सोमवार, 18 मई 2009

वनवास को प्रस्थान

राम ने अपने पिता दशरथ एवं माता कैकेयी के चरणस्पर्श किये। राम को देखकर महाराज ने एक दीर्घ श्‍वास लेकर केवल "हे राम!" कहा और अत्यधिक निराश होने के कारण चुप हो गये। उनके नेत्र अश्रुजल से परिपूरित हो गये। राम ने कैकेयी से विनम्र स्वर में पूछा, "माता! पिताजी की ऐसी दशा का क्या कारण है? क्या वे मुझसे अप्रसन्न हैं? यदि वे मुझसे अप्रसन्न हैं तो मैं क्षणमात्र भी नहीं जीना चाहता।" कैकेयी ने कहा, "वत्स! महाराज तुमसे अप्रसन्न तो हो ही नहीं सकते। हाँ, किंतु इनके हृदय में एक विचार उठा है जो कि तुम्हारे विरुद्ध है इसीलिये ये तुमसे संकोचवश कह नहीं पा रहे हैं। बात यह है कि देवासुर संग्राम के समय इन्होंने मुझे दो वर देने का वचन दिया था। अवसर पाकर आज मैंने इनसे वे दोनों वर माँग लिये। अब तुम्हारी सहायता के बिना तुम्हारे पिता की प्रतिज्ञा का निर्वाह होना असंभव है। यदि तुम प्रतिज्ञा करोगे कि जो कुछ मैं कहूँगी, उसका तुम अवश्य पालन करोगे तो मैं तुम्हें उन वरदानों के विषय में अवगत करा सकती हूँ।" माता के वचन सुनकर राम बोले, "हे माता! पिता की आज्ञा से मैं अपने प्राणोत्सर्ग भी सकता हूँ। मैं आपके चरणों की सौगन्ध खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके वचनों का अवश्य पालन करूँगा।"

इस प्रकार राम से प्रतिज्ञा करवाने एवं सन्तुष्ट होने पर कैकेयी ने कहा, "वत्स! मैंने पहले वर से भरत के लिये अयोध्या का राज्य और दूसरे से तुम्हारे लिये चौदह वर्ष का वनवास माँगा है। अब तुम अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तत्काल वक्कल धारण करके वन को प्रस्थान करो। तुम्हारे मोह के कारण महाराज दुःखी हो रहे हैं अतः तुम्हारे जाने के पश्चात् ही भरत का राज्याभिषेक होगा।। मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम अपनी प्रतिज्ञा का पालन करके राजा को पापरूपी सागर से अवश्य मुक्ति दिलाओगे।" कैकेयी के वचनों को राम ने दुःख और शोक से रहित होकर सुना और मधुर मुस्कान के साथ बोले, "माता! बस इस छोटी सी बात के लिये ही आप और पिताजी इतने परेशान हो रहे हैं? मैं अभी ही वन को चला जाता हूँ। यही मेरी सत्य प्रतिज्ञा है।" महाराज दशरथ, जो राम और कैकेयी के इस संवाद को सुन रहे थे, एक बार फिर मूर्छित हो गये। राम न मूर्छित पिता और कैकेयी के चरणों में मस्तक नवाया और चुपचाप उस प्रकोष्ठ से बाहर चले गये।

महाराज एवं माता कैकेयी के प्रकोष्ठ से राम अपनी माता कौशल्या के पास पहुँचे। वहाँ पर अनुज लक्ष्मण पहले से ही उपस्थित थे। माता का चरणस्पर्श करके राम ने कहा, "हे माता! माता कैकेयी के द्वारा दो वर माँगने पर पिताजी ने भाई भरत को अयोध्या का राज्य और मुझे चौदह वर्ष का वनवास दिया है। मैं वन के लिये प्रस्थान कर रहा हूँ। विदा होने के पूर्व आप मुझे आशीर्वाद दीजिये।" इन हृदय विदारक वचनों को सुनकर कौशल्या मूर्छित हो गईं। राम के द्वारा किये गये यथोचित उपचार से मूर्छा भंग होने पर वे विलाप करने लगीँ। माता कौशल्या का विलाप सुन कर लक्ष्मण बोले, "माता! मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि गुरुजनों का सदा सम्मान तथा उनकी आज्ञापालन करने वाले मेरे देवता तुल्य भाई को किस अपराध में यह दण्ड दिया गया है? प्रतीत होता है कि वृद्धावस्था ने पिताजी की बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। बड़े भैया को उनकी इस अनुचित आज्ञा का पालन न करके निष्कंटक राज्य करना चाहिये। मैं उन लोगों को तत्काल कुचल दूँगा जो राम के विरुद्ध सिर उठायेंगे। आखिर राम का अपराध क्या है? उनकी नम्रता और सहनशीलता? मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि राम के राजा बनने में भरत या उनके पक्षपाती बनेंगे तो मैं उन्हें उसी क्षण यमलोक भेज दूँगा। जिस प्रकार से सूर्य अन्धकार को मिटा देता है, मैं भी उसी प्रकार आपके दुःखों को दूर कर दूँगा।" 

लक्ष्मण के शब्दों से माता कौशल्या को सहारा मिला और उन्होंने कहा, "राम! तुम्हारे छोटे भाई लक्ष्मण का कथन सत्य है तुम मुझे इस प्रकार बिलखता छोड़कर वन के लिये प्रस्थान नहीं कर सकते। यदि पिता की आज्ञा का पालन करना धर्म है तो माता की आज्ञा का पालन करना भी धर्म ही है। मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि अयोध्या में रहकर मेरी सेवा करो।" उत्तेजित माता को धैर्य बँधाते हुये राम बोले, "माता! आज आप कैसे वचन कह रही हैं? आप इतनी दुर्बल कैसे हो गईं? आपने ही तो मुझे बचपन से पिता की आज्ञा का पालन करने की शिक्षा दी है। मेरी सुख सुविधा के लिये अपनी ही दी हुई शिक्षा को मत झुठलाइये। एक पत्नी के नाते भी आपका कर्तव्य है कि आप अपने पति की इच्छा के समक्ष बाधा न बनें। आप अच्छी तरह से जानती हैं कि चाहे सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी अपने अटल नियमों से टल जायें, पर राम के लिये पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि आप प्रसन्न होकर मुझे वन जाने की आज्ञा प्रदान करें ताकि मुझे यह सन्तोष रहे कि मैंने माता और पिता दोनों ही की आज्ञा का पालन किया है।" फिर उन्होंने लक्ष्मण को सम्बोधित करते हुये कहा, "लक्ष्मण! तुम्हारे साहस, पराक्रम, शौर्य और वीरता पर मुझे गर्व है। मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे अत्यंत स्नेह करते हो किन्तु धर्म का स्थान सबसे ऊपर है। पिता की आज्ञा की अवहेलना करके मुझे पाप, नरक और अपयश का भागी बनना पड़ेगा। इसलिये हे भाई! तुम क्रोध और क्षोभ का परित्याग करो और मेरे वन गमन में बाधक मत बनो।"

राम के दृढ़ निश्चय को देखकर अपने आँसुओं को पोंछती हुई कौशल्या बोलीं, "वत्स! तुम्हें वन जाने की आज्ञा देते हुये मेरा हृदय चूर-चूर हो रहा है। यदि मुझे भी अपने साथ ले चलने की प्रतिज्ञा करो तो मैं तुम्हें वन जाने की आज्ञा दे सकती हूँ।" उनके वचन सुनकर राम ने संयमपूर्वक कहा, "माता! पिताजी को आपके प्रेमपूर्ण सहारे की आवश्यकता है क्योंकि वे इस समय अत्यन्त दुःखी हैं। यदि ऐसे समय में आप भी उन्हें छोड़ कर चली जायेंगी तो उनकी मृत्यु में किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जायेगा। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उन्हें मृत्यु के मुख में छोड़कर आप पाप की भागी न बनें। उनके जीवित रहते तक उनकी सेवा करना आपका पवित्र कर्तव्य है। आप मोह को त्याग दें और मुझे वन जाने की आज्ञा दें। मुझे प्रसन्नतापूर्वक विदा करें, मैं वचन देता हूँ कि चौदह वर्ष की अवधि बीतते ही मैं लौटकर आपके दर्शन करूँगा।" धर्मपरायण राम के युक्तियुक्त वचनों को सुनकर अश्रुपूरित माता कौशल्या ने कहा, "अच्छा वत्स! मैं तुम्हें वनगमन की आज्ञा प्रदान करती हूँ। परमात्मा तुम्हारे वनगमन को मंगलमय करें।" फिर माता ने तत्काल ब्राह्मणों से हवन कराया और राम को हृदय से आशीर्वाद देते हुये विदा किया।

सीता और लक्ष्मण का अनुग्रह: माता कौशल्या से विदा लेने के पश्चात् राम अपनी पत्नी जनकनन्दिनी सीता के कक्ष में पहुँचे। वे राजसी चिह्नों से पूर्णतः विहीन थे। राम को अपने कक्ष में आते देख सीता ने पूछा, "हे आर्यपुत्र! आज आपके राज्याभिषेक का दिन है फिर आप राजसी चिह्नों से विहीन क्यों हैं?" गंभीर किन्तु शान्त वाणी में राम ने सीता के समक्ष समस्त घटनाओं का वर्णन किया और कहा, "प्रिये! मैं तत्काल ही वक्कल धारण करके वन के लिये प्रस्थान करना चाहता हूँ इसलिये मैं तुमसे विदा माँगने आया हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे जाने के बाद तुम अपने मृदु स्वभाव तथा सेवा सुश्रूषा से माता-पिता तथा भरत सहित समस्त परिजनों को प्रसन्न और सन्तुष्ट रखना। तुम अब तक मेरी प्रत्येक बात श्रद्धापूर्वक मानती आई हो मैं चाहता हूँ कि आगे भी मेरी इच्छानुसार तुम यहाँ रहकर अपने कर्तव्य का पालन करो।"

सीता बोलीं, "प्राणनाथ! शास्त्रों के अनुसार पत्नी अर्द्धांगिनी होती है। मेरा तात्पर्य यह है कि केवल आपको ही नहीं मुझे भी वनवास की आज्ञा मिली है। कोई विधान नहीं कहता कि पुरुष का आधा अंग वन में रहे और आधा अंग घर में. हे नाथ! स्त्री की गति तो उसके पति के साथ ही होती है, इसलिये मैं भी आपके साथ वन चलूँगी। वहाँ मैं आपके साथ रहकर आपके चरणों के सेवा करके अपना कर्तव्य निबाहूँगी। पति की सेवा करके पत्नी को जो अपूर्व सुख प्राप्त होता है है वह सुख इस लोक में तो क्या परलोक में भी प्राप्त नहीं हो सकता। पति ही पत्नी के लिये परमेश्वर होता है। यदि आप कन्द-मूल-फलादि से अपनी उदर पूर्ति करेंगे तो मैं भी वैसे ही अपनी क्षुधा शांत करूँगी। आपसे विलग होकर स्वर्ग का सुख-वैभव भी मैं स्वीकार नहीं कर सकती। यदि आप मेरी इस विनय और प्रार्थना की उपेक्षा करके मुझे अयोध्या में छोड़ जायेंगे तो उसी क्षण मैं अपना प्राणत्याग दूँगी जिस क्षण आप वन के लिये प्रस्थान करेंगे। यही मेरी प्रतिज्ञा है।"

वन में होने वाले कष्टों को ध्यान में रख के राम अपने साथ सीता को वन में नहीं ले जाना चाहते थे। इसलिये वे उन्हें समझाने का प्रयत्न करने लगे किन्तु जितना वे प्रयत्न करते थे सीता उतनी ही अधिक हठ करने लगतीं। किसी भी प्रकार से समझाने बुझाने का प्रयास करने पर वे अनेक प्रकार के शास्त्र सम्मत तर्क करने लगतीं और उनके प्रयास को विफल करती जातीं। उनकी इस दृढ़ता के सामने राम का प्रत्येक प्रयास विफल हो गया और अन्त में उन्हें सीता को अपने साथ वन ले जाने की आज्ञा देने के लिये विवश होना पड़ा। लक्ष्मण ने भी सीता की तरह राम के साथ वन में जाने के लिये बहुत अनुग्रह किया। राम के द्वारा बहुत प्रकार से समझाने के बाद भी लक्ष्मण उनके साथ जाने के विचार पर दृढ़ रहे। अन्ततः राम को लक्ष्मण की दृढ़ता, स्नेह तथा अनुग्रह के सामने झुकना पड़ा एवं लक्ष्मण को भी साथ जाने की अनुमति देनी ही पड़ी। सीता और लक्ष्मण ने कौशल्या तथा सुमित्रा दोनों माताओं से आज्ञा लेने बाद, अनुनय विनय करके महाराज दशरथ से भी वन जाने की अनुमति देने के लिये मना लिया। उसके पश्चात् लक्ष्मण शीघ्र आचार्य के पास पहुँचे और उनसे समस्त अस्त्र-शस्त्रादि लेकर राम के पास उपस्थित हो गये। लक्ष्मण के आने पर राम ने कहा, "भाई! वन के लिये प्रस्थान करने के पूर्व मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति ब्राह्मणों, दास दासियों तथा याचकों में वितरित करना चाहता हूँ इसलिये तुम गुरु वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र को बुला लाओ।"

वन के लिए प्रस्थान: अपने अग्रज राम की आज्ञानुसार लक्ष्मण गुरु वशिष्ठ जी के पुत्र सुयज्ञ को अपने साथ ले आये। राम ने जनकनन्दिनी सीता के साथ अत्यंत श्रद्धा के साथ उनकी प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करने के पश्चात् उन्होंने अपने स्वर्ण कुण्डल, बाजूबन्द, कड़े, मालाएँ तथा रत्नजटित अन्य आभूषणों को उन्हें देते हुये कहा, "हे मित्र! जनककुमारी सीता भी मेरे साथ वन को जा रही हैं। इसलिये ये अपने कंगन, मुक्तमाला-किंकणी, हीरे, मोती, रत्नादि समस्त आभूषण आपकी पत्नी को दान करना चाहती हैं। आप इन आभूषणों को सीता की ओर से उन्हें आदर तथा नम्रता के साथ समर्पित कर देना। मेरा यह स्वर्णजटित पलंग अब मेरे लिये किसी काम का नहीं है अतः इसे भी आप ले जाइये। मेरे मातुल ने अत्यंत स्नेह के साथ मुझे यह हाथी दिया था, इसे भी सहस्त्र स्वर्णमुद्राओं के साथ आप स्वीकार करें।"

राम के वनगमन की बात सुनकर सुयज्ञ के नेत्रों अश्रु भर आये। सजल नेत्रों के साथ राम के द्वारा प्रदान की गई वस्तुओं को ग्रहण करके उन्होंने आशीर्वाद दिया, "हे राम! तुम चिरजीवी होओ। तुम्हारा चौदह वर्ष का वनवास तुम्हारे लिये निष्कंटक और कीर्तिदायक हो। वनवास समाप्त करके लौटने पर तुम्हें अयोध्या का राज्य पुनः प्राप्त हो।" इस प्रकार आशीर्वाद देकर गुरुपुत्र सुयज्ञ विदा हुये। उसके बाद राम ने अपने सेवकों को, जो कि राम के वनवास से दुखी होकर रो रहे थे, बहुत सारा धन दान में दिया और सान्त्वना देते हुये बोले, "तुम लोग यहीं रहकर महाराज, माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, भरत, शत्रुघ्न एवं अन्य गुरुजनों की तन मन लगाकर सेवा करना। सदैव इस बात का ध्यान रखना कि उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो।" फिर राम ने अपनी समस्त व्यक्तिगत सम्पत्ति को मंगवाकर सीता के हाथों से उसे गरीब, दुःखी, दीन-दरिद्रों में बँटवा दिया। इस बात की चर्चा सारे नगर में दावानल की भाँति फैल गई कि राम और सीता के द्वारा मुक्त हस्त से दान दिया जा रहा है। उस काल में अयोध्या के समीपवर्ती एक ग्राम में गर्गगोत्री त्रिजटा नामक एक तपस्वी ब्राह्मण निवास करता था। वह अत्यन्त दरिद्र था तथा उनकी बहुत सी सन्तानें थीं। इसी कारण से उसे अपनी गृहस्थी का पालन पोषण करने में अत्यंत कठिनाई होती थी। राम के द्वारा किये जाने वाले दान की चर्चा सुनकर उसकी पत्नी ने उनसे से कहा, "हे स्वामी! आपको भी ज्ञात हुआ होगा कि अयोध्या के ज्येष्ठ राजकुमार श्री रामचन्द्रजी अपना सर्वस्व दान में वितरित कर रहे हैं। आप भी उनके पास जाकर याचना करें। हमारी निर्धनता और दरिद्रता से तथा आपकी याचना से द्रवित होकर दयालु राम हम पर भी अवश्य ही दया करेंगे और इस दरिद्रता से हमारा उद्धार कर देंगे।"

तपस्वी त्रिजटा याचना में रुचि नहीं रखते थे किंतु पत्नी के बार-बार प्रेरित किये जाने पर विवश होकर वे श्री राम के दरबार की ओर चल पड़े और शीघ्रातिशीघ्र एक के बाद एक पाँच ड्यौढ़ियाँ पार करके राम के समक्ष जा पहुँचे। उनकी तपस्याजनित तेज और ओज प्रभावित होकर राम बोले, "हे तपस्वी! हे ब्राह्मण देवता! आपका हृदय तीव्र गति से स्पंदित हो रहा है और शुभ्रभाल पर स्वेद कण झलक रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि आप बड़ी दूर से तीव्र गति के साथ आ रहे हैं। आपकी वेषभूषा आपके धन का अभाव का परिचायक है। अतः आपने अपने हाथ में जो दण्ड रखा है उसे आप अपने पूर्ण बल के साथ फेंकिये। जहाँ पर जाकर वह दण्ड गिरेगा, आपके खड़े होने से उस स्थान तक जितनी गौएँ खड़ी हो सकेंगी, मैं आपको अर्पित कर दूँगा और उन गौओं के भरण पोषण के लिये भी पर्याप्त साधन जुटा दूँगा।" इस आदेश को सुनकर त्रिजटा ने अपना पूरा बल लगाकर दण्ड फेंका। दण्ड सरयू नदी के दूसरी पर जाकर गिरा। राम ने उसके बल की सराहना की तथा उसे अपनी प्रतिज्ञानुसार गौएँ दान में दीं। उनको विदा करने के पूर्व स्वर्ण, मोती, मुद्राएँ, वस्त्रादि भी दान में दिया। अपनी असंख्य धनराशि को दान में देकर सबको सन्तुष्ट करने के पश्चात् वे सीता और लक्ष्मण के साथ पिता के दर्शनों के लिये चले गये।

महाराज की आज्ञानुसार सुमन्त रथ ले आये। राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों का यथोचित अभिवादन किया और रथ पर चढ़कर चलने को उद्यत हुये। सुमन्त के द्वारा अश्वों की रास सम्भालकर रथ हाँकना आरम्भ करते ही अयोध्या के लाखों नागरिक 'हा राम! हा राम!!' कहते हुये उस रथ के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया। दशरथ की गति तेज हो जाने पर नगर निवासी रथ के साथ-साथ दौड़ पाने में असमर्थ हो गये तो वे उच्च स्वर में चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगे, "रथ को रोको, हम राम के दर्शन करना चाहते हैं। भगवान ही जानते हैं कि अब फिर कब हम इनके दर्शन कर पायेंगे।" राजा दशरथ भी कैकेयी के प्रकोष्ठ से निकल कर'हे राम! हे राम!!' कहते हुये विक्षिप्त की भाँति रथ के पीछे दौड़ रहे थे। हाँफते हुये महाराज को रथ के पीछे दौड़ते देखकर सुमन्त ने रथ को रोका और बोले, "हे पृथ्वीपति! रुक जाइये। इस प्रकार राम, सीता और लक्ष्मण के पीछे मत दौड़िये। ऐसा करना पाप है। आपकी आज्ञा से ही तो राम वनगमन कर रहे हैं, इसलिये उन्हें रोकना सर्वथा अनुचित तथा व्यर्थ है।" सुमन्त के वचन सुन महाराज वहीं रुक गये। इसके बाद रथ तीव्र गति से आगे बढ़ गया किंतु प्रजाजन रोते बिलखते उसके पीछे ही दौड़ते रहे। चित्रलिखित से खड़े महाराज उस रथ को तब तक एकटक निहारते रहे जब तक रथ की धूलि दृष्टिगत होती रही। धूलि दिखना बन्द हो जाने पर वे वहीं 'हा राम! हा लक्ष्मण!!' कहकर भूमि पर गिर पड़े और मूर्छा को प्राप्त हो गये। वहाँ पर उपस्थित मन्त्रियों ने तत्काल उन्हें उठाकर एक स्थान पर लिटाया। मूर्छा भंग होने पर मृतप्राय से महाराज धीरे-धीरे अस्फुट स्वर में कहने लगे, "सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मैं सबसे बड़ा अभागा व्यक्ति हूँ जिसके दो-दो पुत्र एक साथ वृद्ध पिता को बिलखता छोड़कर वन को चले गये। अब मेरा जीवन व्यर्थ है। " फिर वे मन्त्रियों से बोले, "मैं महारानी कौशल्या के महल में जाना चाहता हूँ। मेरा शेष जीवन वहीं व्यतीत होगा क्योंकि अब वहाँ के अतिरिक्त मुझे अन्यत्र कहीं भी शान्ति नहीं मिल पायेगी। कौशल्या के महल में महाराज पुनः राम और लक्ष्मण के वियोग के कारण मूर्छित हो गये। उनकी दशा देखकर महारानी कौशल्या विलाप करने लगीं। कौशल्या के विलाप को सुनकर महारानी सुमित्रा भी वहाँ आ गईं और उनको अनेक प्रकार से समझाकर शान्त किया। फिर दोनों रानियाँ महाराज दशरथ की मूर्छा दूर करने का प्रयास करने लगीं।

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