21 मई 2009

रामायण-26: हनुमान का सागर पार करना एवं लंका में सीता की खोज

समुद्र के तटवर्ती शैल पर चढ़ कर हनुमान अपने साथी वानरों से बोले, "मित्रों! अब तुम मेरी ओर से निश्चिन्त हो कर श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करो। मैं अब अपने अन्दर ऐसी शक्ति का अनुभव कर रहा हूँ जिसके बल पर मैं आकाश मार्ग से उड़ता हुआ सामने फैले हुये सागर से भी दस गुना बड़े सागर को पार कर सकता हूँ" इतना कह कर हनुमान जी पूर्वाभ्यास के रूप में उस विशाल पर्वत की चोटियों पर इधर-उधर कूदने लगे। इसके पश्चात् उन्होंने अपने शरीर को झटका दे कर एक विशाल वृक्ष को अपनी भुजाओं में भर कर इस प्रकार झकझोरा कि उसके सभी फूल पत्ते झड़ कर पृथ्वी पर फैल गये। फिर वर्षाकालीन घनघोर बादल की भाँति गरजते हुये उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं और पैरों को सिकोड़ कर, प्राण वायु को रोक उछलने की तैयारी करते हुये पुनः वानरों को सम्बोधित किया, "हे भाइयों! जिस तीव्र गति से रामचन्द्र जी का बाण चलता है, उसी तीव्र गति से उनके आशीर्वाद से मैं लंका में जाउँगा और वहाँ पहुँच कर सीता जी की खोज करूँगा। यदि वहाँ भी उनका पता न चला तो रावण को पकड़ कर रामचन्द्र जी के चरणों में लाकर पटक दूँगा। आप विश्वास रखें कि मैं निष्फल हो कर कदापि नहीं लौटूँगा।"

इतना कह कर हनुमान आकाश में उछले और बड़े वेग से लंका की ओर चले। उनके उड़ते ही उनके झटके से अनेक वृक्ष पृथ्वी से उखड़ गये और वे भी उनके साथ उड़ने लगे। फिर थोड़ी दूर तक उड़ने के पश्चात् वे वृक्ष एक-एक कर के समुद्र में गिरने लगे। वृक्षों से पृथक हो कर सागर में गिरने वाले नाना प्रकार के पुष्प ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो शरद ऋतु के नक्षत्र जल की लहरों के साथ अठखेलियाँ कर रहे हों। तीव्र गति से उड़ते हुये पवनसुत जब नीचे की ओर मुख करते थे तो ऐसा आभास होता था कि वे अनन्त आकाश का आचमन करते हुये उड़े जा रहे हैं। तेज से जाज्वल्यमान उनके नेत्र हिमालय पर्वत पर लगे हुये दो दावानलों का भ्रम उत्पन्न करते थे। कुछ दर्शकों को ऐसा लग रहा था कि आकाश में तेजस्वी सूर्य और चन्द्र दोनों एक साथ जलनिधि को प्रकाशित कर रहे हों। उनका लाल कटि प्रदेश पर्वत के वक्षस्थल पर किसी गेरू के खान का भ्रम पैदा कर रहा था। हनुमान के बगल से जो तेज आँधी भारी स्वर करती हुई निकली थी वह घनघोर वर्षाकाल की मेघों की गर्जना सी प्रतीत होती थी। आकाश में उड़ते हये उनके विशाल शरीर का प्रतिबम्ब समुद्र पर पड़ता था तो वह उसकी लहरों के साथ मिल कर ऐसा भ्रम उत्पन्न करता था जैसे सागर के वक्ष पर कोई नौका तैरती चली जा रही हो। इस प्रकार हनुमान निरन्तर आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़े जा रहे थे।

हनुमान की अद्भुत शक्ति की परीक्षा करने के लिए कुछ ऋषियों ने नागमाता सुरसा के पास जा कर कहा, "हे नागमाता! तुम जा कर वायुपुत्र हनुमान की यात्रा में विघ्न डाल कर उनकी परीक्षा लो कि वे लंका में जा कर रामचन्द्र का कार्य सफलता पूर्वक कर सकेंगे या नहीं।" ऋषियों के मर्म को समझ कर सुरसा विशालकाय राक्षसनी का रूप धारण कर के समुद्र के मध्य में जा कर खड़ी हो गई और उसने अपने रूप को अत्यन्त विकृत बना लिया। हनुमान को अपने सम्मुख पा कर वह बोली, "आज मैं तुम्हें अपना आहार बना कर अपनी क्षुधा को शान्त करूँगी। मैं चाहती हूँ, तुम स्वयं मेरे मुख में प्रवेश करो ताकि मुझे तुम्हें खाने के लिये प्रयत्न न करना पड़े।" सुरसा के शब्दों को सुन कर हनुमान बोले, "तुम्हारी इच्छा पूरी करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु इस समय मैं अयोध्या के राजकुमार रामचन्द्र जी के कार्य से जा रहा हूँ। उनकी पत्नी को रावण चुरा कर लंका ले गया है। मैं उनकी खोज करने के लिये जा रहा हूँ तुम भी राम के राज्य में रहती हो, इसलिये इस कार्य में मेरी सहायता करना तुम्हारा कर्तव्य है। लंका से मैं जब अपना कार्य सिद्ध कर के लौटूँगा, तब अवश्य तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा। यह मैं तुम्हें वचन देता हूँ।" हनुमान की प्रतिज्ञा पर ध्यान न देते हुये सुरसा बोली, "जब तक तुम मेरे मुख में प्रवेश न करोगे, मैं तुम्हारे मार्ग से नहीं हटूँगी।" यह सुन कर हनुमान बोले, "अच्छा तुम अपने मुख को अधिक से अधिक खोल कर मुझे निगल लो। मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश करने को तैयार हूँ।" यह कह कर महाबली हनुमान ने योगशक्ति से अपने शरीर का आकार बढ़ा कर चालीस कोस का कर लिया। सुरसा भी अपू्र्व शक्तियों से सम्पन्न थी। उसने तत्काल अपना मुख अस्सी कोस तक फैला लिया इसपर हनुमान ने अपना शरीर एक अँगूठे के समान छोटा कर लिया और तत्काल उसके मुख में घुस कर बाहर निकल आये। फिर बोले, "अच्छा सुरसा, तुम्हारी इच्छा पूरी हुई अब मैं जाता हूँ। प्रणाम!" इतना कह कर हनुमान आकाश में उड़ गये।

अभी पवनसुत थोड़ी ही दूर गये थे कि सिंहिका नामक राक्षसनी की उन पर दृष्टि पड़ी। वह हनुमान को खाने के लिये लालयित हो उठी। वह छाया ग्रहण विद्या में पारंगत थी। जिस किसी प्राणी की छाया पकड़ लेती थी, वह उसके बन्धन में बँधा चला आता था। जब उसने हनुमान की छाया को पकड़ लिया तो हनुमान की गति अवरुद्ध हो गई। उन्होंने आश्चर्य से सिंहिका की ओर देखा। वे समझ गये, सुग्रीव ने जिस अद्भुत छायाग्राही प्राणी की बात कही थे, सम्भवतः यह वही है। यह सोच कर उन्होंने योगबल से अपने शरीर का विस्तार मेघ के समान अत्यन्त विशाल कर लिया। सिंहिका ने भी अपना मुख तत्काल आकाश से पाताल तक फैला लिया और गरजती हई उनकी ओर दौड़ी। यह देख कर हनुमान अत्यन्त लघु रूप धारण करके उसके मुख में जा गिरे और अपने तीक्ष्ण नाखूनों से उसके मर्मस्थलों को फाड़ डाला। इसके पश्चात् बड़ी फुर्ती से बाहर निकल कर आकाश की ओर उड़ चले। राक्षसनी क्षत-विक्षत हो कर समुद्र में गिर पड़ी और मर गई। 

लंका में सीता की खोज: इस प्रकार चार सौ कोस के विशाल सागर को पार कर वे उसके तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने पर्वत के शिखर पर बसी हुई भव्य लंकापुरी को देखा। लंका को देखते ही मार्ग की सम्पूर्ण क्लान्ति मिट गई और वे तीव्र वेग से लंकापुरी की ओर चले। उन्होंने देखा, लंका के चारों ओर कमलों से सुशोभित जलपूरित खाई खुदी हुई है। नगर पर नाना रंगों की पताकाएँ फहरा रही हैं। विशाल अट्टालिकाएँ आकाश का स्पर्श कर रही हैं। चारों ओर स्वर्णकोट से घिरी लंका में स्थान-स्थान पर वीर एवं पराक्रमी राक्षस पहरा दे रहे हैं। नगर में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को तीक्ष्ण दृष्टि से परखते हैं और यह पता लगाने की चेष्टा करते हैं कि वह शत्रु का गुप्तचर तो नहीं है। हनुमान सोचने लगे कि इन दुष्टों की क्रूर दृष्टि से बच कर नगर में प्रवेश कर पाना सरल नहीं है, और नगर में प्रवेश किये बिना सीता जी का पता कैस लग सकेगा? इसलिये वे ऐसी युक्ति पर विचार करने लगे जिसके सहारे वे उनकी आँखों में धूल झोंक कर लंका में प्रवेश ही न कर सकें अपितु प्रत्येक स्थान तक निरापद पहुँच कर सीता की खोज कर सकें। पकड़े जाने पर मृत्यु तो निश्चित है ही, रघुनाथ जी का कार्य भी अपूर्ण रह जायेगा। इसके अतिरिक्त पहरेदार मुझे बड़ी सरलता से पहचान लेंगे क्योंकि राक्षसों की और मेरी आकृति में भारी अन्तर है। फिर इनकी दृष्टि से तो वायु भी बच कर नहीं निकल पाती। अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि के अन्धकार में नगर में प्रवेश करने का प्रयास किया जाये। यह सोच कर वे वृक्षों की आड़ में छिप कर बैठ गये और रात्रि की प्रतीक्षा करने लगे।

जब अन्धकार हो गया तो हनुमान कोट को फाँद कर लंका में प्रविष्ट हुये। स्वर्ण निर्मित विशाल भवनों में दीपक जगमगा रहे थे। कहीं नृत्य हो रहा था और कहीं सुरा पी कर मस्त हुये राक्षस अनर्गल प्रलाप कर रहे थे। कुछ लोग कहीं वेदपाठ और स्वाध्याय भी कर रहे थे। उन्होंने नगर के सब भवनों तथा एकान्त स्थानों को छान डाला, परन्तु कहीं सीता दिखाई नहीं दीं। अन्त में उन्होंने सब ओर से निराश हो कर रावण के उस राजप्रासाद में प्रवेश किया जिसमें लंका के मन्त्री, सचिव एवं प्रमुख सभासद निवास करते थे। उन सब का भली-भाँति निरीक्षण करने के पश्चात् वे उस बृहत्शाला की ओर चले जिसे रावण अत्यन्त प्रिय मानता था और जिसकी दिव्य रचना की ख्याति देश-देशान्तरों तक फैली हुई थी। उस शाला की सीढ़ियाँ रत्नफटित थीं। स्वर्ण निर्मित वातायन और खिड़कियाँ दीपों के प्रकाश से जगमगा रही थीं। स्थान-स्थान पर हाथी दाँत का काम किया हुआ था। छतें और स्तम्भ मणियों तथा रत्नों से जड़े हुये थे। इन्द्र भवन से भी अधिक सुसज्जित इस भव्य शाला को देख कर हनुमान चकित रह गये। उन्होंने एक ओर स्फटिक के सुन्दर पलंग पर रावण को मदिरा के मद में पड़े देखा। उसके नेत्र अर्द्धनिमीलित हो रहे थे। चारों ओर अनेक अनिंद्य सुन्दरियाँ उसे घेरे हुये उसका मनोरंजन कर रही थीं। अनेक रमणियों के वस्त्राभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे थे। वे भी सुरा के प्रभाव से अछूती नहीं थीं। वहाँ भी सीता को न पा कर पवनसुत बाहर निकल आये।

रावण के स्वयं के और अन्य निकट सम्बंधियों के निवास स्थानों की खोज से असफल हो कर हनुमान ने रावण की पटरानी मन्दोदरी के भवन में प्रवेश किया। मन्दोदरी के शयनागार में जा कर देखा, मन्दोदरी एक स्फटिक से श्वेत पलंग पर सो रही थी. पलंग के चारों ओर रंग-बिरंगी सुवासित पुष्पमालायें लटक रही थीं। उसके अद्भुत रूप, लावण्य, सौन्दर्य एवं यौवन को देख कर हनुमान के मन में विचार आया, सम्भवतः यही जनकनन्दिनी सीता हैं, परन्तु उसी क्षण उनके मन में एक और विचार उठा कि ये सीता नहीं हो सकतीं क्योंकि रामचन्द्र जी के वियोग में पतिव्रता सीता न तो सो सकती हैं और न इस प्रकार आभूषण आदि पहन कर श्रृंगार ही कर सकती हैं। अतएव यह स्त्री अनुपम लावण्यमयी होते हुये भी सीता कदापि नहीं है। यह सोच कर वे उदास हो गये और मन्दोदरी के कक्ष से बाहर निक आये। सहसा वे सोचने लगे कि आज मैंने पराई स्त्रियों को अस्त-व्यस्त वेष में सोते हुये देख कर भारी पाप किया है। वे इस पर पश्चाताप करने लगे। कुछ देर बाद यह सोच कर उन्होंने अपने मन को शान्ति दी कि उन्हें देख कर मेरे मन में कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ इसलिये यह पाप नहीं है। फिर जिस उद्देश्य के लिये मुझे भेजा गया है, उसकी पूर्ति के लिये मुझे अनिवार्य रूप से सभी जगह का अवलोकन करना पड़ेगा। इसके बिना मैं अपना कार्य कैसे पूरा कर सकूँगा। फिर वे सोचने लगे मुझे सीता जी कहीं नहीं मिलीं। रावण ने उन्हें मार तो नहीं डाला? यदि ऐसा है तो मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ गया। नहीं, मुझे यह नहीं सोचना चाहिये। जब तक मैं लंका का कोना-कोना न छान मारूँ, तब तक मुझे निराश नहीं होना चाहिये। यह सोच कर अब उन्होंने ऐसे-ऐसे स्थानों की खोज आरम्भ की, जहाँ तनिक भी असावधानी उन्हें यमलोक तक पहुँचा सकती थी। उन स्थानों में उन्होंने रावण द्वारा हरी गई अनुपम सुन्दर नागकन्याओं एवं किन्नरियों को भी देखा, परन्तु सीता कहीं नहीं मिलीं। सब ओर से निराश हो कर उन्होंने सोचा, मैं बिना सीता जी का समाचार लिये लौट कर किसी को मुख नहीं दिखा सकता। इसलिये यहीं रह कर उनकी खोज करता रहूँगा, अथवा अपने प्राण दे दूँगा। यह सोंच कर भी उन्होंने सीता को खोजने का कार्य बन्द नहीं किया।

हनुमान जी अशोक वाटिका में: जब हनुमान लंका नगरी के समस्त भवनों और अट्टालिकाओं में सीता की खोज कर के असफल हो चुके तो वे लंका के उपवन, वाटिकाओं, सरोवरों, झीलों, सुरम्य तरणतालों आदि क्षेत्रों का भ्रमण कर के सीता का पता लगाने का प्रयास करने लगे। इस प्रकार भटकते-भटकते वे अशोकवाटिका तक जा पहुँचे। जो चारों ओर से ऊँचे परकोटों से घिरी हुई थी। अन्दर जाने का कोई सुरक्षित मार्ग न देख कर वे एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गये उस पर से छलाँग लगा कर परकोटे के अन्दर कूद पड़े। अशोकवाटिका में सुन्दर प्राकृतिक वृक्ष तथा वल्लरियाँ तो थीं ही, सोने-चाँदी से निर्मित नाना प्रकार के ऐसे वृक्ष भी वहाँ खड़े किये गये थे जो वास्तविक एवं प्राकृतिक वृक्षों जैसे प्रतीत होते थे। पक्षियों के कलरव एवं मृगछौनों की अठखेलियों से वाटिका अत्यन्त रमणीक बन गई थी. वहाँ ऐसे सुन्दर सरोवर और तड़ाग भी थे जिनका जल अत्यन्त निर्मल था तथा सीढ़ियाँ स्वर्ण-रत्न जटित थीं। एक ओर हनुमान ने स्वर्ण का एक वृक्ष देखा जिसके नीचे चारों ओर स्वर्ण की यज्ञ-वेदियाँ बनी हुईं थीं। उन्होंने सोचा, यदि रावण ने जानकी जी को इस वाटिका में रखा होगा तो प्रातःकाल सन्ध्या-उपासना के लिए यहाँ अवश्य आती होंगीं क्योंकि आर्य परिवार की होने के कारण वे धार्मिक कृत्यों का परित्याग कदापि नहीं कर सकतीं। यह सोच कर हनुमान उस वृक्ष पर चढ़ कर बैठ गये और रात्रि के बीतने तथा प्रातःकाल होने की प्रतीक्षा करने लगे। साथ ही वृक्ष पर चढ़े हुये वे इधर-उधर अन्वेषणात्मक दृष्टि भी घुमाने लगे। उन्होंने देखा, रावण की अशोकवाटिका के सामने इन्द्र का नन्दनवन और कुबेर का चैत्ररथवन भी श्रीहीन से प्रतीत होते हैं। कभी-कभी दर्शक को ऐसा भ्रम होता था कि यह अशोकवाटिका का नहीं कुबेर का विश्वविख्यात गंधमादन पर्वत है जिसमें वसन्त की मनोमुग्धकारी समीर सुगन्धित पुष्पों के मकरन्द को ले कर सम्पूर्ण वातावरण को आप्लावित कर रही है।

इस देवोपम वाटिका में हनुमान ने कैलाश पर्वत जैसा एक उच्च स्वर्ण एवं रत्नजटित प्रासाद देखा। उस महल के समीप एक विशाल वृक्ष के नीचे एक सुन्दर किन्तु कृशकाय स्त्री बैठी थी। उसके वस्त्र मलिन, फटे और पुराने थे। उसे चारों ओर से कुछ कुरूप राक्षसनियों ने घेर रखा था। वह बार-बार ठंडी और गहरी साँस भर रही थी जैसे वह भयंकर विपदा की मारी दुखियारी हो। शरीर पर कोई आभूषण नहीं था। सिर के केश रूखे और सूखे थे जो एक वेणी के रूप में लिपटे हुये उसके आगे लटक रहे थे। शरीर कोमल होते हुये भी कान्तिहीन हो गया था। उसकी यह दीन मलिन दशा देख कर और निशाचरियों के पहरे में बन्दी पा कर हनुमान ने अनुमान लगाया, सम्भवतः यही रामचन्द्र जी की प्राणवल्लभा जनकनन्दिनी सीता हैं। उन्हें इस बात का विश्वास होने लगा कि श्रद्धा के सदृश, टूटी हुई आशा सी, मिथ्यावाद के फलस्वरूप नष्ट हुई कीर्ति के समान जो यह देवी राक्षसी समूह से घिरी बैठी हैं, वास्तव में वहीं विदेहकुमारी हैं। इन्हीं के वियोग में दशरथनन्दन राम व्याकुल हो रहे हैं। यह तपस्विनी ही उनके हृदय में अक्षुण्ण रूप से निवास करती हैं। इन्हीं सीता को पुनः प्राप्त करने के लिये रामचन्द्र जी ने बालि का वध कर के सुग्रीव को उनका खोया हुआ राज्य दिलाया है। इन्हीं को खोज पाने के लिये मैंने विशाल सागर को पार कर के लंका के भवन अट्टालिकाओं की खाक छानी है। इस अद्भुत सुन्दरी को प्राप्त करने के लिये रघुनाथ जी सागर पर्वतों सहित यदि सम्पूर्ण धरातल को भी उलट दें तो भी कम है। ऐसी पतिपरायणा साध्वी देवी के सम्मुख तीनों लोकों का राज्य और चौदह भुवन की सम्पदा भी तुच्छ है। आज यह महान पतिव्रता राक्षसराज रावण के पंजों में फँस कर असह्य कष्ट भोग रही है। मुझे अब इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं है कि यह वही सीता है जो अपने देवता तुल्य पति के प्रेम के कारण अयोध्या के सुख-वैभव का परित्याग कर के रामचन्द्र के साथ वन के कष्टों को हँस-हँस कर झेलने के लिये चली आई थीं और जिसे नाना प्रकार के दुःखों को उठा कर भी कभी वन में आने का पश्चाताप नहीं हुआ। वही सीता आज इस राक्षसी घेरे में फँस कर अपने प्राणनाथ के वियोग में सूख-सूख कर काँटा हो गई हैं, किन्तु उन्होंने अपने सतीत्व पर किसी प्रकार की आँच नहीं आने दिया। इसमें सन्देह नहीं, यदि इन्होंने रावण के कुत्सित प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया होता तो आज इनकी यह दशा नहीं होती। राम के प्रति इनके मन में कितना अटल स्नेह है, यह इसी बात से सिद्ध होता है कि ये न तो अशोकवाटिका की सुरम्य शोभा को निहार रही हैं और न इन्हें घेर कर बैठी हुई निशाचरियों को। उनकी एकटक दृष्टि पृथ्वी में राम की छवि को निहार रही हों। सीता की यह दीन दशा देख कर भावुक पवनसुत के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो चली। वे सुध-बुध भूल कर निरन्तर आँसू बहाने लगे। कभी वे सीता जी की दीन दशा को देखते थे और कभी रामचन्द्र जी के उदास दुःखी मुखण्डल का स्मरण करते थे। इसी विचारधारा में डूबते-उतराते रात्रि का अवसान होने और प्राची का मुखमण्डल उषा की लालिमा से सुशोभित होने लगी। तभी हनुमान को ध्यान आया कि रात्रि समाप्तप्राय हो रही है। वे चैतन्य हो कर ऐसी युक्ति पर विचार करने लगे जिससे वे सीता से मिल कर उनसे वार्तालाप करके उन तक श्री रामचन्द्र जी का सन्देश पहुँचा सके।