शनिवार, 16 मई 2009

परशुराम जी का आगमन एवं अयोध्या वापसी

जब राजा दशरथ ने सपत्नीक राजकुमारों, मन्त्रियों, ऋषि-महर्षियों एवं परिजनों के साथ अयोध्या के लिये प्रस्थान किया तो उन्हें चारों ओर भयंकर शब्द करने वाले पक्षियों के बोलने की आवाज सुनाई दी। पृथ्वी पर विचरण करने वाले वन्य पशु उनके बाँयें होकर दौड़ने लगे। यह देखकर दशरथ ने वशिष्ठ जी से कहा, "गुरुदेव! यह क्या माया है। पक्षियों का भयंकर स्वर अपशकुन का सूचक है तो मृगादि पशुओं का बाँयें होकर जाना शुभ शकुन की सूचना देता है। ये दोनों प्रकार के शकुन एक साथ क्यों हो रहे हैं?" इसके उत्तर में वशिष्ठ जी बोले, "पक्षियों के भयंकर ध्वनि से ज्ञात होता है कि कोई भयदायक घटना घटने वाली है और मृग आदि पशुओं के इस प्रकार जाने से पता चलता है कि वह भयंकर घटना सरलता से शान्त हो जायेगी। इसलिये आप को किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।"

इस प्रकार का वार्तालाप अभी चल ही रहा था कि बड़े जोरों की आँधी आई जिससे वृक्ष पृथ्वी पर गिरने लगे। तभी राजा दशरथ की दृष्टि भृगुकुल के परशुराम पर पड़ी। उनकी वेशभूषा बड़ी भयंकर थी। तेजस्वी मुख पर बड़ी बड़ी जटाएं बिखरी हुई थीं नेत्रों में क्रोध की लालिमा थी। कन्धे पर कठोर फरसा और हाथों में धनुष बाण थे। ऋषियों ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया और इस स्वागत को स्वीकार करके वे श्री रामचन्द्र से बोले़ "दशरथनन्दन राम! हमें ज्ञात हुआ है कि तुम बड़े पराक्रमी हो और तुमने शिव जी के धनुष को तोड़ डाला है और उसे तोड़कर तुमने अपूर्व ख्याति प्राप्त की है। मैं तुम्हारे लिये एक अच्छा धनुष लाया हूँ। यह धनुष साधारण नहीं है, जमदग्निकुमार परशुराम का है। इस पर बाण चढ़ाकर तुम अपने शौर्य का परिचय दो। तुम्हारे बल और शौर्य को देखकर मैं तुमसे द्वन्द्व युद्ध करूँगा। परशुराम की बात सुनकर राजा दशरथ विनीत स्वर मे बोले, "भगवन्! आप वेदविद् स्वाध्यायी ब्राह्मण हैं। क्षत्रियों का नाश करके आप बहुत पहले ही अपने क्रोध का शमन कर चुके हैं। आपने इन्द्र के सामने प्रतिज्ञा करके अस्त्र-शस्त्र का परित्याग भी कर दिया है। इसलिये हे ऋषिराज! आप इन बालकों को अभय दान दीजिये। यदि आपके हाथों राम मारा बया तो हममें से कोई भी उसके वियोग में जीवित नहीं रह सकेगा।"

परशुराम जी ने दशरथ की अनुनय-विनय पर कोई ध्यान नहीं दिया। वे राम से बोले, "राम! सम्भवतः तुम्हें ज्ञात नहीं होगा कि संसार में केवल दो ही धनुष सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। सारा संसार उनका सम्मान करता हैं विश्वकर्मा ने उन्हें स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनमें से एक को देवताओं ने भगवान शिव को दिया था। इसी धनुष से भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। तुमने उसी धनुष को तोड़ डाला है। दूसरा दिव्य धनुष मेरे हाथ में है। इसे देवताओं ने भगवान विष्णु को दिया था। यह भी पिनाक की भाँति ही शक्तिशाली है। एक बार शिव और विष्णु में भयंकर युद्ध हुआ। विष्णु को देवताओं ने श्रेष्ठ मानकर शान्त किया। विष्णु ने भृगुवंशी ऋचीक मुनि को धरोहर के रूप में वह धनुष दे दिया। वंशानुवंश रूप से यह धनुष मुझे प्राप्त हुआ है। अब तुम एक क्षत्रिय के नाते इस धनुष को लेकर इस पर बाण चढ़ाओ और सफल होने पर मेरे साथ द्वन्द्व युद्ध करो। 

परशुराम के द्वारा बार-बार ललकारे जाने पर रामचन्द्र बोले, "हे भार्गव! मैं ब्राह्मण समझकर आपके सामने विशेष बोल नहीं रहा हूँ। किन्तु आप मेरी इस विनशीलता को परक्रमहीनता एवं कायरता समझकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। लाइये, धनुष बाण मुझे दीजिये।" यह कह कर उन्होंने झपटते हुये परशुराम के हाथ से धनुष बाण ले लिये। फिर धनुष पर बाण चढ़ाकर बोले, "हे भृगुनन्दन! ब्राह्मण होने के कारण आप मेरे पूज्य हैं, इसलिये इस बाण को मैं आपके ऊपर नहीं छोड़ सकता। परन्तु धनुष पर चढ़ने के बाद यह बाण कभी निष्फल नहीं जाता। इसका कहीं न कहीं उपयोग करना ही पड़ता है। इसलिये इस बाण के द्वारा आपकी सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति को नष्ट किये देता हूँ।" श्री राम की यह बात सुनकर शक्तिहीन से हुये परशुराम जी विनयपूर्वक कहने लगे, "बाण छोड़ने से पूर्व मेरी एक बात सुन लीजिये। क्षत्रियों को नष्ट करके जब मैंने यह भूमि कश्यप जी को दान में दी थी तो उन्होंने मुझसे कहा था कि अब तुम्हें पृथ्वी पर नहीं रहना चाहिये क्योंकि तुमने पृथ्वी का दान कर दिया है। तभी से गुरुवर कश्यप जी की आज्ञा का पालन करता हुआ मैं कभी रात्रि में पृथ्वी पर निवास नहीं करता। अतः हे राम! कृपा करके मेरी गमन शक्ति को नष्ट मत करो। मैं मन के सामान गति से महेन्द्र पर्वत पर चला जाउँगा। चूँकि इस बाण का प्रयोग निष्फल नहीं जाता, इसलिये आप उन अनुपम लोकों को नष्ट कर दें जिन पर मेँने अपनी तपस्या से विजय प्राप्त की है। आपने जिस सरलता से इस धनुष पर बाण चढ़ा दिया है, उससे मुझे विश्वास हो गया है कि आप मधु राक्षस का वध करने वाले साक्षत विष्णु हैं।" परशुराम की प्रार्थना को स्वीकार करके राम ने बाण छोड़कर उनके द्वारा तपस्या के बल पर अर्जित किये गये समस्त पुण्यलोकों को नष्ट कर दिया। फिर परशुराम जी तपस्या करने के लिये महेन्द्र पर्वत पर चले गये। वहाँ उपस्थित सभी ऋषि-मुनियों सहित राजा दशरथ ने रामचन्द्र की भूरि भूरि प्रशंसा की।

अयोध्या में आगमन: महाराज दशरथ ने सपत्नीक राजकुमारों, गुरु वशिष्ठ, मन्त्रियों तथा परिजनों के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। प्रस्थान करते ही मन्त्रियों ने शीघ्र ही दो दूतों को सभी के वापस आने की सूचना देने के लिये अयोध्या भेज दिए उन दूतों के द्वारा सूचना मिलने पर नगर के सभी चौराहों, अट्टालिकाओं, मन्दिरों एवं महत्वपूर्ण मार्गों को नाना प्रकार की रंग-बिरंगी ध्वजा-पताकओं से सजाया गया। राजमार्ग पर बड़े सुरम्य द्वार बनाये गये। उन पर तोरण लगाये गये। सड़कों पर केवड़े और गुलाब आदि का जल छिड़का गया। हाट बाजारों को सुन्दर चित्रों, मांगलिक प्रतीकों वन्दनवारों आदि से बड़ी सुरुचि के साथ सजाया गया। सारी अयोध्या में अभूतपूर्व उल्लास छा गया। नाना प्रकार के वाद्य बजने लगे। घर-घर में मंगलगान होने लगे। जब नगरवासियों को ज्ञात हुआ कि बारात लौटकर अयोध्या के निकट पहुँच गई है और नगर के मुख्य द्वार में प्रवेश करने ही वाली है तो सुन्दर, सुकुमार, रूपवती, लावण्मयी कुमारियाँ अनेक रत्नजटित वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर आगन्तुकों का स्वागत करने के लिये आरतियाँ लेकर पहुँच गईं। ज्योंही महाराज दशरथ और राजकुमार स्वर्णिम फूलों से सुसज्जित सोने के हौदे वाले हाथियों पर बैठकर नगर के द्वार में प्रविष्ट हुये, चारों ओर उनकी जयजयकार होने लगी। ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं पर बैठी हुई सुन्दर सौभाग्वती रमणियाँ उन पर पुष्पवर्षा करने लगीं। जनक पुरी की राजकुमारियों और अब अयोध्या की नववधुओं - सीता, उर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति - को देखने के लिये अट्टालिकाओं की खिड़कियाँ और छज्जे दर्शनोत्सुक युवतियों, कुमारियों से ही नहीं प्रौढ़ाओं एवं वृद्धओं से खचाखच भर गये। झाँकी देखने के लिये सभी परस्पर स्पर्द्धा होने लगी।

सवारी के राजप्रसाद में पहुँचने पर समस्त रानियों ने द्वार पर आकर अपनी वधुओं की अगवानी की। महारानी कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा ने आगे बढ़कर बारी-बारी से चारों वधुओं को अपने हृदय से लगा लिया और असंख्य हीरे मोती उन पर न्यौछावर करके उपस्थित याचकों में बाँट दिये। फिर मंगलाचार के गीत गाती हुईं चारों राजकुमाररों और उनकी सहधर्मिणियों को राजप्रासाद के अन्दर ले आईं। महाराज दशरथ ने भी इस अपूर्व आनन्द के अवसर पर दान देने के लिये राजकीय कोष के द्वार खोल दिये और मुक्त हस्त होकर नगरवासी ब्राह्मणों को भूमि, स्वर्ण, रजत, हीरे, मोती, रत्न, गौएँ, वस्त्रादि दान में दिये। जब राजकुमारों को राजप्रासाद में रहते कुछ दिन आनन्दपूर्वक व्यतीत हो गये तो महाराज दशरथ ने भरत को बुलाकर कहा, "वत्स! तुम्हारे मामा युधाजित को आये हुये पर्याप्त समय हो गया है। तुम्हारे नानी-नाना तुम्हें देखने के लिये आकुल हो रहे हैं। अतः तुम कुछ दिनों के लिये अपने नाना के यहाँ चले जाओ।" पिता से आदेश पाकर भरत ने शत्रुघ्न सहित अपनी माताओं तथा राम और लक्ष्मण से विदा लेकर अपने मामा युधाजित के साथ कैकेय देश के लिये प्रस्थान किया। उनके जाने के पश्चात् राम और लक्ष्मण हृदय से अपनी तीनों माताओं और पिता की सेवा करने लगे। सभी उनसे प्रसन्न थे। राम ने अपने सौम्य स्वभाव, दयालुता और सदाचरण से अपने प्रासाद के निवासियों का ही नहीं, समस्त पुर के स्त्री-पुरुषों का हृदय जीत लिया था। वे सबकी आँखों के तारे बन गये थे तथा अत्यंत लोकप्रिय हो गये थे। परिवार के सदस्य उनकी विनयशीलता, मन्त्रीगण उनकी नीतिनिपुणता, नगरनिवासी उनके शील-स्वाभाव और सेवकगण उनकी उदारता का बखान करते नहीं थकते थे। सीता के मधुभाषी स्वभाव, सास-ससुर की सेवा, पातिव्रत्य धर्म आदि सद्गुणों ने सभी लोगों के हृदय को मोह लिया। नगर निवासी राम और सीता की युगल जोड़ी को देखकर फूले नहीं समाते थे। घर-घर में उनके प्रेम और सद्व्यवहार की उदाहरण के रूप में चर्चा की जाती थी।

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