18 मई 2009

रामायण-15: भरत मिलाप एवं विराध वध

इधर चित्रकूट पर्वत पर निवास करते हुये राम सीता को घूम-घूम कर उस स्थान की दर्शनीय प्राकृतिक शोभा के दर्शन कराने लगे। सीता अनेक प्रकार की बोली बोलने वाले पक्षियों, रंग-बिरंगी पर्वत शिखरों, नाना प्रकार के फलों से लदे हुये दृष्यों को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। एक दिन जब वे इसी प्रकार प्राकृतिक छटा का आनन्द ले रहे थे तो सहसा राम ने चतुरंगिणी सेना का कोलाहल और वन्य पशुओं के इधर-उधर भागने का शब्द सुना। यह देखकर राम लक्ष्मण से बोले, "हे सौमित्र! इस कोलाहल को सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि कोई राजा या राजकुमार वन में पशुओं का आखेट करने के लिये आया है। हे वीर! तुम जाकर इसका पता लगओ।" राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण तत्काल एक ऊँचे साल वृक्ष पर चढ़कर इधर-उधर दृष्टि दौड़ाने लगे। उन्होंने देखा, उत्तर दिशा से एक विशाल सेना हाथी घोड़ों और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित सैनिकों के साथ चली आ रही है। आगे-आगे अयोध्या की पताका लहरा रही थी। लक्ष्मण तत्काल समझ गये कि वह अयोध्या की सेना है।

राम के पास आकर लक्ष्मण क्रोध से काँपते हुये बोले, "भैया! कैकेयी का पुत्र भरत सेना लेकर इसलिये चला आ रहा है कि हमें वन में अकेला पाकर हम लोगो को समाप्त कर दे और फिर निष्कंटक होकर अयोध्या का राज्य करे। आज मैं इस षड़यन्त्रकारी भरत से भली-भाँति समझूँगा। आज मैं भरत को उसके पापों का फल चखाउँगा। आओ भैया, कवचों से सुसज्जित होकर पर्वत की चोटी पर चलें।" लक्ष्मण के क्रुद्ध वचन सुन कर राम बोले, "भैया! तुम कैसी बातें करते हो? जब प्राणों से प्यारा भरत यहाँ आ रहा है तो धनुष तान कर खड़े होने की क्या आवश्यकता है? क्या भाई का स्वागत अस्त्र-शस्त्रों से किया जाता है? वह मुझसे युद्ध करने नहीं मुझे अयोध्या लौटा ले जाने के लिये आया होगा। भरत में और मुझमे कोई भेद नहीं है। इसलिये तुमने जो कठोर शब्द भरत के लिये कहे हैं, वे वास्तव में मेरे लिये कहे हैं। स्मरण रखो, चाहे कुछ भी हो जाय, कभी पुत्र पिता के और भाई-भाई के प्राण नहीं लेता।" राम के भर्त्सना भरे शब्द सुनकर लक्ष्मण बोले, "हे प्रभो! सेना में पिताजी का श्वेत छत्र न देखकर ही मुझे यह आशंका हुई थी। इसके लिये मुझे क्षमा करें।" उधर भरत पर्वत के निकट अपनी सेना को छोड़कर शत्रुघ्न के साथ राम की कुटिया की ओर चले। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने देखा, यज्ञवेदी के पास मृगछाला पर जटाधारी राम वक्कल धारण किये बैठे हैं। वे दौड़कर रोते हुये राम के पास पहुँचे। उनके मुख से केवल 'आर्य' शब्द निकल सका और वे राम के चरणों में गिर पड़े। शत्रुघ्न की भी यही दशा हुई। राम ने रोते हुये भाइयों को पृथ्वी से उठाकर हृदय से लगा लिया और पूछा, "भैया! पिताजी तथा माताएँ कुशल से हैं न? तुम कुलगुरु वशिष्ठ की पूजा तो करते हो न? तुमने राजसी वेष त्यागकर तपस्वियों जैसा बाना क्यों धारण कर रखा है?"

रामचन्द्र के वचन सुनकर रोते हुये भरत बोले, "भैया! हमारे परम तेजस्वी धर्मपरायण पिताजी स्वर्ग सिधार गये। मेरे दुष्टा माता ने जो पाप किया है, उसके कारण मैं किसी को अपना मुख नहीं दिखा सकता। अब मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप अयोध्या का राज्य सँभाल कर मेरा उद्धार कीजिये। सम्पूर्ण मन्त्रिमण्डल, तीनों माताएँ, गुरु वशिष्ठ आदि सब यही प्रार्थना लेकर आपके पासे आये हैं। मैं आपका छोटा भाई हूँ, पुत्र के समान हूँ, माता के द्वारा मुझ पर लगाये गये कलंक को धोकर मेरी रक्षा करें।" इतना कहकर भरत रोते हुये फिर राम के चरणों पर गिर गये और अयोध्या लौटने के लिये अनुनय विनय करने लगे। राम ने भरत को हृदय से लगाकर समझाते हुये कहा, "भैया भरत! तुम तो स्वयं नीतिवान हो। सोचो, क्या मेरे जैसे सत्यपरायण व्यक्ति के लिये राज्य के निमित्त पिता के वचनों को भंग कर धर्म से पतित होना उचित है? तुम्हारे अन्दर तो मैं कोई दोष नहीं देखता। फिर तुम दुःखी और लज्जित क्यों होते हो? और जहाँ तक माता कैकेयी का प्रश्न है, उनकी निन्दा करना भी उचित नहीं है क्योंकि उन्होंने जो वर माँगे थे वे पिताजी की अनुमति से ही माँगे थे। मैं माता कैकेयी का उतना ही सम्मान करता हूँ जितना माता कौशल्या का। फिर मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकता हूँ। वे अपने हाथों से तुम्हें राज्य दे गये हैं, इसलिये उसे ग्रहण करना तुम्हारा धर्म है। फिर जब पिताजी ही स्वर्ग चले गये तो फिर अयोध्या में मेरा क्या काम? मैं तो ऐसा अभागा हूँ कि न तो मैं उनकी सेवा कर सका, न उनके अन्तिम दर्शन कर सका और न उनका दाह संस्कार ही कर सका।" यह कहते हुये राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। फिर उन्होंने सीता से जाकर कहा, "प्रिये! तुम्हारे श्वसुर स्वर्गलोक सिधार गये।" और लक्ष्मण से बोले, "भैया! हम पितृविहीन हो गये। भरत ने मुझे अभी बताया है।" यह सूचना पाकर सीता और लक्ष्मण दोनों ही बिलख-बिलख कर रो पड़े। इसके पश्चात् राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ मन्दाकिनी के तट पर जाकर हंगुदी का गूदा ले और वक्कल चीर धारणकर पिता को जलांजलि दी। हंगुदी के गूदे का पिण्ड बना कर उसे कुशा पर रखते हुये उनका तर्पण किया। इस प्रकार पिण्डोदक दे स्नानादि कर अपनी कुटिया में लौटे और भाइयों को भुजाओं में समेट कर रोने लगे।

चारों भाइयों के रोने का आर्तनाद सुनकर वशिष्ठ आदि सहित सब रानियाँ वहाँ आ पहुँचीं तथा वे भी विलाप करने लगीं। फिर हृदय में धैर्य धर कर राम, लक्षमण और सीता ने सब रानियों एवं गुरु वशिष्ठ की चरण वन्दना की। इसके पश्चात् समस्त आगत रामचन्द्र को घेर कर बैठ गये और वह रात्रि महाराज दशरथ के विषय में शोक चर्चा करते हुये व्यतीत हो गई। प्रातःकाल नित्यकर्म आदि से निवृत होकर भरत राजगुरु तथा मन्त्रियों के साथ आकर राम से बोले, "हे रघुकुलमणि! प्रतिज्ञा से बँधे हुये पिताजी ने अयोध्या का राज्य मुझे दिया था। मैं वही राज्य आपको समर्पित करता हूँ। आप इसे कृपा करके अस्वीकार न करें। इस पर राम ने कहा, "भरत! मैं जानता हूँ कि पिता की मृत्यु और मेरे वनवास से तुम्हें बहुत दुःख हुआ है। किन्तु यह भाग्य का विधान था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। संयोग के साथ वियोग का और जन्म के साथ मृत्यु का अटूट सम्बंध है। हमारे पिता सहस्त्रों यज्ञ, दान तप आदि करके स्वर्ग गये हैं। इसलिये वे शोक करने योग्य नहीं हैं। तुम पिताजी की आज्ञा मानकर अयोध्या का राज्य करो, मैं भी उनकी आज्ञा का पालन करते हुये वन में निवास करूँगा। पिता की आज्ञा भंग करने से मुझे और तुम्हें दोनों को ही नरक की यातना भोगनी पड़ेगी।" राम के मुख से ये तर्कपूर्ण वचन सुनकर भरत हाथ जोड़कर बोले, "हे महात्मन्! जिस समय यह दुर्घटना घटी, मैं नाना के घर में था। मेरी माता की मूर्खता के कारण यह सारा अनिष्ट हुआ। ऐसी दशा में धर्माधर्म का कुछ ज्ञान रखने के कारण मैं आपके अधिकार का अपहरण कैसे कर सकता हूँ? फिर क्षत्रिय का धर्म तो प्रजा का पालन करना है, जटा धारण करके तपस्वी बनना नहीं। मैं आपसे आयु, ज्ञान, विद्या आदि सबमें छोटा होते हुये सिंहासन पर कैसे बैठ सकता हूँ? अतएव आप राजसिंहासन पर बैठकर मेरे माता को लोक निन्दा से और पिताजी को पाप से बचाइये। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो मुझे भी वन में रहने की अनुमति दीजिये।"

रामचन्द्र ने भरत को पुनः समझाते हुये कहा, "पिताजी ने तुम्हें राज्य और मुझे चौदह वर्ष के लिये वनवास दिया है। जिस प्रकार मैं उनके वचनों पर अविचल श्रद्धा रखकर उनकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, उसी प्रकार तुम्हें भी उनकी आज्ञा को अकाट्य मानकर अयोध्या पर शासन करना चाहिये। उनके वचनों को अवहेलना करके उनकी आत्मा को क्लेश मत पहुँचाओ। बुद्धिमान शत्रुघ्न तुम्हें राजकार्य में समुचित सहायता देंगे। मैं दण्डक वन में प्रवेश करूँगा। इस प्रकार हम चारों भाई पिताजी को अपनी प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्ति दिलायेंगे।" राम के वचनों को सुनकर अयोध्या के अत्यन्त चतुर मन्त्री जाबालि ने कहा, "रामचन्द्र! आपको यह स्मरण रखना चाहिये कि संसार में कोई किसी का सम्बंधी नहीं है। सारे नाते मिथ्या हैं। इनके मायाजाल में फँसकर स्वयं को नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिये पितृऋण के मिथ्या विचार का परित्याग कर आप राज्य को स्वीकार करें। न कोई स्वर्ग है, न कोई परलोक है, न कोई कर्मों का फल देने वाला है। जो कुछ भी सामने है, वही सत्य है। परलोक की मिथ्या कल्पना से अपना जीवन दुःखी बनाना राजकुमारों के लिये उचित नहीं है।" जाबालि के इस मन्त्रणा को सुनकर राम बोले, "मन्त्रिवर! आपने मेरे हित के लिये जो कुछ भी कहा वह वास्तव में अहितकारी है। ये विचार नास्तिकों को शोभा देते हैं। सदाचार और सच्चरित्रता का अपना महत्व है। यदि राजा सत्य के मार्ग से विचलित हो जायेगा तो प्रजा भी उसका अनुसरण कर कुपथगामी हो जायेगी। अतएव मैं आपके इस अनुचित परामर्श को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ। मुझे तो दुःख इस बात का है कि पिताजी जैसे परम आस्तिक धर्मपरायण नरेश ने आप जैसे नास्तिक व्यक्ति को मन्त्रीपद क्यों दिया।।" राम के कठोर वचन सुनकर जाबालि ने कहा, "राघव! मैं नास्तिक नहीं हूँ। भरत के बार-बार आग्रह करने पर भी जब आपने उनकी बात नहीं मानी तो आपको लौटा ले जाने के लिये मैंने अनुचित तर्क का सहारा लिया। मेरी मन्द बुद्धि में और कोई उपाय नहीं सूझा।"

जब राम किसी प्रकार भी भरत की प्रार्थना को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं हुये तो भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "हे तात! यह राज्य आपका है, मैं इसे ग्रहण नहीं कर सकता। यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है। यदि आप पिताजी की आज्ञा का पालन ही करना चाहते हैं तो आपके स्थान में वन में मैं रहूँगा और इस प्रकार पिता को माता के ऋण से मुक्त करूँगा।" भरत के ये स्नेहपूर्ण वचन सुनकर राम मन्त्रियों और पुरवासियों की ओर देखकर बोले, "स्वर्गीय पिताजी ने जो कुछ कर दिया, उसे न तो मैं उलट सकता हूँ और न भरत। वनवास की आज्ञा तो मुझे हुई है, न कि भरत को। माता कैकेयी ने जो कहा है, वह उचित है और पिताजी ने जो कुछ किया है वह भी उचित है। भरत मातृ-पितृ एवं गुरुभक्त हैं, सर्वगुण सम्पन्न हैं। इसलिये वे ही राज्य करें और पिताजी को ऋण मुक्त करें।" जब भरत ने राम के अयोध्या लौटने का कोई उपाय न देखा तो उन्होंने रोते हुये कहा, "भैया! यह मैं जानता हूँ कि आपकी प्रतिज्ञा अटल है, परन्तु यह बात भी उतनी ही अटल है कि अयोध्या का राज्य भी आप ही का है। इसलिये आप अपनी चरण पादुकाएँ मुझे दे दीजिये। इन्हें मैं अयोध्या के राजसिंहासन पर रखूँगा और स्वयं नगर के बाहर रहकर आपके सेवक के रूप में राजकाज चलाउँगा। वक्कल धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा। चौदहवें वर्ष के अन्तिम दिन यदि आप अयोध्या न पहुँचे तो मैं अग्नि में स्वयं को भस्म कर दूँगा, यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है।" इस पर रामचन्द्र जी ने भरत को कण्ठ से लगाकर उन्हें अपनी पादुका दे दी और शत्रुघ्न को समझाते हुये कहा, "भैया! माता कैकेयी को कभी अपशब्द कहकर उनका अपमान मत करना। वे हम सबकी पूज्य माता हैं। इस बात को कभी न भूलना, तुम्हें मेरी और सीता की शपथ है।" फिर माताओं को धैर्य बँधा कर सम्मानपूर्वक सबको विदा किया। श्री राम की चरण पादुकाएँ ले भरत शत्रुघ्न सहित रथ पर सवार हुये। उनके पीछे चलने वाले रथों पर माताएँ, गुरु एवं पुरोहित, मन्त्रीगण तथा अन्य पुरवासी चले। उनके पीछे सेना चली। उदास मन से सब लोग मार्ग की दूरी पारकर तीन दिन में अयोध्या पहुँचे। मार्ग की क्लान्ति को मिटाकर भरत गुरु वशिष्ठ के पासे जाकर बोले, "गुरुदेव! यह तो आप जानते ही हैं कि अयोध्या के वास्तविक नरेश राम हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनकी चरण पादुकाएँ सिंहासन की शोभा बढ़ायेंगी। मैं नगर से दूर नन्दि ग्राम में पर्णकुटी बनाकर निवास करूँगा और वहीं से राजकाज का संचालन करूँगा।" फिर समस्त मन्त्रियों को उनका कार्य सौंपकर वे नन्दि ग्राम से राज्य का कार्य राम के प्रतिनिधि के रूप में देखने लगे।

विराध वध: भरत के चित्रकूट से प्रस्थान करने के पश्चात् रामचन्द्र लक्ष्मण से बोले, "भैया! माताओं के चले जाने से मेरा मन उदास और उद्विग्न हो गया है। उन सबकी स्मृति इस स्थान के साथ इस प्रकार जुड़ गई है कि मुझे बार-बार उनकी याद सताने लगी है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि अब हम इस स्थान का परित्याग कर अन्यत्र जाकर निवास करें।" इस प्रकार सीता और लक्ष्मण से परामर्श करके उन्होंने चित्रकूट का परित्याग किया और घूमते हुये महर्षि अत्रि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने परमतपस्वी वृद्ध महर्षि को प्रणाम कर अपना परिचय दिया। अत्रि ऋषि ने उनका अपने पुत्रों की भाँति स्नेहपूर्वक स्वागत किया। उनका कुशलक्षेम पूछकर महर्षि अत्रि ने अपनी वृद्धा पत्नी अनुसूया को बताया कि मिथिलापति की राजकुमारी तथा अयोध्या की ज्येष्ठ पुत्रवधू जानकी तुम्हारे सम्मुख उपस्थित है। इनका यथोचित सत्कार करो।" ऋषि द्वारा इस प्रकार परिचय दिया जाता देख राम ने सीता से कहा, "सीते! माता के समान स्नेहमयी महाभागा अनुसूया देवी के चरण स्पर्श करो।"

पति की आज्ञा पाकर सीता ने अनुसूया के चरण स्पर्श किये और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। तत्पश्चात् ऋषि-पत्नी बोलीं, "सीता! मैं तुम्हारे त्याग भाव को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुमने राजप्रासाद के सुख ऐश्वर्य का परित्याग कर अपने पति के साथ वन में रहते हुये नाना प्रकार के कष्टों को झेलने का जो निश्चय किया है, उससे तुमने तीनों लोकों में नारी के पतिव्रत धर्म की महिमा को उजागर कर दिया है। हे सुभगे! जो स्त्री अपने पति के गुण-अवगुणों का विचार किये बिना उसे ईश्वर के सामन सम्मान देती हई प्रत्येक दुःख-सुख में उसका अनुसरण करती है, स्वर्ग स्वयं उसके चरणों पर न्यौछावर हो जाता है। वास्तव में, पति कितना ही कुरूप, दुश्चरित्र, क्रोधी और निर्धन क्यों न हो, वह पत्नी के लिये सदैव पूजनीय है। उसके जैसा कोई दूसरा सम्बंधी अपना नहीं होता। पति की सच्ची सेवा ही स्वर्ग का राजमार्ग है। जो स्त्री अपने पति में दुर्गुण देखती है और उस पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिये उसके साथ नित्य कलह करती है तथा उसकी अवमानना और उसके आदेशों की अवहेलना करती है, वह इस लोक में अपयश की भागी होती है और मरने के पश्चात् नर्क को जाती है। तुम्हें ये सब बातें बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम स्वयं सब शास्त्रों को जानने वाली, अपने पति की अनुगामिनी हो। तुमने अपने कर्तव्य पालन से तीनों लोकों में अपनी कीर्ति की धवल पताका फहरा दी है। परमात्मा करे तुम्हारी बुद्धि सदा इसी प्रकार निर्मल बनी रहे।"

देवी अनुसूया की ये उपदेशप्रद बातें सुनकर जानकी बोली, "हे आर्या! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह निःसंदेह महत्वपूर्ण है। मैं जानती हूँ कि पति स्त्री का गुरु, देवता और सर्वस्व होता है। इसी प्रकार का उपदेश मुझे मेरी माता और सास ने दिया है। वह सब मुझे स्मरण है। आपकी बातें भी मैंने हृदयंगम कर ली हैं। आप विश्वास कीजिये, मैं कभी इस मार्ग से विचलित नहीं होउँगी। पति का अनुगमन ही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।" सीता की बात सुनकर अनुसूया ने प्रसन्न होकर कहा, "पुत्री! मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूँ। जो तेरी इच्छा हो, वर माँग ले। मैं वनवासिनी होकर भी दैवी शक्ति से किसी भी मानव की मनोकामना पूर्ण करने में समर्थ हूँ।" यह सुनकर सीता बोलीं, "मातेश्वरी! मैं पूर्णतया सन्तुष्ट हूँ। इसलिये आपसे क्या माँगूँ। आपकी मुझ पर अतीव कृपा है, यही मेरे लिये यथेष्ठ है।" सीता के वचनों से प्रसन्न होकर अनुसूया ने कहा, "हे जानकी! तुम सदा सौभाग्वती रहो। मैं तुम्हें यह दिव्य माला देती हूँ, जिसके फूल कभी नहीं कुम्हलायेंगे, ये दिव्य वस्त्र न कभी मैले होंगे और न फटेंगे तथा यह सुगन्धित अंगराग कभी फीका नहीं पड़ेगा।" यह कहकर उन्होंने तीनों वस्तुएँ सीता को दकर उन्हें अपने सम्मुख ही धारण कराया। फिर उनके चरणों में सिर नवाकर सीता रामचन्द्र के पास गई और उन्हें वे सब उपहार दिखाये। सन्ध्या को सबने साथ बैठकर सन्ध्योपासना की। फिर अनुसूया सीता को चाँदनी रात्रि में वन की शोभा दिखाने के लिये ले गईं। रात्रि को आध्यात्मिक चर्चा के पश्चात् सबने मुनि के आश्रम में विश्राम किया।

प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुये बोले, "हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूँ, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।" राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणान्त करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिये प्रस्थान किया। दण्डक वन में प्रवेश करके राम ने ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम देखे। वहाँ का प्रदेश अत्यन्त मनोरम था। बड़ी बड़ी यज्ञशालाएँ तथा हवन-सामग्री आध्यात्मिक भावनाएँ जगा रही थीं। उन आश्रमों में तेजस्वी ऋषि-मुनि अपनी आध्यात्मिक साधना में व्यस्त थे। वे वीर तपस्वियों के वेश में राम-लक्ष्मण को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्हें  आशीर्वाद देकर बोले, "हे राघव! आप चाहे अयोध्या में रहें या वन में, आप हमारे राजा हैं और इसलिये हम वनवासियों की रक्षा करना आपका परम कर्तव्य है। यहाँ रहने वाले तपस्वी काम-क्रोध आदि दोषों पर विजय प्राप्त करके आत्मचिन्तन में व्यस्त रहते हैं, परन्तु दुष्ट राक्षस उन्हें दत्त-चित्त होकर ईश्वर आराधना नहीं करने देते। उसमें वे विघ्न ही नहीँ डालते, निरपराध तपस्वियों की हत्या भी कर डालते हैं। इसलिये हे राम! आप उनसे हमारी रक्षा करें। रामचन्द्र ने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं शीघ्र ही इन राक्षसों का विनाश कर इस क्षेत्र को निरापद कर दूँगा। फिर उन्होंने उस महावन में प्रवेश किया जहाँ हिंसक पशु और राक्षस निवास करते थे और तपस्वियों को कष्ट देते थे। वे दण्डक वन में अभी थोड़ी ही दूर गये थे कि एक पर्वताकार राक्षस हाथी के समान चिंघाड़ता हुआ बाघम्बर धारण किये सीता पर झपटा और उन्हें उठाकर कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। फिर राम और लक्ष्मण की ओर देखकर बोले, "तुम हाथ में धनुष बाण लेकर दण्डक वन में घुस आये हो। इससे मालूम होता है कि अब तुम्हारी मृत्यु निकट आ गई है। तुम दोनों कौन हो? क्या तुमने मेरा नाम नहीं सुना? मैं विराध हूँ जो प्रतिदिन ऋषियों का माँस खाकर अपनी क्षुधा शान्त करता हूँ। मैं तुम दोनों का अभी रक्तपान करके इस सुन्दर स्त्री को अपनी पत्नी बनाउँगा। तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हें यहाँ ले आई है।"

विराध की दम्भपूर्ण वाणी सुनकर राम ने लक्ष्मण से कहा, "भैया! देखो विराध के चंगुल में फँसकर सीता कैसी दुःखी हो रहा है। कोई दूसरा व्यक्ति उसका स्पर्श करे यह मेरे लिये कितनी लज्जा की बात है। पिताजी की मृत्यु तथा अपने राज्य के अपहरण से मुझे इतना दुःख नहीं हुआ जितना आज भयभीत सीता को देखकर हो रहा है। मेरी समझ में नहीं आता इस दुष्ट से सीता की कैसे रक्षा करूँ। राम के दीन वचन सुनकर लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर कहा, "भैया! आप इतने पराक्रमी होकर इस प्रकार अनाथों की भाँति क्यों बात कर रहे हैं? मैं अभी इस दुष्ट राक्षस का संहार करता हूँ।" फिर विराध से बोले, "दुष्ट! मरने से पहले तू हमें अपना परिचय दे और अपने कुल का नाम बता।" विराध ने हँसते हुये कहा, "तुम मेरा परिचय जानना चाहते हो तो सुनो! मैं जय नामक राक्षस का पुत्र हूँ और शतह्रदा मेरी माँ है। मुझे ब्रह्मा जी से यह वर प्राप्त है कि किसी भी अस्त्र-शस्त्र से मेरी हत्या नहीं हो सकती और न वे मेरे अंगों को छिन्न-भिन्न ही सकते हैं। यदि तुम इस स्त्री को मेरे पास छोड़ कर चले जाओगे तो मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि मैं तुम्हें नहीं मारूँगा।" विराध के वचन सुनकर राम को इतना क्रोध आया कि उन्होंने उसे तत्काल तीक्ष्ण बाणों से बेधना आरम्भ कर दिया। वे बाण विराध के शरीर को छेदकर रक्तरंजित हो पृथ्वी पर गिरने लगे। इस प्रकार घालय होकर त्रिशूल ले विराध राम और लक्ष्मण पर झपटा तो दोनों भाइयों ने उस पर अग्निबाणों की वर्षा आरम्भ कर दी, किन्तु विराध पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे केवल उसके त्रिशूल को काट भर सके। इसके पश्चात् जब भयंकर तलवारों से दोनों भाइयों ने उस पर आक्रमण किया तो वह उन्हें दोनों भुजाओं में पकड़कर आकाशमार्ग से उड़ चला। राम ने लक्ष्मण से कहा, "जिस ओर ये राक्ष्स ले जा रहा है, हमें बिना विरोध किये उधर चले जाना चाहिये, यही हमारे लिये उचित है।" इस प्रकार राम-लक्ष्मण को ले जाते देख सीता विलाप करके कहने लगी, "हे राक्षसराज! इन दोनों भाइयों को छोड़ दो। मैं तुमसे प्रार्थना करती हूँ मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ। सीता के आर्तनाद से द्रवित हो दोनों भाइयों ने विराध की एक-एक बाँह मरोड़कर तोड़ डाली। इससे वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। लक्षम्मण उसे सचेतकर बार-बार उठा-उठा कर पटकने लगे। इससे वह घायल होकर चीत्कार करने लगा। तभी राम बोले, "लक्ष्मण! वरदान के कारण यह दुष्ट मर नहीं सकता। इसलिये हमें भूमि में गड़्ढा खोदकर इसे बहुत गहराई में गाड़ देना चाहिये।" लक्ष्मण गड्ढा खोदने लगे और राम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गये। तब विराध बोला, "प्रभो! मैं शाप के कारण राक्षस हुआ था। वास्तव में मैं तुम्बुरू नाम गन्धर्व हूँ। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था। आज आपकी कृपा से मुझे उस शाप से मुक्ति मिल रही है।" तत्पश्चात् राम और लक्ष्मण ने उसे उठाकर गड्ढे में डालकर पत्थर आदि से पाट किया। उस समय उसके आर्तनाद से सारा वन प्रान्त गूँज उठा।