बुधवार, 20 मई 2009

हनुमान से भेंट एवं राम-सुग्रीव मित्रता

पम्पा सरोवर पर पहुँचने के पश्चात् वहाँ के रमणीय दृश्यों को देख कर राम को फिर सीता का स्मरण हो आया और वे उसके वियोग में विलाप करते हुये लक्ष्मण से कहने लगे, "हे सौमित्र! पम्पा का जल मूँगे जैसा निर्मल है। इसके बीच बीच में खिले हुये कमल पुष्प और क्रीड़ा करते हुये जल पक्षी कितने मनोहारी प्रतीत होते हैं। यदि आज सीता भी अपने साथ होती तो इस दृश्य को देख कर उसका हृदय कितना प्रफुल्लित होता। इस पर चैत्र के मधुमास ने मेरे वियोग-विदग्ध हृदय को कितना दुखी कर दिया है, यह मैं ही जानता हूँ। हा सीता! मैं इस प्राकृतिक छटा का आनन्द ले रहा हूँ और तुम न जाने किस दशा में रो-रो कर अपना समय बिता रही होगी। मैं कितना अभागा हूँ कि तुम्हें अपने साथ वन में ले आया, परन्तु तुम्हारी रक्षा न कर सका। हा! पर्वत-शिखरों पर नृत्य करते हुये मोरों के साथ कामातुर हुई मोरनियाँ कैसा नृत्य कर रहीं हैं। यदि आज तुम मेरे पास होती तो तुम भी इसी प्रकार नृत्य और क्रीड़ा करके अपने हृदय का उल्लास प्रकट करती। हे लक्ष्मण! जिस स्थान पर सीता होगी, यदि वहाँ भी इसी प्रकार वसन्त खिला होगा तो वह उसके विरह-विदग्ध हृदय को कितनी पीड़ा पहुँचा रहा होगा। वह अवश्य ही मेरे वियोग में रो-रो कर पागल हुई जा रही होगी। मैं जानता हूँ, वह मेरे बिना पानी से बाहर निकली हुई मछली की भाँति तड़प रही होगी। उसकी वही दशा हो रही होगी जो आज मेरी हो रही है, अपितु मुझसे अधिक ही होगी क्योंकि स्त्रियाँ पुरुषों से अधिक भावुक और कोमल होती हैं। यह सम्पूर्ण दृश्य इतना मनोरम है कि यदि सीता मेरे साथ होती तो इस स्थान को छोड़ कर मैं कभी अयोध्या न जाता। सदैव उसके साथ यहीं रमण करता। किन्तु वह तो केवल स्वप्न है। आज तो यह अभागा प्यारी सीता के वियोग में वनों में मारा-मारा फिर रहा है। जिस सीता ने मेरे लिये महलों के सुखों का परित्याग किया, मैं उसकी वन में रक्षा नहीं कर सका। मैं कैसे यह जीवन धारण करूँ? मैं अयोध्या जा कर किसी को क्या बताउँगा? माता कौशल्या को क्या उत्तर दूँगा? मुझे कुछ सुझाई नहीं देता। मैं इस विपत्ति के पहाड़ के नीचे दबा जा रहा हूँ। मुझे इस विपत्ति से छुटकारे का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। मैं यहीं पम्पासर में डूब कर अपने प्राण दे दूँगा। भैया लक्ष्मण! तुम अभी अयोध्या लौट जाओ। वहाँ जा कर सब माताओं और भरत से कह देना कि राम आत्महत्या कर के मर गया। वह सीता के वियोग के दुःख को न सह सका।" यह कहते हुये राम बहुत व्याकुल होकर मूर्छित हो गये। 

बड़े भाई की यह दशा देख कर लक्ष्मण ने उन्हें अपनी गोद में लिटा लिया और उनकी मूर्छा को दूर करने का प्रयत्न करने लगे। जब राम कुछ चैतन्य हुये तो नेत्रों में आँसू भर कर लक्ष्मण बोले, "हे भैया! आप शोक न करें और विश्वास रखें कि रावण तीनों लोकों में कहीं भी चला जाय, हम अवश्य उसे मार कर जनकनन्दिनी का उद्धार करेंगे, आप तो अत्यन्त धैर्यवान पुरुष हैं। आपको ऐसी विपत्ति में सदैव धैर्य रखना चाहिये। हम लोग अपने धैर्य, उत्साह और पुरुषार्थ के बल पर ही रावण को परास्त कर के सीता को मुक्त करा सकेंगे। आप धैर्य रखें" लक्ष्मण के उत्साहवर्धक वचनों ने राम को फिर उत्साहित किया। वे उठ कर खड़े हुये और आगे चले। चलते-चलते जब वे ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुँचे तो अपने साथियों के साथ उस पर्वत पर बैठे हुये सुग्रीव ने इन दोनों तेजस्वी युवकों को देखा। इन्हें देख कर सुग्रीव के मन में शंका हुई कि सम्भवतः बालि ने इन दोनों धनुर्धारी वीरों को उसके विरुद्ध युद्ध करने के लिये भेजा हो। सुग्रीव को इस प्रकार चिन्तित देख कर हनुमान बोले, "हे वानराधिपते! आप सहसा ऐसे चिन्तित क्यों हो गये?" हनुमान के प्रश्न को सुन कर सुग्रीव बोले, "मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोनों पुरुष बालि के भेजे हये गुप्तचर हैं और तपस्वियों का भेष धारण कर के हमारी खोज में आये हैं। हमें इन दोनों का उचित प्रबन्ध करना चाहिये अन्यथा हम सब बालि के हाथों मारे जायेंगे।" सुग्रीव के मुख से ये आशंका भरे शब्द सुन कर हनुमान बोले, "हे राजन्! मुझे आपकी आशंका के पीछे कोई बल नहीं दिखाई देता। फिर भी आपको धैर्यपूर्वक इस विषय में विचार करना चाहिये। कोई भी राजा अधीर हो कर संकट से बचने का न तो कोई उपाय ही सोच पाता है और न उससे मुक्ति पा सकता है।" फिर भी अपने विचार पर दृढ़ रहते हुये सुग्रीव ने कहा, "हनुमान! चाहे तुम कुछ भी कहो, मेरा अनुमान यही है कि ये दोनों बालि के भेजे हुये गुप्तचर ही हैं। इसलिये हमें इनकी ओर से निश्चिन्त नहीं होना चाहिये। तुम वेष बदल कर इनके पास जाओ और इनका सम्पूर्ण भेद ज्ञात करो। यदि मेरा सन्देह ठीक हो तो शीघ्र इस विषय में कुछ करना।" सुग्रीव का निर्देश पा कर हनुमान तपस्वी का भेष धारण कर राम-लक्ष्मण के पास पहुँचे। उन दोनों को प्रणाम करके वे अत्यन्त विनीत एवं मृदु वाणी में बोले, "हे वीरों! आप दोनों पराक्रमी एवं देवताओं के समान प्रभावशाली दिखाई देते हैं। आप लोग इस वन्य प्रदेश में किसलिये भ्रमण कर रहे हैं? आपकी आजानुभुजाओं और वीर वेश को देखते हुये ऐसा प्रतीत होता है कि आप इन्द्र को भी परास्त करने की क्षमता रखते हैं, परन्तु फिर भी आपका मुखमण्डल कुम्हलाया हुआ है और आप ठण्डी साँसे भर रहे हैं। इसका क्या कारण है? कृपया आप अपना परिचय दीजिये। आप इस प्रकार मौन क्यों हैं? यहाँ पर्वत पर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव रहते हैं जिनके बड़े भाई बालि ने उन्हें घर से निकाल दिया है। उन्हीं की आज्ञा से मैं आपका परिचय प्राप्त करने के लिये यहाँ आया हूँ। मेरा नाम हनुमान है। मैं भी वानर जाति का हूँ। अब आप कृपया अपना परिचय दीजिये। मैं सुग्रीव का मन्त्री हूँ और इच्छानुकूल वेष बदलने की क्षमता रखता हूँ। मैंने आपको सब कुछ बता दिया है। आशा है आप भी अपना परिचय दे कर मुझे कृतार्थ करेंगे और वन में पधारने का कारण बतायेंगे।"

हनुमान की चतुराई भरी स्पष्ट बातों को सुन कर रामचन्द्र लक्ष्मण से बोले, "हे सौमित्र! इनकी बातों से मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि ये महामनस्वी वानरराज सुग्रीव के सचिव हैं और उन्हीं के हित के लिये यहाँ आये हैं। इसलिये तुम निर्भय हो कर इन्हें सब कुछ बता दो।" इस प्रकार राम की आज्ञा पा कर लक्ष्मण हनुमान से बोले, "हे वानरश्रेष्ठ! सुग्रीव के गुणों से हम परिचित हो चुके हैं। हम उन्हीं से मिलने के लिये उन्हें खोजते हुये यहाँ तक आये हैं। आप सुग्रीव के कथनानुसार जाकर मैत्री की बात चला रहे हैं वह हमें स्वीकार है। जहाँ तक हमारे परिचय का प्रश्न है, हम अयोध्यापति महाराज दशरथ के पुत्र हैं। ये श्री रामचन्द्र जी उनके ज्येष्ठ पुत्र और मैं इनका छोटा भाई लक्ष्मण हूँ। चौदह वर्ष का वनवास पाकर ये वन में रहने के लिये अपनी धर्मपत्नी सीता और मेरे साथ आये थे। रावण ने सीता जी का हरण कर लिया है। इसी विचार से हम लोग महाराज सुग्रीव के पास आये हैं। सम्भव है, वे हमारी कुछ सहायता कर सकें। हे वानरराज! जिस चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के चरणों में सम्पूर्ण भूमण्डल के राजा-महाराजा सिर झुकाते थे और उनके शरणागत होते थे, उन्हीं महाराज के ज्येष्ठ पुत्र आज समय के फेर से सुग्रीव की शरण में आये हैं। ताकि महाराज सुग्रीव अपने दलबल सहित इनकी सहायता करें।" इतना कहते हुये लक्ष्मण का कण्ठ अवरुद्ध हो गया और वे अधिक न बोल सके। लक्ष्मण के वचन सुन कर हनुमान बोले, "हे लक्ष्मण! आप लोगो के आगमन से आज हमारा देश पवित्र हुआ। हम लोग आपके दर्शनों से कृतार्थ हुये। जिस प्रकार आप लोग विपत्ति में हैं, उसी प्रकार सुग्रीव पर भी विपत्ति की घटाएँ छाई हुईं हैं। बालि ने उनकी पत्नी का हरण कर लिया है तथा उन्हें राज्य से निकाल दिया है। इसीलिये वे इस पर्वत पर निर्जन स्थान में निवास करते हैं। फिर भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि वे सब प्रकार से आपकी सहायता करेंगे।" इतना कह कर हनुमान बड़े आदर से रामचन्द्र और लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले गये।

राम-सुग्रीव मैत्री: सुग्रीव के पास जा कर हनुमान ने दोनों भाइयों का परिचय कराते हुये कहा, "हे वानराधिपति! अयोध्या के महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र जी अपने अनुज लक्ष्मण जी के साथ आप ही के दर्शनों के लिये पधारे हैं। जब ये पंचवटी में निवास करते थे तो इनकी पत्नी सीता जी को लंका का राजा रावण चुरा ले गया। ये उन्हीं को वन-वन में खोजते फिर रहे हैं। अब ये आपके पास मित्रता करने के लिये आये हैं। आपको इनकी मित्रता स्वीकार कर लेनी चाहिये क्योंकि ये बड़े गुणवान, पराक्रमी और धर्मात्मा हैं। इनकी मित्रता आपके लिये लाभदायक होगी। आप परस्पर एक दूसरे की सहायता कर सकते हैं।" हनुमान से उनका इस प्रकार परिचय पाकर सुग्रीव ने प्रसन्न हो कर कहा, "हे रघुकुलशिरोमणि! आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हुआ। हम दोनों मिल कर परस्पर एक दूसरे का दुःख दूर करने का प्रयास करेंगे। आइये, हम दोनों अग्नि को साक्षी दे कर प्रतिज्ञा करें कि हम दुःख-सुख में एक दूसरे की सहायता करेंगे। हमारी मैत्री अटूट रहेगी।" सुग्रीव का संकेत पा कर हनुमान ने अग्नि प्रज्वलित की। राम और सुग्रीव ने अग्नि की साक्षी दे कर मैत्री की शपथ ली और दोनों बड़े प्रेम से एक दूसरे के गले मिले।

इसके पश्चात् सुग्रीव ने रामचन्द्र जी और लक्ष्मण का यथोचित सत्कार किया और वे अपने-अपने आसनों पर बैठ कर परस्पर वार्तालाप करने लगे। सुग्रीव ने कहा, "हे राघव! इस समय मैं बड़े अपमान के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मेरे ज्येष्ठ भ्राता बालि ने मेरी पत्नी का अपहरण कर लिया है और मेरा राज्य भी मुझसे छीन लिया है। वह मुझसे बहुत अधिक शक्तिशाली है। इसलिये मैं उससे भयभीत हो कर ऋष्यमूक पर्वत के इस मलयगिरि प्रखण्ड में निवास कर रहा हूँ। आप अत्यन्त पराक्रमी और तेजस्वी हैं। इसलिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, आप कृपा कर के बालि के हाथों से मेरी रक्षा करें।" सुग्रीव के दीन वचन सुन कर राम बोले, "हे सुग्रीव! जब हम तुम मित्र बन ही गये हैं तो तुम्हारा दुःख मेरा दुःख है। मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से अवश्य उसका वध करूँगा। छोटे भाई की पत्नी तो अपनी कन्या के समान होती है, उसका अपहरण कर के उस दुष्ट ने स्वयं को लोक और परलोक दोनों में ही निन्दनीय बना लिया है। अब तुम उसे मरा ही समझो। मैं आज अग्नि के सम्मुख प्रतिज्ञा करता हूँ कि बालि का वध कर के तुम्हें अवश्य राजा बनाउँगा। तुम मेरी इस प्रतिज्ञा को अटल समझो।"

जब राम ने इस प्रकार प्रतिज्ञा की तो सुग्रीव ने सन्तुष्ट हो कर कहा, "हे राम! मैं हनुमान के मुख से तुम्हारी विपत्ति की सम्पूर्ण कथा सुन चुका हूँ। सीता आकाश, पाताल या पृथ्वी पर कहीं भी हो, मैं अवश्य उसका पता लगवाउँगा। रावण तो क्या, इन्द्र आदि देवता भी सीता को मेरे वानरों की दृष्टि से छिपा कर नहीं रख सकते। हाँ, राघव! मुझे याद आया, कुछ ही दिनों पूर्व एक राक्षस एक स्त्री को विमान में उड़ा कर ले जा रहा था। उस समय हम इसी पर्वत पर बैठे थे। तब हमने उस स्त्री के मुख से 'हा राम! हा लक्ष्मण!' शब्द सुने थे। सम्भव है वह सीता ही हो। उसे मैं भली-भाँति देख नहीं पाया। हमें बैठे देख कर उसने कुछ वस्त्राभूषण नीचे फेंके थे। वे हमारे पास सुरक्षित रखे हैं। आप उन्हें पहचान कर देखिये, क्या वे सीता जी के ही है।" यह कह कर सुग्रीव ने एक वानर को वस्त्राभूषणों को लाने की आज्ञा दी। उन वस्त्राभूषणों को देखते ही राम का धीरज जाता रहा। वे नेत्रों से अश्रु बहाते, उन वस्त्रों को हृदय से लगा कर मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़े। चेतना लौटने पर वे कुछ देर तक गहरी-गहरी साँसें लेते रहे। फिर लक्ष्मण से बोले, "हे लक्ष्मण! सीता के इन आभूषणों को तुम ही पहचानो। मेरी तो बुद्धि इस समय ठिकाने नहीं है। तुम ही मेरी सहायता करो।" इस पर लक्ष्मण ने कहा, "भैया! इन आभूषणों में से न तो मैं हाथों के कंकणों को पहचानता हूँ, न गले के हार को और न ही मस्तक के किसी अन्य आभूषणों को पहचानता हूँ। क्योंकि मैंने आज तक सीता जी के हाथों और मुख की ओर कभी दृष्टि नहीं डाली। हाँ, उनके चरणों की नित्य वन्दना करता रहा हूँ इसलिये इन नूपुरों को अवश्य पहचानता हूँ, ये वास्तव में उन्हीं के हैं।"

फिर राम ने सुग्रीव से कहा, "हे सूर्यपुत्र सुग्रीव! तुम उस राक्षस का पता लगा कर शीघ्र बताओ, मैं आज ही उसका वध कर के सीता को मुक्त कराउँगा।" राम को सीता के वियोग में इस प्रकार दुःखी देख सुग्रीव ने उन्हें आश्वासन दिया, "हे राघव! यद्यपि मैं रावण की शक्ति और ठिकाने से परिचित नहीं हूँ फिर भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं शीघ्र ही उसका पता लगवा कर सीता जी को उसके चंगुल से छुड़ाने का प्रयत्न करूँगा। आप धैर्य रखें। विपत्ति किस पर नहीं आती, परन्तु बुद्धिमान लोग उसे धैर्य के साथ सहते हैं और मूर्ख लोग व्यर्थ का शोक करते हैं। आप तो स्वयं विद्वान और विवेकशील हैं। इस विषय में इससे अधिक मैं आपसे क्या कहूँ।" सुग्रीव की बात सुन कर राम बोले, "हे वानरेश! तुम ठीक कहते हो। मैं भावुकता में बह गया था। तुम्हारे जैसे स्नेहमय मित्र बहुत कम मिलते हैं। तुम सीता का पता लगाने में मेरी सहायता करो और मैं तुम्हारे सामने ही दुष्ट बालि का वध करूँगा। तुम विश्वास करो, बालि मेरे हाथों से नहीं बच सकता। उसके विषय में तुम मुझे सारी बातें बताओ।" राम की प्रतिज्ञा से सन्तुष्ट हो कर सुग्रीव बोले, "हे रघुकुलमणि! बालि ने मेरा राज्य छीन कर मेरी प्यारी पत्नी भी मुझसे छीन ली है। अब वह दिन रात मुझे मारने का उपाय सोचा करता है। उससे भयभीत हो कर मैं इस पर्वत पर निवास करता हूँ। उसके भय से मेरे सब साथी एक एक-करके मेरा साथ छोड़ गये हैं। अब ये केवल चार मित्र मेरे साथ रह गये हैं। बालि बड़ा बलवान है। उसके भय से मेरे प्राण सूखे जा रहे हैं। बह इतना बलवान है कि उसने दुंदुभि नामक बलिष्ठ राक्षस को देखते देखते मार डाला। जब वह साल के वृक्ष को अपनी भुजाओं में भर कर झकझोरता है तो उसके सारे पत्ते झड़ जाते हैं। उसके असाधारण बल को देख कर मुझे विश्वास नहीं होता कि आप उसे मार सकेंगे।" सुग्रीव की आशंका को सुन कर लक्ष्मण ने हँसते हुये कहा, "हे सुग्रीव! तुम्हें इस बात का विश्वास कैसे होगा कि श्री रामचन्द्र जी बालि को मार सकेंगे?" यह सुन कर सुग्रीव बोला, " सामने जो साल के सात वृक्ष खड़े हैं उन सातों को एक-एक करके बालि ने बींधा हे, यदि राम इनमें से एक को भी बींध दें तो मुझे आशा बँध जायेगी। मैं उनके बल पर अविश्वास कर के ऐसा नहीं कह रहा, केवल बालि से भयभीत होने से कह रहा हूँ।" सुग्रीव के ऐसा कहने पर राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और बाण छोड़ दिया, जिसने भीषण टंकार करते हुये एक साथ सातों साल वृक्षों को और पर्वत शिखर को भी बींध डाला। राम के इस पराक्रम को देख कर बालि विस्मित रह गया और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगा और बोला, "प्रभो! बालि को मार कर आप मुझे अवश्य ही निश्चिन्त कर दे।"

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