19 मई 2009

रामायण-17: अगस्त्य मुनि से भेंट एवं पंचवटी में आश्रम बनाना

सुतीक्ष्ण मुनि से विदा ले कर राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग के नदी, पर्वतों एवं उपत्यकाओं की शोभा को निरखते हुये, दो दिन महर्षि अगस्त्य के भाई के आश्रम में विश्राम करने के पश्चात् अन्त में वे अगस्त्य मुनि के आश्रम के निकट जा पहुँचे। आश्रम के निकट का वातावरण बड़ा हृदयहारी था। सुन्दर विशाल वृक्ष पुष्पवती लताओं से सजे हुये थे। अनेक वृक्ष हाथियों द्वारा तोड़े जाकर पृथ्वी पर पड़े थे। वृक्षों की ऊँची-ऊँची शाखाओं पर वानरवृन्द अठखेलियाँ कर रहे थे। पक्षियों का कलरव उनकी क्रीड़ाओं को तालबद्ध कर रहा था। हिंसक पशु भी हिरण आदि के साथ कल्लोल कर रहे थे। यह देखकर राम लक्ष्मण से बोले, "देखो सौमित्र! इस आश्रम का प्रभाव कितना अद्भुत और स्नेहपूर्ण है कि जन्मजात शत्रु भी परस्पर स्नेह का बर्ताव करते हैं और एक दूसरे की हत्या नहीं करते। यह महर्षि के तपोबल का ही प्रभाव है। राक्षस भी यहाँ किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करते। मैंने तो यह भी सुना है कि उनके प्रभाव से अनेक राक्षस अपनी तामसी वृति का त्याग करके उनके अनन्य भक्त बन गये हैं। यही कारण है कि इस युग के ऋषि-मुनियों में महामुनि अगस्त्य का स्थान सर्वोपरि है। उनकी कृपा से इस वन में निवास करने वाले देवता, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर सब मानवीय धर्मों का पालन करते हुये बड़े प्रेम से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस परम शान्तिप्रद वन में चोर, डाकू, लम्पट, दुराचारी व्यक्ति दिखाई भी नहीं देते। ऐसे महात्मा महर्षि के आज हम दर्शन करेंगे। तुम आगे जाकर मेरे आने की सूचना दो।"

राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने आश्रम में प्रवेश किया और अपने सम्मुख महर्षि के शिष्य को पाकर उससे बोले, "हे सौम्य! तुम महर्षि अगस्त्य को सादर सूचित करो कि अयोध्या के परम तेजस्वी सूर्यवंशी सम्राट दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र जी अपनी पत्नी जनकनन्दिनी सीता के साथ उनके दर्शन के लिये पधारे हैं। वे बाहर अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।" शिष्य से लक्ष्मण का संदेश सुनकर अगस्त्य मुनि बोले, "यह तो बड़ा आनन्ददायक समाचार तू ने सुनाया है। राम की प्रतीक्षा करते हुये मेरे नेत्र थक गये थे। तू जल्दी से जाकर राम को जानकी और लक्ष्मण के साथ मेरे पास ले आ।" मुनि का आदेश पाते ही शिष्य राम, सीता और लक्ष्मण को लेकर मुनि के पास पहुँचा जो पहले से ही उनके स्वागत के लिये कुटिया के बाहर आ चुके थे। तेजस्वी मुनि को स्वयं स्वागत के लिये बाहर आया देख राम ने श्रद्धा से सिर नवा कर उन्हें प्रणाम किया। सीता और लक्ष्मण ने भी उनका अनुसरण किया। अगस्त्य मुनि ने बड़े प्रेम से उन सबको बैठने के लिये आसन दिये। कुशलक्षेम पूछ कर तथा फल-फूलों से उनका सत्कार कर वे बोले, "हे राम! मैंने दस वर्ष पूर्व तुम्हारे दण्डक वन में आने का समाचार सुना था। तभी से मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। आज मेरे सौभाग्य है कि मेरी इस कुटिया में तुम्हारे जैसा धर्मात्मा, सत्यपरायण, प्रतिज्ञापालक, पितृभक्त अतिथि आया है। वास्तव में मेरी कुटिया तुम्हारे आगमन से धन्य हो गई है।" इसके पश्चात् महर्षि ने राम को कुछ दैवी अस्त्र-शस्त्र देते हुये कहा, "हे राघव! जब देवासुर संग्राम हुआ था, उस समय से ये कुछ दिव्य अस्त्र मेरे पास रखे थे। आज इन्हें मैं तुम्हें देता हूँ। इनका उपयोग जितना उचित तुम कर सकते हो अन्य कोई धर्मपरायण योद्धा नहीं कर सकता। इस धनुष का निर्माण विश्वकर्मा ने स्वर्ण और वज्र के सम्मिश्रण से किया है। ये बाण स्वयं ब्रह्मा जी ने दिये थे। स्वर्ण किरणों की भाँति चमकने वाले ये बाण कभी व्यर्थ नहीं जाते। यह तरकस जो मैं तुम्हें दे रहा हूँ, मुझे देवाधिपति इन्द्र ने दिये थे। इनमें अग्नि की भांति दाहक बाण भरे हुये हैं। यह खड्ग कभी न टूटने वाला है चाहे इस पर कैसा ही वार किया जाय। मुझे विश्वास है कि इन अस्त्र-शस्त्रों को धारण कर के तुम इन्द्र की भाँति अजेय हो जाओगे। इनकी सहायता से इस दण्डक वन में जो देव-तपस्वी द्रोही राक्षस हैं, उनका नाश करो।" 

राम ने महर्षि के इस कृपापूर्ण उपहार के लिये उन्हें अनेक धन्यवाद दिये और बोले, "मुनिराज! यह आपकी अत्यन्त अनुकम्पा है जो आपने मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों के योग्य समझा। मैं यथाशक्ति इनका उचित उपयोग करने का प्रयास करूँगा।" राम के विनीत शब्द सुन कर मुनि ने कहा, "नहीं राम! इसमें अनुकम्पा की कोई बात नहीं है। तुम वास्तव में मेरे आश्रम में आने वाले असाधारण अतिथि हो। तुम्हें देख कर मैं कृत-कृत्य हो गया हूँ। लक्ष्मण भी कम महत्वपूर्ण अतिथि नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी विशाल बलिष्ठ भुजाएँ विश्व पर विजय पताका फहराने के लिये ही बनाई गई है। और जानकी का तो पति-प्रेम तथा पति-निष्ठा संसार की स्त्रियों के लिये अनुकरणीय आदर्श बन गये हैं। इन्होंने कभी कष्टों की छाया भी नहीं देखी, तो भी केवल पति भक्ति के कारण तुम्हारे साथ इस कठोर वन में चली आई हैं। वास्तव में इनका अनुकरण करके सन्नारियाँ स्वर्ग की अधिकारिणी हो जायेंगीं। तुम तीनों को अपने बीच में पाकर मेरा हृदय फूला नहीं समा रहा है। तुम लोग इतनी लम्बी यात्रा करके आये हो, थक गये होगे। अतएव अब विश्राम करो। मेरी तो इच्छा यह है कि तुम लोग वनवास की शेष अवधि यहीं व्यतीत करो। यहाँ तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न होगा।" ऋषि के स्नेह भरे वचन सुन कर राम ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया, हे मुनिराज! जिनके दर्शन बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं तथा दीर्घकाल तक तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों को भी दुर्लभ हैं, उनके दर्शन मैं आज इन नेत्रों से कर रहा हूँ। भला इस संसार में मुझसे बढ़ कर भाग्यशाली कौन होगा? आपकी इस महान कृपा और अतिथि सत्कार के लिये मैं सीता और लक्ष्मण सहित आपका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करते हुये हम लोग आज की रात्रि अवश्य यहीं विश्राम करेंगे किन्तु वनवास की शेष अवधि आपके मनोरम आश्रम में हृदय से चाहते हुये भी बिताना सम्भव नहीं होगा। मैं आपकी तपस्या में किसी भी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं करना चाहता, परन्तु आपकी सत्संगति के लाभ से भी वंचित नहीं होना चाहता। इसलिये कृपा करके कोई ऐसा स्थान बताइये जो फलयुक्त वृक्षों, निर्मल जल तथा शान्त वातावरण से युक्त सघन वन हो। वहाँ मैं आश्रम बना कर निवास करूँगा। यहाँ से अधिक दूर भी न हो।" राम की बात सुनकर अगस्त्य मुनि ने कुछ क्षण विचार करके उत्तर दिया, "हे राम! तुम्हारे यहाँ रहने से मुझे कोई असुविधा नहीं होगी। यदि फिर भी तुम किसी एकान्त स्थान में अपना आश्रम बनाना चाहते हो तो यहाँ से आठ कोस दूर पंचवटी नामक महावन है। वह स्थान वैसा ही है जैसा तुम चाहते हो। वहाँ पर गोदावरी नदी बहती है। वह स्थान अत्यन्त रमणीक, शान्त, स्वच्छ एवं पवित्र है। सामने जो मधुक वन दिखाई देता है, उत्तर दिशा से पार करने के पश्चात् तुम्हें एक पर्वत दृष्टिगोचर होगा। उसके निकट ही पंचवटी है। वह स्थान इतना आकर्षक है कि उसे खोजने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी।" मुनि का आदेश पाकर सन्ध्यावन्दन आदि करके राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ रात्रि अगस्त्य मुनि के आश्रम में ही विश्राम किया. प्रातःकालीन कृत्यों से निबटकर महामुनि से विदा हो राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के साथ पंचवटी की ओर प्रस्थान किया।

पंचवटी में आश्रम: पंचवटी की ओर जाते हुये राम, सीता और लक्ष्मण की दृष्टि एक पर्वताकार बलिष्ठ व्यक्ति पर पड़ी। लक्ष्मण ने इस असाधारण आकार वाले मनुष्य को देखकर समझ लिया कि यह कोई राक्षस है। इसलिये धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते हुये उससे बोले, "तुम कौन हो?" लक्ष्मण के इस प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु राम की ओर दोनों हाथ जोड़ कर बोला, "हे रघुकुलतिलक! जब से मुझे ज्ञात हुआ कि आप दण्डकारण्य में पधारे हुये हैं, तभी से आपकी प्रतीक्षा में मैं यहाँ पड़ा हुआ हूँ। आपकी प्रतीक्षा करते हुये मुझे अनेक वर्ष व्यतीत हो गये हैं। मेरा नाम जटायु है और मैं गृद्ध जाति के यशस्वी व्यक्ति अरुण का पुत्र हूँ। मेरा निवेदन है कि आप मुझे अपने साथ रहने की अनुमति दें ताकि मैं सेवक की भाँति आपके साथ रहकर आपकी सेवा कर सकूँ।" यह कह कर वह राम और लक्ष्मण के साथ चलने लगा। पंचवटी में पहुँच कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "भैया लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि अगस्त्य ने जिस पंचवटी का वर्णन किया था, वह यही है और हम सही स्थान पर आ पहुँचे हैं। सामने गोदावरी नदी भी कल-कल करती हुई बह रही है। इसलिये कोई अच्छा सा स्थान खोज कर उस पर आश्रम बनाने की तैयारी करो।" राम के प्रस्ताव का समर्थन करते हुये सीता ने भी कहा, "हाँ नाथ! यह स्थान वास्तव में उपयुक्त है। गोदावरी के तट पर पुष्पों से लदे वृक्ष कितने अच्छे लग रहे हैं। वृक्षों पर लगे अनेक प्रकार के फल-फूल स्वर्ण, रजत एवं ताम्र के सदृश चमक रहे हैं। इन रंग-बिरंगे पुष्पों वाले वृक्षों से युक्त पर्वत ऐसे प्रतीत होते हैं, मानों गजों के समूह ने ऋंगार किया हो। मुझे तो ताल, तमाल, नागकेशर, कटहल, आम, अशोक, देवदारु, चन्दन, कदम्ब आदि के वृक्षों से तथा केवड़ा, मोतिया, चम्पक, गेंदा, मौलसिरी आदि रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित वन अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता है। आप अपना आश्रम यहीं बनाइये। मेरा मन भी यहाँ भली भाँति रम जायेगा।"

राम का प्रस्ताव और सीता का अनुमोदन पाकर लक्ष्मण ने लकड़ियों तथा घास-फूसों की सहायता से एक कुटिया का निर्माण कर लिया। जब यह कुटिया बनकर पूरी हो गई तो उसी के निकट उन्होंने एक और कुटिया का निर्माण सुन्दर लता-पल्लवों से किया और उस में सुन्दर स्म्भों से युक्त यज्ञ वेदी बनाई। तत्पश्चात् उन्होंने पूरे आश्रम के चारों ओर काँटों की बाड़ लगा दी। फिर राम और सीता को बुला कर आश्रम का निरीक्षण कराया। वे इस सुन्दर आश्रम को देख कर बहुत प्रसन्न हुये और लक्ष्मण की सराहना करते हुये बोले, "लक्ष्मण! तुमने तो इस बीहड़ वन में भी राजप्रासाद जैसा सुविधाजनक निवास स्थान बना दिया। तुम्हारे कारण तो मुझे वन घर से भी अधिक सुखदायक हो गया है।" इसके पश्चात् उन दोनों के साथ बैठ कर राम ने यज्ञ-कुटीर में हवन किया। वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे और लक्ष्मण दत्तचित्त होकर उन दोनों की सेवा करने लगे। इस प्रकार उन्होंने शरद ऋतु के दो मास सुख से बिता दिये। एक दिन हेमन्त ऋतु की प्रातः बेला में राम सीता के साथ गोदावरी में स्नान करने के लिये जा रहे थे। लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे घड़ा उठाये चल रहे थे। शीतल वायु बह रही थी जिससे शरीर सुन्न हुआ जा रहा था। सरिता के तट पर पहुँच कर लक्ष्मण को ध्यान आया कि हेमन्त ऋतु रामचन्द्र जी की कितनी प्रिय ऋतु रही है इसलिये वे तट पर घड़े को रख कर बोले, "भैया! यही वह हेमन्त ऋतु है जो आपको सदा सर्वाधिक प्रिय रही है। इस ऋतु को आप वर्ष का आभूषण कहा करते थे। अब कठोर शीत पड़ने लगी है। पृथ्वी अन्नपूर्णा बन गई है। ग्रीष्म ऋतु में जितना जल सुहावना लगता था, आज उतनी हीं अग्नि सुहावनी लगती है। नागरिक लोग धूमधाम से यज्ञों में अन्न की हवि देकर उसका पूजन करने लगे हैं। सम्पूर्ण भारत भूमि में दूध-दही की नदियाँ बहने लगी हैं। राजा-महाराजा अपनी-अपनी चतुरंगिणी सेनाएँ लेकर शत्रुओं को पराजित करने के लिये निकल पड़े हैं। सूर्य के दक्षिणायन होने से उत्तर दिशा की शोभा समाप्त हो गई है। आजकल सूर्य का ताप और अग्नि की उष्मा दोनों ही प्रिय लगते हैं। रात्रियाँ हिम जैसी ठण्डी हो गई हैं। उधर देखिये प्रभो! जौ और गेहूँ से भरे खेतों में ओस के बिन्दु मोतियों की भाँति झिलमिला रहे हैं। इधर ओस के जल से भीगी हई रेत पैरों को घायल कर रही है। उधर भैया भरत अयोध्या में रहते हुये भी वनवासी का जीवन व्यतीत करते हुये ठण्डी भूमि पर शयन करते होंगे। वे भी सब प्रकार के ऐश्वर्यों को लात मार कर आपकी भाँति त्याग कर कष्ट का जीवन व्यतीत कर रहे होंगे। हे तात! विप्रजन कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव उसकी माता के अनुकूल होता है, पिता के नहीं, परन्तु भरत ने इस कहावत को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। उनका स्वभाव अपनी माता के क्रूर स्वभाव से कदापि मेल नहीं खाता। उनकी माता का क्रूर स्वभाव वास्तव में हमारे और सम्पूर्ण देश के दुःख का कारण बन गया है।"

लक्ष्मण के मुख से कैकेयी के लिये निन्दा भरे वचन सुन कर राम बोले, "लक्ष्मण! इस प्रकार माता कैकेयी की निन्दा मत करो। वनवास में मैंने तापस धर्म ग्रहण किया है और तपस्वी के लिये किसी की निन्दा करना या सुनना दोनों ही पाप है। फिर कैकेयी जैसी भरत की माता हैं, वैसी ही मेरी भी माता हैं। हमें भरत के उन विनम्र, मधुर एवं स्नेहयुक्त वचनों को स्मरण रखना चाहिये जो उन्होंने चित्रकूट में आकर कहे थे। मैं तो व्यग्रता से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब हम चारों भाई फिर एकत्रित होकर एक दूसरे के गले मिलेंगे।" इस प्रकार भरत के वियोग में व्याकुल होते हुये राम सीता और लक्ष्मण के साथ गोदावरी के शीतल जल में स्नान कर के अपने आश्रम लौटे।