बुधवार, 20 मई 2009

जटायु से भेंट, कबंध वध एवं शबरी का प्रेम

राम को इस प्रकार असहाय अनाथ की भाँति रुदन करते देख लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "भैया! तनिक सोचो, कितनी तपस्या से माता कौशल्या और पिताजी ने आपको प्राप्त किया है। आपके वियोग में ही पिताजी ने बिलखते हये अपने प्राण त्याग दिये। यदि इसी प्रकार रुदन करते हुये आप अपने प्राण त्याग देंगे तो सोचिये, तीनों माताओं, भरत और मेरी क्या दशा होगी? आपके वियोग में हम कितने दिन जीवित रह सकेंगे? फिर आपके प्यारे अयोध्यावासियों का क्या होगा? आपने ऋषि-मुनियों को साक्षी देकर राक्षसों के विनाश की जो प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा? क्या लोग यह कह कर निन्दा न करेंगे कि सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलसूर्य राघव अपने निजी दुःखों को वरीयता दे कर अपनी प्रतिज्ञा से विचलित हो गये? हे पुरुषोत्तम! सुख-दुःख का तो नित्य घूमने वाला चक्र है। ऐसा कौन है जिस पर विपत्तियाँ नहीं आतीं और ऐसी कौन सी विपत्ति है जिसका अन्त नहीं होता? किसी के सदैव एक से दिन नहीं रहते। आप तो स्वयं महान विद्वान हैं। क्या आपको शिक्षा देता मैं अच्छा लगता हूँ? आप परिस्थितियों पर विचार कर के धैर्य धारण करें। कहीं न कहीं हमें जानकी जी की खोज अवश्य मिलेगी।"

लक्ष्मण के मर्म भरे वचनों को सुन कर राम ने अपने आप को सँभाला और लक्ष्मण के साथ सीता की खोज करने के लिये खर-दूषण के जनस्थान की ओर चले। मार्ग में उन्होंने अपने पिता के सखा जटायु को देखा। उसे देख कर उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "भैया! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इसी जटायु ने सीता को खा डाला है। मैं अभी इसे यमलोक भेजता हूँ।" ऐसा कह कर क्रोध से तिलमिलाते हुये उन्होंने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और जटायु को मारने के लिये आगे बढ़े। राम को अपनी ओर आते देख जटायु बोला, "राम! तुम आ गये। अच्छा हुआ। तुम्हारी ही प्रतीक्षा में मेरे प्राण अटके हुये थे। लंका का राजा सीता का हरण कर के ले गया है और उसी ने मेरी भुजाएँ काट कर मुझे बुरी तरह से घायल कर दिया है। हे वीर! जिस जनकनन्दिनी को तुम यहाँ वन पर्वत में ढूँढ रहे हो, उसे रावण अपने विमान में बिठा कर लंका ले गया है। सीता की पुकार सुन कर मैं उसकी सहायता के लिये गया भी था, परन्तु उस महाबली राक्षस ने मुझे मार-मार कर मेरी यह दशा कर दी। वृद्धावस्था के कारण मैं उस पर पार नहीं पा सका। यह उसका धनुष और उसके बाण हैं। इधर कुछ उसके विमान का टूटा हुआ भाग पड़ा है। अब मेरा अन्तिम समय आ गया है। इसलिये मैं अधिक नहीं बोल पा रहा हूँ। मैं तुम्हारे पिता का मित्र हूँ, अतएव मेरे मरने पर तुम मेरा अन्तिम संस्कार कर देना।" इतना कह कर जटायु का गला रुँध गया, आँखें पथरा गईं और उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

जटायु के प्राणहीन रक्तरंजित शरीर को देख कर राम दुःखी होकर लक्ष्मण से बोले, "भैया! सचमुच मैं कितना अभागा हूँ। राज्य छिन गया, घर से निर्वासित हुआ, पिता का देहान्त हो गया, सीता का अपहरण हुआ और आज पिता के मित्र जटायु का भी मेरे कारण निधन हुआ। मेरे ही कारण इन्होंने अपने शरीर की बलि चढ़ा दी। इनके इस बलिदान से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। इनके मरने का मुझे बड़ा दुःख है। तुम जा कर लकड़ियाँ एकत्रित करो। मैं अपने हाथों से इनका दाह-संस्कार करूँगा। ये मेरे पिता के समान थे।" राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने लकड़ियाँ एकत्रित कीं। दोनों ने मिल कर चिता का निर्माण किया। राम ने पत्थरों को रगड़ कर अग्नि निकाली। फिर द्विज जटायु के शरीर को चिता पर रख कर बोले, "हे पूज्य गृद्धराज! जिस लोक को यज्ञ एवं अग्निहोत्र करने वाले, समरांगण में लड़ कर प्राण देने वाले और धर्मात्मा व्यक्ति जाते हैं, उसी लोक को आप प्रस्थान करें। आपकी कीर्ति इस संसार में सदैव अटल रहेगी।" यह कह कर उन्होंने चिता में अग्नि प्रज्वलित कर दी। थोड़ी ही देर में जटायु का नश्वर शरीर पंचभूतों में मिल गया। इसके पश्चात् दोनों भाइयों ने गोदावरी के तट पर जा कर दिवंगत जटायु को जलांजलि दी।

कबंध का वध: पक्षिराज जटायु को जलांजलि दे कर राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर चले क्योंकि अब उनको यह तो ज्ञात हो ही चुका था कि लंका का राजा रावण सीता को इसी दिशा में ले कर गया है। कुछ दूर आगे चल कर वे पगडंडी विहीन वन में पहुँचे। वृक्षों, झाड़ियों एवं लताओं ने आगे का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था। कठिनता से उसे पार कर वे क्रौंच नाम वन में पहुँचे। वह वन और भी सघन तथा अन्धकारमय जथा। उसकी सघनता तथा दुर्गमता को देख कर उन्होंने सोचा, सम्भव है रावण ने सीता को वहीं छिपा कर रखा हो, परन्तु बहुत खोजने पर भी जब कोई परिणाम नहीं निकला तो वे और आगे चले। इस वन को पार कर के मतंगाश्रम नामक वन में पहुँचे जो पिछले वन से भी अधिक भयानक और हिंसक पशुओं से पूर्ण था। घूमते-घूमते वे ऐसी पर्वत कन्दरा पर पहुँचे तो पाताल की भाँति गहरी और इतनी अन्धकारपूर्ण थी कि हाथ को हाथ नहीं सूझता था। उस विशाल कन्दरा के मुख पर एक अत्यन्त मलिन, लम्बे पेट वाली, बड़े-बड़े दाँतों और बिखरे केश वाली, मलिनमुखी राक्षसिनी बैठी हुई हड्डी चबा रही थी। राम लक्ष्मण को देख कर वह अट्टहास करती हुई दौड़ी और लक्ष्मण से लिपट कर बोली, मेरा नाम अयोमुखी है। मैं बहुत दिनों से किसी सुन्दर युवक की प्रतीक्षा कर रही थी अब तुम आ गये। चलो, मेरे साथ विहार करो।"

उसकी इस कुचेष्टा से क्रुद्ध हो कर लक्ष्मण ने अपनी म्यान से तलवार निकाली और उसके नाक, कान तथा उरोज काट डाले। उसके सारे शरीर पर रक्त की धाराएँ बहने लगीं और वह चीत्कार करती हुई वहाँ से भाग गई। अयोमुखी के भाग जाने के पश्चात् दोनों भाई थोड़ी दूर गये थे कि उन्हें एक भयंकर स्वर सुनाई दिया जिसकी गर्जना से सम्पूर्ण पृथ्वी और आकाश काँपते हुये प्रतीत हो रहे थे। इससे सावधान हो कर दोनों भाइयों ने तलवार निकाल कर उस दिशा में पग बढ़ाये जिधर से वह भयंकर गर्जना आ रही थी। उन्होंने गज के आकार वाले बिना गर्दन के कबंध राक्षस को देखा। उसका मुख और आँखें उसके वक्ष पर चमक रही थीं। वह दोनों मुट्ठियों में वन के जन्तुओं को पकड़े इनका मार्ग रोके खड़ा था। राम-लक्ष्मण को देखते ही उसने लपक कर दोनों को अपनी भुजाओं में दबा लिया और बोला, "बड़े भाग्य से आज ऐसा सुन्दर भोजन मिला है। तुम दोनों को खा कर मैं अपनी क्षुधा शान्त करूँगा।" इस आकस्मिक आक्रमण से लक्ष्मण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये, परन्तु रामचन्द्र ने बड़ी फुर्ती से उस राक्षस की दोनों भुजाएँ काट डालीं। वह चीत्कार करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। पृथ्वी पर पड़े हुये वह बोला, "हे पुरुष श्रेष्ठ! आपने राक्षस योनि से मुझे मुक्ति दिला कर मेरा बड़ा उपकार किया है। इन्द्र ने मुझे पहले ही बता दिया था कि आपके हाथों से मुझे सद्गति प्राप्त होगी। अब आप मुझ पर इतनी कृपा और करना कि अपने हाथों से मेरा दाह-संस्कार कर देना।"

कबंध की प्रार्थना सुन कर राम बोले, "हे राक्षसराज! मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा। मैं तुमसे कुछ सूचना प्राप्त करना चाहता हूँ। आशा है अवश्य दोगे। दण्डक वन से मेरी अनुपस्थिति में लंकापति रावण मेरी पत्नी का अपहरण कर के ले गया है। मैं उसके बल, पराक्रम, स्थान आदि के विषय में तुमसे पूरी जानकारी चाहता हूँ। यदि जानते हो तो बताओ।" राम का प्रश्न सुन कर कबंध बोला, "हे नरश्रेष्ठ! रावण बड़ा बलवान और शक्तिशाली नरेश है। उससे देव-दानव सभी भयभीत रहते हैं। उस पर विजय प्राप्त करने के लिये आपको नीति का सहारा लेना होगा। आप ऐसा कीजिये कि यहाँ से पम्पा सरोवर चले जाइये। वहाँ ऋष्यमूक पर्वत पर वानरों का राजा सुग्रीव अपने चार वीर वानरों के साथ निवास करता है। वह अत्यन्त वीर, पराक्रमी, तेजस्वी, बुद्धिमान, धीर और नीतिनिपुण है। उसके पास एक विशाल पराक्रमी सेना भी है जिसकी सहायता से आप रावण पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। उसके ज्येष्ठ भ्राता बालि ने उसके राज्य और उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया है। यदि आप उसे मित्र बना सकें तो आपका कार्य सिद्ध हो जायेगा। वह राक्षसों के सब स्थानों को जानता और उनकी मायावी चालों को भी समझता है। उसे भी इस समय एक सच्चे पराक्रमी मित्र की आवश्यकता है। आपका मित्र बन जाने पर वह अपने वानरों को भेज कर सीता की खोज करा देगा। साथ ही सीता को वापस दिलाने में भी आपकी सहायता करेगा।" इतना कह कर कबंध ने अपने प्राण त्याग दिये। रामचन्द्र उसका अन्तिम संस्कार कर के लक्ष्मण सहित पम्पासर की ओर चले। पम्पासर के निकट उन्होंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें दोनों भाइयों ने स्नान किया।

शबरी का आश्रम: स्नान करने के पश्चात् अपनी क्लान्ति मिटा कर दोनों भाई सुग्रीव से मिलने के उद्देश्य से पम्पासर के पश्चिम तट के निकट पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक सुन्दर, स्वच्छ एवं रमणीक आश्रम देखा। वह शबरी नामक भीलनी का आश्रम था। उसने राम-लक्ष्मण को उधर से निकलते देख उनका स्वागत किया और आदरपूर्वक उन्हें अपने आश्रम में ले आई। उनके चरण स्पर्श कर उनका यथोचित सत्कार और पूजन किया। इससे प्रसन्न हो आसन पर बैठ रामचन्द्र जी बोले, "हे तपस्विनी! तुम्हारी तपस्या में किसी प्रकार की कोई विघ्न-बाधा तो नहीं पड़ती? कोई राक्षस आदि तुम्हें कष्ट तो नहीं देते?" राम के स्नेह भरे शब्द सुन कर वृद्धा शबरी हाथ जोड़ कर बोली, "हे प्रभो! आपके दर्शन पा कर मेरी सम्पूर्ण तपस्या सफल हो गई। मेरे गुरुदेव तो उसी दिन बैकुण्ठवासी हो गये थे जिस दिन आप चित्रकूट में पधारे थे। उन्होंने अपने अन्तिम समय में आपके विषय में मुझे बताया था। तभी से मैं आपके स्वागत के लिये इस वन के मीठे और स्वादिष्ट फल छाँट-छाँट कर एकत्रित करती रही हूँ। कृपया इन्हें ग्रहण कर के मुझे कृतार्थ करें।"

शबरी ने जो फल प्रेम और श्रद्धा से एकत्रित किये थे, उन्हें राम ने बड़े प्रेम से स्वीकार किया। वे एक-एक बेर खते जाते थे और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते जाते थे। जब वे स्वाद ले-ले कर सब बेर खा चुके तो शबरी ने उन्हें बताया, "हे राम! यह सामने जो सघन वन दिखाई देता है, मातंग वन है। मेरे गुरुओं ने एक बार यहाँ बड़ा भारी यज्ञ किया था। यद्यपि इस यज्ञ को हुये अनेक वर्ष हो गये हैं, फिर भी अभी तक सुगन्धित धुएँ से सम्पूर्ण वातावरण सुगन्धित हो रहा है। यज्ञ के पात्र भी अभी यथास्थान रखे हुये हैं। हे प्रभो! मैंने अपने जीवन की सभी धार्मिक मनोकामनाएँ पूरी कर ली हैं। केवल आपके दर्शनों की अभिलाषा शेष थी, वह आज पूरी हो गई। अब आप मुझे अनुमति दें कि मैं इस नश्वर शरीर का परित्याग कर के वहीं चली जाऊँ जहाँ मेरे गुरुदेव गये हैं।" शबरी की अदम्य शक्ति और श्रद्धा देख कर राम ने कहा, "हे परम तपस्विनी! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। मैं भी प्रार्थना करता हूँ कि परमात्मा तुम्हारी मनोकामना पूरी करें।" रामचन्द्र जी का आशीर्वाद पा कर शबरी ने समाधि लगाई और इस प्रकार अपने प्राण विसर्जित कर दिये। इसके पश्चात् शबरी का अन्तिम संस्कार कर के दोनों भाई पम्पा सरोवर पहुँचे। निकट ही पम्पा नदी बह रही थी जिसके तट पर नाना प्रकार के वृक्ष पुष्पों एवं पल्लवों से शोभायमान हो रहे थे। स्थान की शोभा को देख कर राम अपना सारा शोक भूल गये। वे सुग्रीव से मिलने की इच्छा को मन में लिये पम्पा के किनारे-किनारे पुरी की ओर चलने लगे।

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