे मैं तुम्हें रोकूँगा। यदि रोक न सका तो या तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा या स्वयं अपने प्राण दे दूँगा। मेरे जीवित रहते तुम सीता को नहीं ले जा सकोगे।" जटायु के इन कठोर अपमानजनक शब्दों को सुन कर रावण उसकी ओर झपटा जो सीता को मुक्त कराने के लिये विमान की ओर तेजी से बढ़ रहा था। वायु से प्रवाहित दो मेघों की भाँति वे एक दूसरे से टकराये। क्रुद्ध जटायु ने मार-मार कर रावण को घायल कर दिया। घायल रावण भी वृद्ध दुर्बल जटायु से अधिक शक्तिशाली था। उसने अवसर पा कर जटायु की दोनों भुजायें काट दीं। पीड़ा से व्याकुल हो कर मूर्छित हो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। जटायु को भूमि पर गिरते देख जानकी भी उसके पीछे भूमि पर गिरी, किन्तु रावण ने फुर्ती से केश पकड़ कर उन्हें भूमि पर गिरने से रोक लिया और "हा राम! हा लक्ष्मण!!" कह कर विलाप करती हुई सीता को विमान में एक ओर पटक दिया। फिर विमान को आकाश में ले जा कर तीव्र गति से लंका की ओर चल पड़ा।

जब उसने देखा कि सीता जोर-जोर से विलाप कर के वनवासियों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो उसने सीता को बलात् खींच कर अपनी गोद में डाल लिया और एक हाथ उनके मुख पर रख कर उनकी वाणी अवरुद्ध करने का प्रयास करने लगा। उस समय उन्नत भालयुक्त, सुन्दर कृष्ण केशों वाली, गौरवर्णा, मृगनयनी जानकी का सुन्दर मुख रावण की गोद में पड़ा ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा नीले बादलों को चीर कर चमक रहा हो। फिर भी सीता का क्रन्दन वन के प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। वन के सिंह, बाघ, मृग आदि रावण से कुपित हो कर उसके विमान के नीचे दौड़ने लगे। पर्वतों से गिरते हुये जल-प्रपात ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों वे भी सीता के दुःख से दुःखी हो कर आर्तनाद करते हुये आँसू बहा रहे हों। श्वेत बादल से आच्छादित सूर्य भी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अपनी कुलवधू की दुर्दशा देख कर उसका मुख श्रीहीन हो गया हो। सब सीता के दुःख से दुःखी हो रहे थे। जब सीता को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब दुष्ट रावण से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है तो वह बड़ी दीनता से परमात्मा से प्रार्थना करने लगी, "हे परमपिता परमात्मा! हे सर्वशक्तिमान! इस समय मेरी रक्षा करने वाला तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है। हे प्रभो! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो! हे दयामय! मेरे सतीत्व की रक्षा करने वाले केवल तुम ही हो।" जब सीता इस प्रकार भगवान से प्रार्थना कर रही थी तो उन्होंने नीचे एक पर्वत पर पाँच वानरों को बैठे देखा। उनको देख कर जानकी ने अनुसूया द्वारा दिये गये परिधान में उन्हीं के द्वारा दिये गये आभूषणों को बाँध कर ऊपर से गिरा दिया। अकस्मात् इस पोटली को गिरते देख वानरों ने ऊपर देखा कि एक विमान तेजी से उड़ता चला जा रहा है और उसमें बैठी कोई स्त्री विलाप कर रही है। वे इस विषय में कुछ और अधिक देख पाते उससे पूर्व विमान नेत्रों से ओझल हो गया। वनों, पर्वतों और सागर को पार करता हुआ रावण सीता सहित लंका में पहुँचा। उसने सीता को मय दानव द्वारा निर्मित सुन्दर महल में रखा। फिर क्रूर राक्षसनियों को बुला कर आज्ञा दी, "कोई भी मेरी आज्ञा के बिना इस स्त्री से मिलने न पावे। यह जो भी वस्त्र, आभूषण, खाद्यपदार्थ माँगे, वह तत्काल इसे दिया जाय। इसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये और न कोई इसका तिरस्कार करे। अवज्ञा करने वालों को दण्ड मिलेगा।" इस प्रकार राक्षसनियों को आदेश दे कर अपने निजी महल में पहुँचा। वहाँ उसने अपने आठ शूरवीर सेनापतियों को बुला कर आज्ञा दी, "तुम लोग जा कर दण्डक वन में रहो। हमारे जनस्थान को राम लक्ष्मण नामक दो तपस्वियों ने उजाड़ दिया है। तुम वहाँ रह कर उनकी गतिविधियों पर दृष्टि रखो और उनकी सूचना मुझे यथाशीघ्र देते रहो। मैं तुम्हें यह अधिकार देता हूँ कि अवसर पा कर उन दोनों की हत्या कर डालो। मैं तुम्हारे पराक्रम से भली-भाँति परिचित हूँ। इसीलिये उन्हें मारने का दायित्व तुम्हें सौंप रहा हूँ।" उन्हें इस प्रकार आदेश दे कर वह कामी राक्षस वासना से पीड़ित हो कर सीता से मिलने के लिये चल पड़ा।

रावण-सीता संवाद: राम के वियोग में आँसू बहाती हुई जानकी के पास जा कर रावण बोला, "हे सुमुखी! अब उस तपस्वी के लिये आँसू बहाने से क्या लाभ? अब तू उसे भूल जा। तू प्रेम भरी दृष्टि से मेरी ओर देख। यह सम्पूर्ण राज्य मैं तुझे अर्पित कर दूँगा। यह राज्य ही नहीं, मैं भी, जो तीनों लोकों का स्वामी हूँ, तेरे चरणों का दास बन कर रहूँगा। मैं तुझे प्राणों से भी बढ़ कर चाहने लगा हूँ। मेरी समस्त सुन्दर रानियाँ तेरी दासी बन कर रहेंगीं। तू केवल मुझे पति रूप में स्वीकार कर ले। मैं आज ही देश भर में तेरे लंका की पटरानी होने की घोषणा करा दूँगा। सारे देव, दानव, नर, किन्नर जो मेरे दास हैं, वे सब तेरे संकेत पर अपने प्राण भी न्यौछावर करने को तैयार हो जायेंगे। तूने जो यह वनवास का कठोर जीवन व्यतीत किया है यह तेरे पूर्वजन्मों का फल था। अब उसकी अवधि समाप्त समझ। मुझसे विवाह करके तीनों लोकों की स्वामिनी बनने के तेरे दिन आ गये हैं। तेरे हाँ कहते ही संसार के सर्वोत्तम दिव्य वस्त्र, आभूषण, भोज्य पदार्थ तेरे सम्मुख उपस्थित कर दिये जायेंगे। तेरे जैसी अनुपम सुन्दरी रोने-बिलखने और कष्ट उठाने के लिये उत्पन्न नहीं हुई है, तू मेरी पटरानी बन कर मेरे साथ पुष्पक विमान में बैठ कर आकाश में विहार कर। यदि तू धर्म और लोकलाज से भयभीत होती है, तो यह तेरा विचार मिथ्या और निर्मूल है। किसी सुन्दरी का युद्ध में हरण कर के उसके साथ विवाह करना भी तो वैदिक रीति का ही एक अंग है। इसलिये तू निःशंक हो कर मेरी बन जा।"

रावण के इन वासनामय शब्दों को सुन कर उसके और अपने मध्य में तृण रख शोक संतप्त सीता बोली, "हे नराधम! परम पराक्रमी, धर्मपरायण एवं सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्री रामचन्द्र जी ही मेरे पति हैं। मैं उनके अतिरिक्त किसी अन्य की ओर दृष्टि तक भी नहीं कर सकती। तेरे अनर्गल प्रलाप से ऐसा प्रतीत होता है कि अब लंका सहित तेरे विनाश का समय आ गया है। तू कायरों की तरह मुझे चुरा कर अब डींगें हाँक रहा है। यदि उनके सम्मुख मेरा अपहरण करने का प्रयास करता तो तेरी भी वही दशा होती जो तेरे भाई खर और दूषण की हुई है। यदि तू उनके सामने पड़ जाता तो उनके बाण तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देते। तू ऐसे भ्रम में मत रह कि जब देवता और राक्षस तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो राम भी तुझे नहीं मार सकेंगे। उनके हाथों से तेरी मृत्यु निश्चित है। अब तेरा जीवनदीप बुझने वाला है। तेरे तेज, बल और बुद्धि तो पहले ही नष्ट हो चुके हैं। और जिसकी बुद्धि नष्ट हो चुकी होती है, उसका विनाश-काल दूर नहीं होता। जो तू मुझसे बार-बार विवाह करने की बात कहता है, तूने एक बार भी सोचा है कि कमलों में विहार करने वाली हंसिनी क्या कभी कुक्कुट के साथ रह सकती है? मैं तुझे सावधान करती हूँ कि तू बार-बार मेरे पति की निन्दा न कर, चाहे मेरे इस क्षणभंगुर शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डाल। मैं तो तेरे जैसे नीच से वार्तालाप करना भी पाप समझती हूँ।"

सीता के कठोर एवं अपमानजनक वाक्य सुन कर रावण कुपित हो कर बोला, "हे सीते! यदि मैं चाहूँ तो अभी तेरा सिर काट कर तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँ। परन्तु मुझे तुझ पर दया आती है। यदि एक वर्ष के अन्दर तूने मुझे पति के रूप में स्वीकार न किया तो मैं तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।" फिर वह राक्षसनियों से बोला, "तुम इसे यहाँ से अशोक वाटिका में ले जा कर रखो और जितना कष्ट दे सकती हो, दो। तुम्हें इसकी पूरी स्वतन्त्रता है।" लंकापति रावण की आज्ञा पाकर राक्षसनियाँ सीता को अशोक वाटिका में ले गईं। अशोक वाटिका एक रमणीय स्थल होते हुये भी सीता के लिये पति वियोग और निशाचरी दुर्व्यवहार के कारण दुःखदायी स्थान बन गया था।