19 मई 2009

रामायण-19: रावण को सूचना एवं शूर्पणखा द्वारा रावण को धिक्कारना

खर के एक सैनिक अकम्पन ने रावण के दरबार में जाकर खर की सेना के नष्ट हो जाने की सूचना दी। वह हाथ जोड़ कर बोला, "हे लंकापति! दण्डकारण्य में रहने वाले आपके भाई खर और दूषण अपने चौदह सहस्त्र सैनिकों सहित युद्ध में मारे गये। मैं बड़ी कठिनता से बच कर आपको सूचना देने के लिये आया हूँ।" यह सुन कर रावण को बड़ा दुःख हुआ साथ ही भारी क्रोध भर आया। उन्होंने कहा, "मेरे भाइयों को सेना सहित मार डालने वाला कौन है? मैं अभी उसे नष्ट कर दूँगा। तुम मुझे पूरा वतान्त सुनाओ।"

रावण की आज्ञा पाकर अकम्पन ने कहा, "प्रभो! यह सब अयोध्या के राजकुमार राम ने किया है। उसने अकेले ही सब राक्षस वीरों को मृत्यु के घाट उतार दिया।" रावण ने आश्चर्य से पूछा, " क्या राम ने देवताओं से सहायता प्राप्त कर के खर को मारा है?" अकम्पन ने उत्तर दिया, "नहीं प्रभो! ऐसा उसने अकेले ही किया है। वास्तव में राम तेजस्वी, बलवान और युद्ध विशारद योद्धा है। मैंने राम को अपनी आँखों से राक्षस सेना का विनाश करते देखा है। जिस खर की एक गर्जना से सारे देवता काँप जाते थे, उस रणबाँकुरे को उनकी शक्तिशाली सेना सहित उसने आनन-फानन में समाप्त कर दिया। उसका रणकौशल देख कर मुझे ऐसा आभास होता है कि आप अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ युद्ध करके भी उसे परास्त नहीं कर सकेंगे। उस पर विजय पाने का मेरी दृष्टि में एक ही उपाय है। उसके साथ उसकी पत्नी है जो अत्यन्त रूपवती, लावण्यमयी और सुकुमारी है। राम उससे बहुत प्रेम करता है। इसलिये वह उसे अपने साथ वन में लिये फिरता है। तात्पर्य यह है कि वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। मेरा विश्वास है, यदि आप किसी प्रकार उसका अपहरण कर के ले आयें तो राम उसके वियोग में घुल-घुल कर मर जायेगा। और यह समस्या अपने आप ही सुलझ जायेगी। आपको समरभूमि में व्यर्थ का रक्तपात भी नहीं करना पड़ेगा।"

लंकापति रावण को अकम्पन का यह प्रस्ताव सर्वथा उचित प्रतीत हुआ। उसने इस विषय में अधिक सोच विचार करना या अपने मन्त्रियों से परामर्श करना भी उचित नहीं समझा। वह तत्काल अपने दिव्य रथ पर सवार हो आकाश मार्ग से उड़ता हुआ सागर पार कर के मारीच के पास पहुँचा। मारीच रावण का परम मित्र था। सहसा अपने घनिष्ठ मित्र को अपने सम्मुख पाकर मारीच बोले, "हे लंकेश! आज अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के आपके यहाँ आने का क्या कारण है? आप जो इतनी हड़बड़ी में आये हैं, उससे मेरे मन में नाना प्रकार की शंकाएँ उठ रही हैं। लंका में सब कुशल तो है? परिवार के सब सदस्य आनन्द से तो हैं? अपने आने का कारण शीघ्र बता कर मेरी शंका को दूर कीजिये। मेरे मन में अनेक अशुभ आशंकाएँ उठ रही हैं।" मारीच के वचनों को सुन कर रावण ने कहा, "यहाँ आने का कारण तो विशेष ही है। अयोध्या के राजकुमार राम ने मेरे भाई खर और दूषण को उनकी सेना सहित मार कर अरण्य वन के मेरे जनस्थान को उजाड़ दिया है। इसी से दुःखी हो कर मैं तुम्हारी सहायता लेने के लिये आया हूँ। मैं चाहता हूँ कि राम की पत्नी का अपहरण कर के मैं लंका ले जाऊँ। इसमें मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। सीता के वियोग में राम बिना युद्ध किये ही तड़प-तड़प कर मर जायेगा और इस प्रकार मेरा प्रतिशोध पूरा हो जायेगा।" रावण के वचन सुन कर मारीच बोला, "हे रावण! तुम्हारा यह विचार सर्वथा अनुचित है। जिसने तुम्हें सीताहरण का सुझाव दिया है वह वास्तव में तुम्हारा मित्र नहीं शत्रु है। तुम राम से किसी प्रकार भी जीत नहीं सकोगे। राम के होते हुये तुम उससे सीता को नहीं छीन सकोगे। उसके अदभुत पराक्रम के सम्मुख तुम एक क्षण भी नहीं ठहर सकोगे। तुम्हारा हित इसी में है कि तुम इस विचार का परित्याग कर चुपचाप लंका में जा कर बैठ जाओ।" मारीच के उत्तर से निराश हो रावण लंका लौट आया।

रावण को शूर्पणखा का धिक्कार: रावण के मारीच के पास से लंका लौटने के कुछ काल पश्चात् शूर्पणखा वहाँ आ पहिँची। उसने देखा, रावण चारों ओर से मन्त्रियों से घिरा हुआ स्वर्ण के सिंहासन पर बैठा ऐसी शोभा पार रहा था जैसे स्वर्ण की वेदी में घी प्रज्वलित अग्नि। जिसने समुद्रों तथा पर्वतों पर विजय प्राप्त की है, नागराज वासुकी को परास्त कर तक्षक की प्रिय पत्नी का हरण किया है, कुबेर को जीत कर उससे पुष्पक विमान छीना है, इन्द्रादि देवता जिससे भयभीत रहते हैं, वायु देवता जिस पर पंखा डुलाते हैं, वरुण जिसके यहाँ पानी भरता है और जो मृत्यु को भी परास्त करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसे परमप्रतापी भाई की बहन होकर मैं नाक-कान कटवा कर अपमान का विष पियूँ, धिक्कार है ऐसी वीरता और पराक्रम पर। यह सोचते हुये उसका सम्पूर्ण शरीर क्रोध और अपमान की ज्वाला ले जलने लगा। वह रावण के पास आ कर क्रोध से फुँफकारती हुई बोली, "धिक्कार है तुम पर, तुम्हारे शौर्य पर और तुम्हारे इन मन्त्रियों पर। तुम संसार से इतने अनजान होकर अपनी विलासिता में डूबे हुये हो कि तुम्हें यह भी पता नहीं कि तुम्हारी ओर तुम्हारा काल बढ़ा चला आ रहा है। हे नीतिवान रावण! क्या मुझे तुमको यह बताने की आवश्यकता है कि समय पर उचित कार्य न करने वाले और अपने देश की रक्षा के प्रति असावधा रहने वाले राजा का राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जिस राजा के गुप्तचर सक्रिय और सतर्क नहीं होते, वह वास्तव में राज्य करने योग्य नहीं होता। क्योंकि गुप्तचर ही उसके नेत्र होते हैं। उनके बिना वह अंधा होता हे। मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे गुप्तचर मूर्ख, अयोग्य और आलसी हैं। मन्त्री भी सर्वथा अयोग्य हैं जो उन्हें अभी तक यह पता नहीं कि उनके राज्य दण्डकारण्य में कितनी भयंकर घटना घट चुकी है। चौदह सहस्त्र राक्षसों का मेरे वीर भ्राताओं खर-दूषण सहित संहार हो चुका है। तुम्हारी बहन के नाक-कान एक विदेशी ने काट लिये हैं। परन्तु सुरा और सुन्दरियों में व्यस्त रहने वाले तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियों को इस सबकी क्या चिन्ता है? जो ऋषि मुनि कल तुम्हारे नाम से थर-थर काँपते थे वे आज सिर उठा कर निर्भय हो घूम रहे हैं। तुम्हें अब भी सोचना चाहिये कि वृक्ष से गिरे हुये पत्ते और राज्य से च्युत राजा का कोई मूल्य नहीं होता। जो राजा आँखों से सोता और नीति से जागता है, जिसका क्रोध प्रलयंकर और प्रसन्नता सुखदायिनी है, प्रजा उसी की पूजा करती है। किन्तु तुम में तो एक भी गुण नहीं है जो तुम राम द्वारा किये गये भीषण हत्याकाण्ड से अभी तक अपरिचित हो।"

शूर्पणखा के कटु वाक्य सुन कर रावण लज्जित होते हुये बोला, "मैं सब जानता हूँ शूर्पणखे! केवल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम राम और लक्ष्मण को मरा हुआ ही समझो। तेरे नाक-कान काटने वाले को अब कोई बचा नहीं सकता। मैंने भली-भाँति विचार कर लिया है कि मुझे क्या करना है। राम मेरे हाथों मारा जायेगा। सीता मेरे महलों की शोभा बढ़ायेगी और तेरी दासी बन कर रहेगी।" इतना कह कर रावण ने मन्त्रियों को विदा किया और फिर आकाश मार्ग से मारीच के पास पहुँचा। उससे स्नेह दिखाता हुआ बोला, "मित्र मारीच! मित्र ही संकट के समय मित्र की सहायता करता है। मैं जानता हूँ कि मेरे मित्रों और शुभचिन्तकों में तुमसे बढ़ कर बलवान, नीतिवान और मुझसे सच्चा स्नेह करने वाला और कोई नहीं है। मुझे बहन शूर्पणखा की दशा देख कर बहुत दुःख हुआ है। उन दुष्टों ने यह भी नहीं सोचा कि एक स्त्री पर हाथ नहीं उठाना चाहिये। उन कायरों को अवश्य दण्ड देना होगा। यह नाक शूर्पणखा की नहीं, सम्पूर्ण राक्षस जाति की कटी। हमारे नामे से काँपने वाले ऋषि-मुनि आज हमारी कायरता पर हँसते हैं। इस अपमान से तो मर जाना ही अच्छा है। भाई मारीच! उठो और सम्पूर्ण राक्षस जाति की इस अपमान से रक्षा करो। मैं सीता का हरण अवश्य करूँगा। तुम नाना प्रकार के वेश धारण करने में अद्वितीय हो। मैं चाहता हूँ कि तुम चाँदी के बिन्दुओं वाला स्वर्णमृग बन कर राम के आश्रम के सानमे जाओ। तुम्हें देख कर सीता अवश्य राम-लक्ष्मण को तुम्हें पकड़ने के लिये भेजेगी। उन दोनों के चले जाने पर मैं अकेली सीता का अपहरण कर के ले जाउँगा। राम को सीता का वियोग असह्य होगा और विरही राम को मार डालना मेरे लिये कठिन नहीं होगा।"

रावण के प्रस्ताव से अपनी असहमति प्रकट करते हुये मारीच बोला, "हे लंकापति! मैं पहले भी तुमसे कह चुका हूँ कि ऐसा करना तुम्हारे लिये उचित नहीं होगा। यह कार्य तुम्हारे जीवन के लिये काल बन जायेगा। सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता होते हुये भी तुम परस्त्री हरण जैसा भयंकर पाप करने जा रहे हो। स्मरण रखो, राम के क्रोध से तुम बच नहीं सकोगे।" मारीच के उत्तर से कुपित हो हाथ में खड्ग ले कर रावण बोला, "मारीच! मैं तुझे अपना मित्र समझ कर तेरे पास आया था। तेरा अनर्गल प्रलाप सुनने के लिये नहीं। तेरी कायरतापूर्ण युक्तियों को सुन कर मैं अपना विचार नहीं बदल सकता। सीता का हरण मुझे अवश्य करना है और तुझे मेरे आज्ञा का पालन करना है। यदि तू मेरी आज्ञा मान कर मेरे इस कार्य में सहायता नहीं करेगा तो राम-लक्ष्मण से पहले मैं तेरा वध करूँगा।" रावण के इन क्रुद्ध शब्दों से भयभीत हो मारीच ने अपनी सहमति दे दी। इससे प्रसन्न हो कर रावण बोला, "अब तू सच्चा राक्षस है और मेरे परम मित्र है।" इसके पश्चात् रावण उसे ले कर दण्डक वन में पहुँच राम के आश्रम की खोज करने लगा। जब आश्रम मिल गया तो मारीच ने रावण के निर्देशानुसा मृग का रूप धारण किया और आश्रम के निकट विचरण करने लगा। इस अद्भुत स्वर्णिम मृग की शोभा देख कर सीता आश्चर्यचकित रह गई और विस्मित हो कर उसके पास पहुँची। मायावी मारीच ने अपनी मृग-सुलभ क्रीड़ाओं से सीता का मन मुग्ध कर लिया।